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	<title>शिरीष कुमार मौर्य</title>
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		<title>शिरीष कुमार मौर्य</title>
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		<title>शमशेर से साझा</title>
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		<pubDate>Mon, 30 Aug 2010 16:17:56 +0000</pubDate>
		<dc:creator>shirishmourya</dc:creator>
				<category><![CDATA[समीक्षा]]></category>

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		<description><![CDATA[हर युवा कवि अपनी रचना और विचार-प्रक्रिया में ख़ुद को पूर्वज कवियों से साझा करता है। मेरे लिए पूर्वज कवियों का स्मरण एक आवेगपूर्ण घटना है &#8211; यूँ किसी भी समय में किसी का कवि हो जाना भी एक घटना ही है &#8211; कुछ ऐसी घटना, जिसे कबीर ने एक अवान्तर ईश-प्रसंग में `घट-घट में [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=shirishmourya.wordpress.com&amp;blog=10965121&amp;post=84&amp;subd=shirishmourya&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>हर युवा कवि अपनी रचना और विचार-प्रक्रिया में ख़ुद को पूर्वज कवियों से साझा करता है। मेरे लिए पूर्वज कवियों का स्मरण एक आवेगपूर्ण घटना है &#8211; यूँ किसी भी समय में किसी का कवि हो जाना भी एक घटना ही है &#8211; कुछ ऐसी घटना, जिसे कबीर ने एक अवान्तर ईश-प्रसंग में <strong>`घट-घट में पंछी बोलता´</strong> कहकर व्यक्त किया है। मेरे थोड़े-से इस कवि-जीवन में कितनी तो पूर्वज कविता ऐसी है, जो घट-घट में बोलती है। उसमें अमीर ख़ुसरो हैं, कबीर हैं, नज़ीर हैं, मीर हैं, ग़ालिब हैं, निराला हैं, फ़ैज़ हैं, नागार्जुन हैं, मुक्तिबोध हैं, धूमिल हैं &#8211; और निश्चित रूप से एक बहुत बड़े स्पेस के साथ शमशेर हैं। बहुत उत्सुकता से मैं देखता हूँ कि हमारे अग्रजों में आलोक धन्वा, वीरेन डंगवाल, मनमोहन और मंगलेश डबराल हैं, जो शमशेर के साथ अपनी कविता में बहुत कुछ साझा करते हैं। यहां मैं शमशेर की कही-लिखी कुछ बातों के सहारे अपनी इस साझेदारी के बारे में कुछ कहना चाहूँगा -</p>
<p><strong>कला का संघर्ष समाज के संघर्षों से एकदम कोई अलग चीज़ नहीं हो सकती</strong> (१)</p>
<p>आज की कविता में, ख़ासकर नए लोगों के बीच कला या कलावाद एक बड़ी बहस का मुद्दा है। उदाहरण के लिए युवा कवियों में गिरिराज किराडू और किसी हद तक व्योमेश शुक्ल या उनकी कविता को लोग कलावादी कहते हैं और ऐसा कहते हुए वे अज्ञेय और अशोक वाजपेयी को तो याद रखते हैं, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से शमशेर को भूल जाते हैं। मुझे नहीं लगता कि जितनी कला शमशेर में है, उतनी अज्ञेय या उनके परवर्ती अलम्बरदारों में होगी &#8211; पर शमशेर की कला का संघर्ष, जैसा कि उन्होंने स्पष्ट किया है, समाज का संघर्ष है। यहां एक बात यह भी उठ सकती है कि ठीक है कथ्य आपका समाज का है, किन्तु उसे कहने का शिल्प इतना कलापूर्ण है कि वह जिस समाज का है, वही उसे समझ नहीं पाता। मैं कहना चाहता हूँ कवि का कथ्य हमेशा ही स्थूल सामाजिक आशयों का कथ्य नहीं होता, उस पर सूक्ष्मतम को गहने की जिम्मेदारी भी होती है। दरअसल भीतरी, गूढ़ और जटिल संरचनाओं किंवा कलाओं से ही बाहर का स्थूल और प्रकट रूप अस्तित्व में आता है- यह सिद्धान्त विज्ञान से लेकर समाज और साहित्य तक एक जैसा लागू होता है। फिर सवाल यह है कि कला कहते किसे हैं? यहां भी शमशेर ही साथ देते हैं -</p>
<p><strong>आज की कला का असली भेद और गुण लोक-कलाकारों के पास है, जो जनान्दोलनों में हिस्सा ले रहें हैं&#8230;&#8230;. हम-आप ही अगर अपने दिल और नज़र का दायरा तंग न कर लें तो देख सकेंगे कि हम सबकी मिली-जुली ज़िन्दगी में कला के रूपों का ख़ज़ाना हर तरह बेहिसाब बिखरा चला गया है&#8230;.अब यह हम पर है, ख़ास तौर से कवियों पर, कि हम अपने सामने और चारों ओर की इस अनन्त और अपार लीला को कितना अपने अन्दर बुला सकते हैं।</strong> (२)</p>
<p>यहां बात न सिर्फ़ लोक-कलाकारों की हो रही है, बल्कि उन जनान्दोलनों की भी हो रही है, जिनमें वे भागीदार होते हैं। कला का बेहद निकट और आत्मीय सम्पर्क `जन´ से है। बात को आगे बढ़ाते हुए हम कह सकते हैं `जनवादी कला´ यानी कला जो जन के हित में हो, उसके संघर्षों को स्वर देती हो, भले कभी बहुत पास और कभी कुछ दूर से देती हो, पर देती हो। तो इस तरह बरास्ता शमशेर मेरे लिए हर उस तरह की कला सर-माथे पर है, जिसका मूल तत्व जन है। शमशेर की कला का सबसे सार्थक प्रभाव किसी पर देखना हो तो आलोक धन्वा का अकेला संकलन <strong>`दुनिया रोज़ बनती है´</strong> को पढ़ लेना चाहिए। उनके बिम्ब उतने ही हल्के-हवादार, धरती-आकाश के कोमल रंगों से भरे, भीतर वैसी ही आग-वैसे ही वास्तविक और समूचे जीवन-राग से रचे हैं, जैसे शमशेर के यहां है। अपने नव्यतम संग्रह <strong>`स्याही ताल´</strong> के नाम से ही मानो वीरेन डंगवाल