Archive for जनवरी 18th, 2010

“नींद की गोली” और एक खुफ़िया “एकालाप”

18/01/2010

दो कविताएँ नींद की गोली न जाने किस पदार्थ किस रसायन और किस विश्वास के साथ बनी है ये कि इसे खाने पर कुछ ही देर बाद सफ़ेद जलहीन बादलों की तरह झूटा दिलासा लिए तैरती आती है नींद लेकिन जारी रहता है दुनिया का सुनाई पड़ना आसपास होती हरक़तों का महसूस होना जारी रहता [...]

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.