मुझे कुछ ग़लतियों की कथा कहनी है स्वीकार करना है कुछ को कुछ को भूल जाना है और नट जाना है कुछ से तो साफ़ ही इस तरह करना है प्रवेश नए साल में कहते हैं परम्परा है कुछ ऐसी ही ***
Archive for दिसम्बर 2009
नया साल
31/12/2009जिसकी दुनिया रोज़ बनती है !
29/12/2009हर उस आदमी की एक नहीं कई प्रिय पुस्तकें होती हैं, जो किताबों की दुनिया में रहता है। मैं भी किसी हद तक इस दुनिया में रहता हूँ और ऐसी दस किताबें हैं, जिन्हें मैं `मेरी प्रिय पुस्तक´ कह सकता हूँ। इन दस में पाँच कविता संकलन हैं और इन्हीं में शामिल है आलोक [...]
स्पष्ट राजनीतिक चेतना की कविताएँ
28/12/2009(यह समीक्षा दैनिक जागरण के पुनर्नवा के लिए लिखी गई थी और जाहिर है इसकी कई सीमाएं भी हैं. अख़बार आपको कम लिखने को कहता है. मैं सोचता हूँ कभी पंकज की कविता पर एक लम्बा लेख लिखूंगा.) बहुत कम उम्र (सबसे कम?) में युवा-कविता का प्रतिष्ठित भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार प्राप्त करने वाले पंकज चतुर्वेदी ने [...]
बनारस से निकला हुआ आदमी
25/12/2009जनवरी की उफनती पूरबी धुंध और गंगातट से अनवरत उठते उस थोड़े से धुँए के बीच मैं आया इस शहर में जहाँ आने का मुझे बरसों से इन्तज़ार था किसी भी दूसरे बड़े शहर की तरह यहाँ भी बहुत तेज़ भागती थी सड़कें लेकिन रिक्शों, टैम्पू या मोटरसाइकिल-स्कूटरवालों में बवाल हो जाने पर रह-रहकर रुकने-थमने [...]
देवताले जी को कुछ चिट्ठियाँ
23/12/200924.09.2005 हमारे बहुत प्यारे दादा जी, हमारा बहुत-बहुत प्यार, जैसा कि तय था नए घर में आपकी चिट्ठी ही डाकिये को पहली बार मुझसे मिलाने लायी। आपके अक्षर अब भी मोती जैसे ही हैं। अब यह ज़रूरी तो नहीं कि मोती माला में व्यवस्थित ही रहें, वे बिखरे हुए भी सुन्दर लगते हैं। यहाँ [...]
डायरी के कुछ अटपटे पन्ने !
19/12/2009यह डायरी हिमाचल प्रदेश से श्री गुरमीत बेदी के सम्पादन में छपने वाली पत्रिका “पर्वत राग” के जुलाई-सितम्बर 2008 अंक में छपी है. 14 जुलाई 2005 दिल्ली से लौटा। इस बार का अंकुर मिश्र पुरस्कार फैजाबाद के विशाल को मिला। बहुत अच्छा कवि है और कर्रा वक्ता भी। आत्मीय थोड़ा कम है। गले [...]
एम. आर. आई.
17/12/2009( अप्रैल 2006 में मुझ पर एक आफ़त आई और मैंने बदहवासी की हालत में ख़ुद को एम० आर० आई० मशीन में पाया। उस जलती – बुझती सुरंग में मेरे अचेतन जैसे मन में कई ख़याल आते रहे। उन्हें मैंने थोड़ा ठीक होने पर इस कविता में दर्ज़ किया और ये कविता हंस, जनवरी 2008 में प्रकाशित हुई। [...]
टीकाराम पोखरियाल की वसन्तकथा
15/12/2009उस दूरस्थ पहाड़ी इलाके में कँपकँपाती सर्दियों के बाद आते वसन्त में खुलते थे स्कूल जब धरती पर साफ सुनाई दे जाती थी क़ुदरत के क़दमों की आवाज़ गाँव-गाँव से उमड़ते आते संगी साथी यार सुदीर्घ शीतावकाश से उकताए अपनी उसी छोटी-सी व्यस्त दुनिया को तलाशते 9 किलोमीटर दूर से आता था टीकाराम पोखरियाल आया [...]