शमशेर का सुमिरन कर लेते हैं और फिर अन्दर आलोक धन्वा को समर्पित एक कविता की पंक्ति <strong>` एक बादल जो दरअसल एक नम दाढ़ी था´</strong> में शमशेर से वीरेन डंगवाल तक की पूरी परम्परा एकमेक हो जाती है, जिससे अगर सीखना चाहे, तो हमारी पीढ़ी बहुत कुछ ऐसा सीख सकती है, जिसे एक शब्द में `कला´ कहना चाहिए । शमशेर को निरन्तर पढ़ने से मिली इस समझ के सहारे मैं कह सकता हूँ कि कला का जो प्रश्न औरों को सबसे ज़्यादा परेशान करता है, वह मेरे लिए दो दूनी चार की तरह सरल होकर सामने आता है। मुझ समेत सभी को चिन्ता करनी चाहिए कि इक्कीसवीं सदी में हमारे लिए <strong>`लोक-कलाकार´ </strong>और <strong>`जनान्दोलन´</strong> जैसे क़ीमती शब्दों के अब क्या मायने हैं। आज की कविता के सामने सबसे बड़े प्रश्न यही हैं कि हमारा `जन´ कौन है? कैसा है? कहां है? उसके क्या हक़-हुक़ूक हैं? और इन सबसे बढ़कर यह कि हम ख़ुद क्या ठीक वही `जन´ नहीं हैं? हमारी तंगदिली हमें एक दिन कहीं का नहीं छोड़ने वाली है, क्योंकि हमने अपने जीवन की सीमाएं तय कर ली हैं और साथ ही लिखी-पढ़ी जा रही कविता की भी। हमें जल्दी, किसी तरह अपने भीतर को बाहर प्रदर्शित कर देने की है, बाहर को भीतर बुलाने के प्रयास कमतर होते गए हैं। कविता लिखना एक नितान्त बौद्धिक कृत्य होता गया है। इस अंधेरे में मैं टटोलता हुआ चलता हूँ तो शमशेर किसी अनन्त से मेरी ओर बढ़ा हाथ हो जाते हैं। पुरखों के बारे में बहुत महत्वाकांक्षी होकर कहूँ तो मुझे बुद्धि मुक्तिबोध की चाहिए और हृदय नागार्जुन का पर हाथ हमेशा शमशेर का चाहिए, जिसे थामकर पिछले पचास साल की कविता की जटिलता में राह खोजना और अपनी राह बनाना, दोनों ही कुछ आसान हो पाते हैं। कविता में कला की सच्ची शिनाख़्त करना चाहूँ तो शमशेर के ठीक अगल-बगल खड़े आलोक धन्वा, वीरेन डंगवाल, मनमोहन और मंगलेश डबराल का मेरे मन में खिंचा यह ग्रुपफोटोग्राफ़ आश्वस्त करता है कि कला और कविता के बारे में मेरी ये धारणाएं आभासी नहीं, वास्तविक हैं। और वास्तविक मेरे लिए एक बड़ा शब्द है &#8211; महान, अनन्त और अपार।</p>
<p>जब `वास्तविक´ कहता हूँ तो यह विचार के बीहड़ में उतरना होता है। जीने और जीते रहने के लिए वैज्ञानिक जीवनदृष्टि की एक टीसभरी खोज। जो है, वही वास्तविकता नहीं है- जो होना चाहिए, वह भी वास्तविकता है। वास्तविकता क्या है, क्या होनी चाहिए का एक जटिल संसार मेरे सामने खुलता है। स्मृति और स्वप्न के बीच कहीं एक वास्तविकता है, जो मेरी है। मिट्टी की परतों में राह तलाशते ख़तरों से घिरे किसी नन्हें जीव की-सी उद्धिग्नता और छटपटाहट। मेरे चारों ओर परभक्षी विचारधाराओं के झपट्टे और कितना तो लोभ, जो जीवन को सरल बनाता दीखता है, पर जीवन कभी सरल नहीं होता। अपने जीवन को खोजने के लिए एक वैज्ञानिक आधार की तलाश हर कवि की तलाश है। शमशेर ने अज्ञेय के दूसरा सप्तक के अपने हिस्से के वक्तव्य में अगर यह घोषणा की है कि <strong>मेरे लिए यह वैज्ञानिक आधार मार्क्सवाद है</strong> (३) तो मेरे लिए इसका एक अपना ऐतिहासिक महत्व है। शमशेर की पुरानी कविता <strong>`समय साम्यवादी´ </strong>ने १७ -१८ की उम्र में मेरे भीतर जैसे एक रूमान को जन्म दिया था। दीवारों पर आइसा का प्रतीक चिन्ह `तीन सितारों की छांव तले तना हुआ मुक्का´ बनाते हुए दिल फड़फड़ाता हुआ बार-बार यही दुहराता था -</p>
<p><strong>वाम वाम वाम दिशा<br />
समय-साम्यवादी<br />
पृष्ठभूमि का विरोध<br />
अंधकारलीन<br />
व्यक्ति &#8211; कुहाSस्पष्ट हृदय-भार आज, हीन<br />
हीन भाव, हीन भाव, हीन भाव&#8230;..<br />
मध्यवर्ग का समाज, दीन</strong> (४)</p>
<p>शमशेर की कविता की बदौलत ज़िन्दगी में आया यह रूमान बाद में मुक्तिबोध को पढ़ते हुए पका। प्रेम बना। जीवन में बसा। मेरी दुनिया कई सही-ग़लत काम करते या उनका भागीदार बनते, कहीं न कहीं उसी रूमान से संचालित होती रही है। एक कवि आपकी जीवनचर्या में घुस सकता है, उसे बदल सकता है, इस चीज़ को मेरे लिए शमशेर की कविता ने सम्भव कर दिखाया है। और यह तो महज विचार की बात है, सौन्दर्यबोध, शरीरबोध और बिम्बबोध के तो पहलू अनेक हैं।</p>
<p><strong>दो चार अलग-अलग भाषाओं के अलग-अलग मिज़ाज की, और उनकी अलग-अलग तरह की रंगीनियों और गहराइयों की जानकारी हमें जितना ज़्यादा होगी उतना ही हम फैले हुए जीवन और उसको झलकाने वाली कला के अन्दर सौन्दर्य की पहचान और सौन्दर्य की असली कीमत की जानकारी बढ़ा सकेंगे।</strong> (५)</p>
<p>शमशेर की इस सीख के आगे कभी-कभी बहुत शर्मिन्दग़ी महसूस करता हूँ। इस मामले में अनपढ़ ही रहा। अंग्रेज़ी का कामचलाऊ (पढ़ पाने और अंग्रेज़ी से कविताओं का हिन्दी अनुवाद कर पाने भर) ज्ञान अर्जित कर पाया, हालांकि उसने भी दिमाग़ में कई खिड़कियां खोल दी हैं। उर्दू की लिपि नहीं जानता लेकिन देवनागरी में उपलब्ध नज़ीर, मीर, ग़ालिब और फ़ैज़ ने भीतर कुछ तो जोड़ा ही है, इतना मैं जानता हूँ। मेरे लिए भाषा नहीं, बोलियों के स्तर पर यह ज़रूर सम्भव हुआ है। बुन्देलखण्डी, गढ़वाली और कुमाऊंनी बोलियों ने मेरी ज़िन्दग़ी में वह किया है, जिसे युवा कवि-आलोचक व्योमेश शुक्ल कविता में मेरी पहाड़ी-पठारी-मैदानी नागरिकता कहता है। लोक-कलाकारों की बात शमशेर ने बहुत ज़ोर देकर कही है और जन-आन्दोलनों की भी। मेरी पहाड़ी बोलियों में मैंने इन दोनों का लम्बा और अन्तरंग सानिध्य प्राप्त किया है। इससे मेरी कविता प्रभावित हुई है और उसमें जीवन का फैलाव बढ़ा है। उसके ठस और सूखे शिल्प में पानीदार प्राणवायु के लिए कुछ जगह बन सकी है।</p>
<p>शमशेर की बात हो, याद हो, तो मुक्तिबोध स्वाभाविक रूप से वहां हमेशा ही मौजूद होंगे। <strong>`चांद का मुंह टेढ़ा है´</strong> से ही मुक्तिबोध की कविता किसी भी युवा के लिए गहरे आश्चर्य, वैचारिक-बौद्धिक आकर्षण, सामाजिक-राजनीतिक हादसों और जीवन की जटिलताओं का एक गूढ़बंध साबित होती है। मगर कितनी ख़ुशी की बात है कि वहां भी किसी कुशल प्राध्यापक और पथप्रदर्शक की तरह शमशेर मौजूद हैं। उनके पास वे चाबियां हैं, जिनकी ज़रूरत मुक्तिबोध को पढ़ते हुए हमें महसूस होती है। बहुत बाद में चन्द्रकान्त देवताले ने मालवा के देहातों में मुक्तिबोध का लैण्डस्केप मुझे दिखाया तो लगा जो सफ़र शमशेर के साथ शुरू हुआ था, वो आज देवताले जी के साथ पूरा हुआ। शमशेर ने बाद में भी मुक्तिबोध पर बहुत कुछ लिखा। उनके इधर-उधर बिखरे कुछ संस्मरणों, लेखों और साक्षात्कारों में कई बातें ऐसी हैं, जो मुक्तिबोध को समझने की नई दृष्टि प्रदान करती हैं।</p>
<p><strong>मुक्तिबोध के साथ मेरी समस्या होती है(अकसर ही पाठकों को होती है, मैं भी एक साधारण ही पाठक हूँ) अव्वल तो पढ़ने की! (ईमानदारी की बात) रचना की दीर्घकाय विराटता हताश करती है। ए ग्रिम रियलिटी( अन्दर-बाहर सब ओर से। वस्तु और शिल्परूप और अन्तरात्मा, रचना-प्रक्रिया और पाठक की प्राथमिक प्रतिक्रिया सबमें एक अजब ग्रिमनेस, मैं बचकर कहां जा सकता हूँ। घिर ही जाता हूँ, फंस ही जाता हूँ &#8230;..निस्तार नहीं, तभी `मुक्ति´ है &#8212; `मुक्ति-बोध´ हैं।<br />
</strong><br />
<strong>दूसरी समस्या होती है समझने की। होती थी &#8230;.कहना चाहिए। क्योंकि पढ़ लेने, और अर्थ और भाव-व्यंजनाएं हृदयंगम कर लेने के बाद कविता हृदय पर, चेतना पर हावी हो जाती है। आप मुक्तिबोध के चित्रों के पैटर्न समझ लेने के बाद उन्हें उम्र भर नहीं भूल सकते।</strong> (६)</p>
<p>तो इस तरह पढ़ा जाना चाहिए मुक्तिबोध को। शमशेर सिर्फ़ दीर्घकाय कहकर नहीं रह पाए, उन्हें उसके साथ विराटता भी कहना पढ़ा। व्याकरण के हिसाब से ग़लत पर मुक्तिबोध की कविता को समझने के अपने विशिष्ट व्याकरण के हिसाब से बिल्कुल सही। कविताओं में जीवन और उसकी ऐतिहासिक-सामाजिक-राजनीतिक-वैज्ञानिक-वैचारिक स्थितियों के उस रचाव को, जिसे मुक्तिबोध आश्चर्यजनक ढंग से सम्भव करते हैं, बिना इतने विशेषणों के नहीं समझा जा सकता। मैंने पहले भी कहा कि <strong>`वास्तविकता´</strong> मेरे लिए एक बड़ा शब्द है &#8211; महान, अनन्त और अपार। यह संस्कार मुक्तिबोध से ही आया है। और देखिए शमशेर मुक्तिबोध में मौजूद उस वास्तविकता को ग्रिम कहते हैं यानी &#8211; क्रूर, निर्दय, भयानक&#8230;. तभी मैं समझ पाता हूँ कि वास्तविकता वह भी है जो नहीं होनी चाहिए या किंचित उलटबांसित फेरबदल के साथ कहूँ तो वह भी, जैसी होनी चाहिए। और ग्रिमनेस भी महज ग्रिमनेस नहीं है &#8211; <strong>&#8216;अजब ग्रिमनेस&#8217;</strong> है। हमारे बदलते जीवन और समाज में कितना अर्थपूर्ण और अपार होता जा रहा है यह एक शब्द &#8211; अजब! यहां सिर्फ़ हैरत नहीं, समूची मानवजाति की विडम्बनाओं-विसंगतियों का भूत है और भविष्य भी। वर्तमान के तो कहने ही क्या! और आगे यह कि निस्तार में मुक्ति नहीं &#8211; निस्तार नहीं है, तभी मुक्ति है और हमारे प्यारे मुक्तिबोध भी। यह जीवन का फ़लसफ़ा ख़ुद को साधारण कहते हुए शमशेर कितनी सरलता से समझा देते हैं। सीधा समीकरण यह है कि जो जीवन का फ़लसफ़ा है, वही कविता का भी। भाव-व्यंजनाओं को समझने की बात तो महज मुक्तिबोध पर नहीं, समूची कविता पर लागू होती है, जिसमें सबसे पहले ख़ुद शमशेर की कविता आएगी। चित्र पैटर्न ख़ुद शमशेर के देखिए &#8211; क्या कविता के हम सरीखे कार्यकर्ता उन्हें उम्र भर भुला पायेंगे&#8230;.</p>
<p><strong>निम्नमध्यवर्ग का शिक्षित व्यक्ति, अजब-सी सूली पर लटका रहता है और फिर भी ज़िन्दा रहता है, नरक में जाने के लिए, और अपने परिवार के साथ नरक ही भोगता है।</strong> (७)</p>
<p>मुक्तिबोध के सन्दर्भ में कही यह बात आज की भूमण्डलीकृत उत्तर बल्कि उत्तरोत्तरआधुनिक दुनिया और इसके निकटतम इतिहास में हम जैसों की सामूहिक जीवनगाथा बन जाती है। इसे सोचते और यहां लिखते हुए मेरे भीतर के मनुष्य और कवि का आकार मानो कहीं एकदम से टूटता, तो कहीं जुड़ता भी है। हम सौभाग्यशाली हैं कि हमें ऐसे पुरखे मिले हैं जो अपने बाद भी क़दम-क़दम पर हमारे सामाजिक-राजनीतिक जीवन और कविता में हमारा साथ देते हैं।</p>
<p><strong>मुक्तिबोध का वास्तविक मूल्यांकन अगली, याने अब आगे की पीढ़ी निश्चय ही करेगी, क्योंकि उसकी करूण अनुभूतियों को, उसकी व्यर्थता और खोखलेपन को पूरी शक्ति के साथ मुक्तिबोध ने ही व्यक्त किया है। इस पीढ़ी के लिए शायद यही अपना ख़ास महान कवि हो। </strong>(8)</p>
<p>शमशेर ने कविता और कवियों के बहाने अपने समय को इस क़दर पहचाना है कि बाद के घटनाक्रम की तस्वीर भी वे हमारे लिए बना गए। हमारी व्यर्थता, हमारा खोखलापन, हमारी करूण अनुभूतियां, हमारे मुक्तिबोध और हमारे शमशेर ! सुन रहे हो मेरे हमउम्र कवि- साथियों? सुनो! सुनो, क्योंकि यही सुनने की बात है आज, और गुनने की भी। पुरखों की स्मृतियां जब इस तरह विकल हो पुकारती हैं तो हमारा वर्तमान और भविष्य गूंजता है उनमें।</p>
<p>उस महान मानवीय गूँज को मेरी पूरी पीढ़ी की ओर से मेरा सलाम, जिसमें हमारे अक्स झलकते हैं। और अगर नहीं झलकते तो हम कवि होने के क़ाबिल नहीं, न ही मनुष्य होने के!<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
१. दूसरा सप्तक, प्रथम संस्करण, पृ0 ८५<br />
२. वही, पृ0 वही<br />
३. वही, पृ0 ८८<br />
४. वही, पृ0 ११३<br />
५. वही, पृ0 ८७<br />
६. एक बिलकुल पर्सनल एसे, साक्षात्कार, अगस्त-नवम्बर, १९८६, पृ0 ७१<br />
७. वही, पृ0 ७०<br />
८. वही, पृ0 ७१</p>
<div>****</div>
<div><strong>यह लेख रचना समय के शमशेर अंक में छपा है, जिसके अतिथि सम्पादक कवि बोधिसत्व हैं।</strong></div>
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		<title>थियेटर करना &#8211; विश्व रंगमंच दिवस पर</title>
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		<pubDate>Fri, 26 Mar 2010 18:46:36 +0000</pubDate>
		<dc:creator>shirishmourya</dc:creator>
				<category><![CDATA[इसी रात में घर है सबका]]></category>

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		<description><![CDATA[  एक छोटे क़स्बे में थियेटर करना सबसे पहले उस क़स्बे के सबसे अमीर और अय्याश आदमी के आगे खड़े होकर चंदा मांगना है और वो भी एक हक़ तरह उसे हर साल होने वाली रामलीला, धर्मगुरुओं-साध्वियों आदि की प्रवचन संध्याओं, बड़े अंग्रेज़ी स्कूलों के सालाना जलसों में अनुस्यूत डी.जे. आदि और अपने इस होनेवाले [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=shirishmourya.wordpress.com&amp;blog=10965121&amp;post=80&amp;subd=shirishmourya&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p> </p>
<p>एक छोटे क़स्बे में थियेटर करना<a href="http://shirishmourya.files.wordpress.com/2010/03/untitled4-1227108490t.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-81" title="untitled4-1227108490t" src="http://shirishmourya.files.wordpress.com/2010/03/untitled4-1227108490t.jpg?w=150&#038;h=150" alt="" width="150" height="150" /></a><br />
सबसे पहले उस क़स्बे के सबसे अमीर और अय्याश आदमी के आगे खड़े होकर चंदा मांगना है<br />
और वो भी एक हक़ तरह</p>
<p>उसे हर साल होने वाली रामलीला, धर्मगुरुओं-साध्वियों आदि की प्रवचन संध्याओं,<br />
बड़े अंग्रेज़ी स्कूलों के सालाना जलसों में अनुस्यूत डी.जे. आदि<br />
और अपने इस होनेवाले नाटक के बीच<br />
एक नितान्त अनुपस्थित साम्य को समझाना है थियेटर करना</p>
<p>सरकारी दफ़्तरों के चक्कर लगाना है मदद के वास्ते<br />
घूसखोर अफ़सरों को पहचानना<br />
और पुराने परिचितों को टटोलना है थियेटर करना</p>
<p>एक सही और समझदार आदमी अचानक मिल सकता है<br />
अचानक बिक सकती हैं कुछ टिकटें आपको तैयार रहना है<br />
और उसी बीच लगा आना है एक चक्कर<br />
लाइट और साउंड सिस्टम वाले<br />
और उस घी वाले थलथल लाला के यहाँ भी, जिसने मदद का वायदा किया<br />
और सुनना है उससे<br />
कि ये इमदाद तो हम नुकसान उठाकर आपको दे रहे हैं भाई साहब<br />
आपने भी छात्र राजनीति में रहते<br />
कभी तंग नहीं किया था हमें<br />
ये तो बस उसी का बदला है !</p>
<p>इस तरह<br />
पुरानी भलमनसाहत और अहसानात को खो देना है थियेटर करना</p>
<p>जब रोशनी और आवाज़ और अभिनय के समन्दर में तैर रहे होते हैं किरदार<br />
और दर्शक भी अपना चप्पू चलाते और तालियाँ बजाते हैं<br />
ठीक उसी समय<br />
सभागार के सबसे पीछे के अंधेरे हाहाकार में<br />
अनायास ही बढ़ गए खर्चे का हिसाब लगाना है<br />
थियेटर करना</p>
<p>नाटक के बाद रंगस्थल से मंच की साज-सज्जा का सामान खुलवाना<br />
कुर्सियाँ हटवाना और झाड़ू लगवाना है<br />
थियेटर करना<br />
जिसमें तयशुदा पैसों में किंचित कमी के लिए रंगमंडल के थके-खीझे किंतु समर्पित निर्देशक से<br />
मुआफ़ी माँगना भी शामिल है</p>
<p>देर रात की सूनी सड़क पर बीड़ी के कश लगाते बंद हो चुके अपने घरों के दरवाज़ों को खटखटाने जाना है<br />
थियेटर करना</p>
<p>बूढ़ी होती माँ के अफ़सोस के साथ अवकाशप्राप्त पिता के क्रोध को पचाना<br />
और अगली सुबह तड़के कच्ची नींद से उठकर शहर से जाते रंगमंडल को दुबारा बुलाने के उनींदे विश्वास में<br />
विदाई का हाथ हिलाना है थियेटर करना</p>
<p>कौन कहता है<br />
कौन?<br />
कि महज एक प्रबल भावावेग में<br />
अनुभूत कुशलता के साथ मंच पर जाना भर है<br />
थियेटर करना !<br />
***</p>
<p>Painting: Hemraj/google search</p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/shirishmourya.wordpress.com/80/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/shirishmourya.wordpress.com/80/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/shirishmourya.wordpress.com/80/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/shirishmourya.wordpress.com/80/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/shirishmourya.wordpress.com/80/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/shirishmourya.wordpress.com/80/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/shirishmourya.wordpress.com/80/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/shirishmourya.wordpress.com/80/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/shirishmourya.wordpress.com/80/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/shirishmourya.wordpress.com/80/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/shirishmourya.wordpress.com/80/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/shirishmourya.wordpress.com/80/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/shirishmourya.wordpress.com/80/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/shirishmourya.wordpress.com/80/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=shirishmourya.wordpress.com&amp;blog=10965121&amp;post=80&amp;subd=shirishmourya&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>दादी की चिट्ठियाँ</title>
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		<pubDate>Thu, 25 Feb 2010 12:54:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>shirishmourya</dc:creator>
				<category><![CDATA[पृथ्वी पर एक जगह]]></category>

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		<description><![CDATA[चौदह बरस पहले गुज़र गईं दादी मैं तब बीस का भी नहीं था दादी बहुत पढ़ी-लिखी थीं और सब लोग उनका लोहा मानते थे मोपांसा चेखव गोर्की तालस्ताय लू-शुन तक को पढ़ रखा था उन्होंने और हम तब तक बस ईदगाह और पंच-परमेश्वर ही जानते थे मैं और मां सुदूर उत्तर के पहाड़ों पर रहते [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=shirishmourya.wordpress.com&amp;blog=10965121&amp;post=77&amp;subd=shirishmourya&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>चौदह बरस पहले गुज़र गईं दादी<br />
मैं तब बीस का भी नहीं था</p>
<p>दादी बहुत पढ़ी-लिखी थीं<br />
और सब लोग उनका लोहा मानते थे<br />
मोपांसा    चेखव     गोर्की     तालस्ताय     लू-शुन  तक को<br />
पढ़ रखा था उन्होंने<br />
और हम तब तक बस ईदगाह और पंच-परमेश्वर ही<br />
जानते थे</p>
<p>मैं और मां सुदूर उत्तर के पहाड़ों पर रहते थे<br />
नौकरी करने गए पिता के साथ<br />
दादी मध्य प्रदेश में पुश्तैनी घर सम्भालती थीं</p>
<p>आस-पड़ोस में काफी सम्मान था<br />
उनका<br />
वह शासकीय कन्या शाला की रौबदार प्रधानाध्यापिका थीं</p>
<p>वह जब भी अकेलापन महसूस करतीं<br />
हमें चिट्ठी लिखतीं<br />
यों महीने में तीन या चार तो आ ही जाती थीं उनकी चिट्ठियाँ </p>
<p>इनमें बातों का ख़जाना होता था<br />
मैं बहुत छोटा था तो भी पिता के साथ-साथ<br />
आख़िर में<br />
मेरे नाम अलग से लिखी होती थीं कुछ पंक्तियां<br />
बाद में इसका उल्टा होने लगा<br />
मुझ अकेले के नाम आने लगीं<br />
उनकी सारी चिट्ठियाँ<br />
जिनके अन्त में बेटा-बहू को मेरी याद दिलाना लिखा होता था</p>
<p>तब फ़ोन का चलन इतना नहीं था<br />
और पूरा भाव-संसार चिट्ठियों पर ही टिका था</p>
<p>चिट्ठियाँ अपने साथ<br />
गंध और स्पर्श ही नहीं आवाज़ें भी लाती थीं<br />
मैंने अकसर देखा था<br />
कोना कटे पोस्टकार्ड में चुपचाप आने वाली चिट्ठी ही<br />
सबसे ज़्यादा शोर मचाती थी</p>
<p>दादी हमेशा<br />
अन्तर्देशीय इस्तेमाल करती थीं<br />
जो खूब खुले नीले आसमान-सा लगता था<br />
उसमें उड़ती चली आती थीं<br />
दादी की इच्छाएं<br />
दादी का प्यार</p>
<p>कभी-कभार इस आसमान में बादल भी घिरते थे<br />
दूर दादी के मन में आशंका की<br />
बिजलियाँ कड़कती थीं<br />
उनका हृदय भय और हताशा से कांपता था<br />
ऐसे में अकसर साफ़ नीले अन्तर्देशीय पर कहीं-कहीं<br />
बूँद सरीखे कुछ धब्बे मिलते थे</p>
<p>एक वृद्ध होती स्त्री क्या सोचती है अपने बच्चों के बारे में<br />
जो उससे अलग<br />
अपना एक संसार बना लेते हैं?</p>
<p>दादी कहती थीं &#8211; सबसे भाग्यशाली और सफल होते हैं<br />
वे वृक्ष<br />
जो अपने बीजों को पनपने के लिए कहीं दूर उड़ा देते हैं</p>
<p>दादी भी सफल और भाग्यशाली कहलाना चाहती थीं<br />
लेकिन वो पेड़ नहीं थी<br />
उन्हें अपने से दूर हुए एक-एक बीज की परवाह थी</p>
<p>हम उनसे मिल नहीं पाते थे<br />
कभी दो-तीन साल में घर जाते थे<br />
वह हमारे हिस्से के कई सुख<br />
संजोये रखती थीं<br />
मनका-मनका फेरती अपने भीतर की टूटती माला को<br />
किसी तरह पिरोये रखती थीं</p>
<p>हम छुट्टियाँ मनाने जाते थे वहां<br />
शायद इसीलिए<br />
पिता से वह कभी कोई जिम्मेदारी सम्भालने-निभाने की<br />
बात नहीं करती थीं</p>
<p>मैं दादी को उनकी चिट्ठियों से जानता था<br />
कभी साथ नहीं रहा था उनके<br />
और<br />
छुट्टियों में साथ रहने पर भी उनकी चिट्ठियों के न मिलने का<br />
अहसास होता था<br />
बहुत अजीब बात थी कि मैं साथ रहते हुए भी अकसर उनसे<br />
चिट्ठी लिखने को कहता था</p>
<p>अच्छा तो मुझसे मेरी चिट्ठियाँ<br />
अधिक प्यारी हैं तुझे &#8211; कह कर हमेशा वह मुझे<br />
झिड़क देती थीं<br />
तब मैं घरेलू हिसाब की कॉपियों में उनके लिखे<br />
गोल-गोल अक्षर देखता था<br />
वह कहतीं अब मैं तुम्हारे पास ही आ जाऊंगी रहने<br />
बस तेरे चाचाओं का ब्याह कर दूँ !<br />
तू भी पढ़-लिखकर दूर कहीं नौकरी पर चला जाएगा<br />
फिर मैं तेरे पापा के घर से तुझे<br />
चिट्ठियाँ लिक्खूंगी!</p>
<p>तब मैं इस बारे में सोचने के लिए बहुत छोटा था</p>
<p>चौदह बरस पहले अचानक वह गुज़र गईं<br />
छाती पर पनप आयीं कैंसर की भयानक गांठों को छुपातीं<br />
भीतर-भीतर छटपटातीं</p>
<p>लेकिन<br />
उनके भीतर का वह संसार मानो अब भी नुमाया है<br />
अकसर ही पूछता है पांच बरस का मेरा बेटा<br />
उनके बारे में<br />
अभी अक्षर-अक्षर जोड़ कर उसे पढ़ना आया है</p>
<p>आज एक सपने की तरह देखता हूँ मैं पुराने बस्ते में रखी उनकी चिट्ठियों को<br />
वह गहरी उत्सुकता से साथ टटोलता है</p>
<p>यह भी उनके न रहने जितना ही सच है<br />
कि बरसों बाद एक बच्चा<br />
हमारे जीवन के विद्रूपों से घिरी उस नाजुक-सी दुनिया को<br />
अपने उतने ही नाजुक हाथों में<br />
फिर से<br />
     बरसों तक सम्भालने के लिए<br />
                         खोलता है!<br />
2006</p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/shirishmourya.wordpress.com/77/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/shirishmourya.wordpress.com/77/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/shirishmourya.wordpress.com/77/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/shirishmourya.wordpress.com/77/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/shirishmourya.wordpress.com/77/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/shirishmourya.wordpress.com/77/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/shirishmourya.wordpress.com/77/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/shirishmourya.wordpress.com/77/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/shirishmourya.wordpress.com/77/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/shirishmourya.wordpress.com/77/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/shirishmourya.wordpress.com/77/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/shirishmourya.wordpress.com/77/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/shirishmourya.wordpress.com/77/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/shirishmourya.wordpress.com/77/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=shirishmourya.wordpress.com&amp;blog=10965121&amp;post=77&amp;subd=shirishmourya&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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			<media:title type="html">shirishmourya</media:title>
		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>रुलाई</title>
		<link>http://shirishmourya.wordpress.com/2010/02/02/%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%88/</link>
		<comments>http://shirishmourya.wordpress.com/2010/02/02/%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%88/#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 02 Feb 2010 10:37:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>shirishmourya</dc:creator>
				<category><![CDATA[पृथ्वी पर एक जगह]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://shirishmourya.wordpress.com/?p=73</guid>
		<description><![CDATA[  मुझे नहीं पता मैं पहली बार कब रोया था हालांकि मुझे बताया गया कि पैदा होने के बाद भी मैं खुद नहीं रोया बल्कि नर्स द्वारा च्यूंटी काटकर रुलाया गया था ताकि भरपूर जा सके ऑक्सीजन पहली बार हवा का स्वाद चख रहे मेरे फेफड़ों तक मुझे अकसर लगता है कि मैं शायद पहली [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=shirishmourya.wordpress.com&amp;blog=10965121&amp;post=73&amp;subd=shirishmourya&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://shirishmourya.files.wordpress.com/2010/02/teardrop-cooke-50.jpg"><img class="aligncenter size-medium wp-image-75" title="teardrop-cooke-50" src="http://shirishmourya.files.wordpress.com/2010/02/teardrop-cooke-50.jpg?w=300&#038;h=224" alt="" width="300" height="224" /></a> </p>
<p>मुझे नहीं पता मैं पहली बार<br />
कब रोया था<br />
हालांकि मुझे बताया गया कि पैदा होने के बाद भी<br />
मैं खुद नहीं रोया<br />
बल्कि नर्स द्वारा च्यूंटी काटकर रुलाया गया था<br />
ताकि भरपूर जा सके ऑक्सीजन पहली बार हवा का स्वाद चख रहे<br />
मेरे फेफड़ों तक</p>
<p>मुझे अकसर लगता है कि मैं शायद पहली बार रोया होऊंगा<br />
मां के गर्भ के भीतर ही<br />
जैसे समुद्रों में मछलियां रोती हैं<br />
चुपचाप<br />
उनके अथाह पानी में अपने आंसुओं का<br />
थोड़ा-सा नमक मिलाती हुई</p>
<p>हो सकता है<br />
उनके और दूसरे तमाम जलचरों के रोने से ही<br />
खारे हो गए हों समुद्र</p>
<p>मैं भी ज़रूर ऐसे ही रोया होऊंगा<br />
क्षण भर को अपने अजन्मे हाथ-पांव हिलाकर<br />
बाहर की दुनिया की तलाश में<br />
और मेरे रोने से कुछ तो खारा हो ही गया होगा<br />
मेरे चारों ओर का जीवन-द्रव</p>
<p>मुझे नहीं मालूम कि मां ने कैसा अनुभव किया होगा और इस अतिरिक्त खारेपन से<br />
उसे क्या नुकसान हुआ होगा ?</p>
<p>उस वक्त<br />
वह भी शायद रोयी हो नींद में अनायास ही<br />
बिसूरती हुई<br />
सपना देख रही है कोई दुख भरा &#8211; शायद सोचा हो पिता ने<br />
सोते में उसका इस तरह रोना सुनकर</p>
<p>जहां तक मुझे याद है<br />
मैं कभी नहीं रोता था खुद-ब-खुद फूटती<br />
कोई अपनी<br />
निहायत ही निजी रुलाई</p>
<p>मुझे तो रुलाया जाता था<br />
हर बार<br />
कचोट-कचोट कर</p>
<p>बचपन में मैं रोता था चोट लगने या किसी के पीटने पर<br />
और चार साल की उम्र में एक बार तो मैं रोते-रोते बुखार का शिकार भी हुआ<br />
जीवन में अपनी किसी आसन्न हार से घबराए<br />
पिता द्वारा पीटे जाने पर<br />
तब भी मां बहुत रोयी थी<br />
रोती ही रही कई दिन मेरे सिरहाने बैठी<br />
पीटने वाले पिता भी रोये होंगे ज़रूर<br />
बाद में काम की मेज़ पर बैठ<br />
पछताते<br />
दिखाते खुद को<br />
झूटमूट के<br />
किसी काम में व्यस्त</p>
<p>मेरे बड़े होने साथ-साथ ही बदलते गए<br />
मेरे रोने के कारण<br />
महज शारीरिक से नितान्त मानसिक होते हुए</p>
<p>हाई स्कूल में रोया एक बार<br />
जब किसी निजी खुन्नस के कारण<br />
आन गांव के<br />
चार लड़कों ने पकड़ा मुझे ज़बरदस्ती<br />
और फिर उनमें से एक ने तो मूत ही दिया मेरे ऊपर धार बांधकर<br />
गालियां बकते हुए</p>
<p>क्रोध और प्रतिहिंसा में जलता हुआ धरा गया मैं भी अगले ही दिन<br />
लात मार कर उसके अंडकोष फोड़ देने के<br />
जघन्यतम अपराध में<br />
मुरगा बन दंडित हुआ स्कूल छूटते समय की प्रार्थना-सभा के दौरान<br />
और फिर उसी हालत में<br />
मेरे पिछवाड़े पर<br />
जमाई हीरा सिंह मास्साब ने<br />
अपनी कुख्यात छड़ी<br />
गिनकर<br />
दस बार</p>
<p>दिल्ली के किसी बड़े अस्पताल में<br />
महीनों चलता रहा<br />
उस लड़के का इलाज</p>
<p>इस घटना के एक अजीब-से एहसास में<br />
आने वाली कितनी ही रातों तक रोया मैं एक नहीं कई-कई बार<br />
घरवालों से अकारण ही छुपता हुआ<br />
रजाई के भीतर घुट कर रह गई मेरी वह पहली बदली हुई रुलाई</p>
<p>जीवन में ये मेरे अपने आप रोने की<br />
पहली घटना थी<br />
जितनी अप्रत्याशित लगभग उतनी ही तय भी</p>
<p>मैंने देखा था अकसर ही विदा होते समय रोती थीं घरों की औरतें भी<br />
लेकिन किसी बहुत खुली चीख या फिर किसी गूढ़ गीत जैसा होता था उनका यह रोना<br />
और मैंने इसे हमेशा ही रुलाई मानने से<br />
इनकार किया</p>
<p>कुछ और बड़ा हुआ मैं तो<br />
आया एक और एहसास जीवन में लाया खुशियां अनदेखी कई-कई<br />
जिनमें बहुत आगे कहीं एक अजन्मा शिशु भी था<br />
और जिस दिन उस लड़की ने स्वीकार किया मेरा प्यार<br />
तो मैंने देखा हंसते हुए चेहरे के साथ वह रो भी रही थी<br />
धार-धार<br />
उन आंसुओं को पोंछने के लिए बढ़ाया हाथ तो उसने भी मेरे गालों से<br />
कुछ पोंछा<br />
मैं थोड़ा शर्मिन्दा हुआ खुद भी इस तरह खुलेआम रो पड़ने पर<br />
बाद में जाना कि दरअसल वह तो तरल था<br />
मेरे हृदय का<br />
इस दुनिया में मेरे होने का सबसे पुख्ता सबूत<br />
जो निकल पड़ा बाहर<br />
उसे भी एक सही राह की तलाश थी मुद्दत से<br />
जब उसने मेरी आंखों का रुख लिया</p>
<p>फिर आए &#8211; फिर फिर आए दु:ख अपार<br />
कई लोग विदा हो गए मेरे संसार से बहुत चुपचाप<br />
कईयों ने छोड़ दिया साथ<br />
कईयों ने किए षड़यंत्र भी<br />
मेरे खिलाफ<br />
मैं कई-कई बार हारा<br />
तब जाकर जीता कभी-कभार<br />
लेकिन बजाए हार के<br />
अपनी जीत पर ही रोया मैं हर बार</p>
<p>बहुत समय नहीं गुज़रा है<br />
अभी हाल तक मैं रो लेता था प्रेयसी से पत्नी बनी उस लड़की के आगे भी खुलकर<br />
बिना शर्माए<br />
पर अब निकलते नहीं आंसू<br />
उन्हें झुलसा चुकी शायद समय की सैकड़ों डिग्री फारेनहाइट आग</p>
<p>होने को तो<br />
विलाप ही विलाप है जीवन<br />
पर वो तरल &#8211; हृदय का खो गया है कहीं<br />
डरता हूं<br />
कहीं हमेशा के लिए तो नहीं ?</p>
<p>रात-रात भर अंधेरे में आंखें गड़ाए खोजता हूं उसी को<br />
भीतर ही भीतर भटकता दर-ब-दर<br />
अपने हिस्से की पूरी दुनिया में<br />
उन बहुत सारी चीज़ों के साथ<br />
जो अब नहीं रही</p>
<p>चाहता हूं<br />
वैसी ही हो मेरी अन्तिम रुलाई भी<br />
जैसे रोया था मां के गर्भ में पहली बार</p>
<p>मुझे एक बार फिर ढेर सारे अंधेरे और एक गुमनाम तलघर से बाहर<br />
किसी बहुत जीवन्त<br />
और रोशन दुनिया की तलाश है</p>
<p>अब तो मेरे भीतर नमक भी है ढेर सारा<br />
मेहनत-मशक्कत से कमाया<br />
लेकिन कोई हिलता-डुलता जीवन-द्रव नहीं मेरे आसपास<br />
कर सकूं जिसे खारा<br />
रो-रोकर</p>
<p>और इस लम्बी और अटपटी एक कोशिश के बाद तो<br />
स्वीकार करूंगा यह भी<br />
कि मेरी रुलाई कोई कविता भी नहीं<br />
आखिर तक<br />
लिखता रह सकूं जिसे मैं महज<br />
कवि होकर।<br />
***<br />
</p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/shirishmourya.wordpress.com/73/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/shirishmourya.wordpress.com/73/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/shirishmourya.wordpress.com/73/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/shirishmourya.wordpress.com/73/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/shirishmourya.wordpress.com/73/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/shirishmourya.wordpress.com/73/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/shirishmourya.wordpress.com/73/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/shirishmourya.wordpress.com/73/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/shirishmourya.wordpress.com/73/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/shirishmourya.wordpress.com/73/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/shirishmourya.wordpress.com/73/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/shirishmourya.wordpress.com/73/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/shirishmourya.wordpress.com/73/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/shirishmourya.wordpress.com/73/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=shirishmourya.wordpress.com&amp;blog=10965121&amp;post=73&amp;subd=shirishmourya&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>&#8220;नींद की गोली&#8221; और एक खुफ़िया &#8220;एकालाप&#8221;</title>
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		<pubDate>Mon, 18 Jan 2010 07:15:05 +0000</pubDate>
		<dc:creator>shirishmourya</dc:creator>
				<category><![CDATA[पृथ्वी पर एक जगह]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://shirishmourya.wordpress.com/?p=70</guid>
		<description><![CDATA[दो कविताएँ नींद की गोली न जाने किस पदार्थ किस रसायन और किस विश्वास के साथ बनी है ये कि इसे खाने पर कुछ ही देर बाद सफ़ेद जलहीन बादलों की तरह झूटा दिलासा लिए तैरती आती है नींद लेकिन जारी रहता है दुनिया का सुनाई पड़ना आसपास होती हरक़तों का महसूस होना जारी रहता [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=shirishmourya.wordpress.com&amp;blog=10965121&amp;post=70&amp;subd=shirishmourya&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:center;"><strong>दो कविताएँ</strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong><a href="http://shirishmourya.files.wordpress.com/2010/01/sleeping-pills.jpg"><img class="aligncenter size-full wp-image-71" title="Sleeping-Pills" src="http://shirishmourya.files.wordpress.com/2010/01/sleeping-pills.jpg?w=235&#038;h=221" alt="" width="235" height="221" /></a></strong></p>
<p style="text-align:left;"><strong>नींद की गोली</strong></p>
<p>न जाने किस पदार्थ<br />
किस रसायन<br />
और किस विश्वास के साथ बनी है ये<br />
कि इसे खाने पर<br />
कुछ ही देर बाद<br />
सफ़ेद जलहीन बादलों की तरह झूटा दिलासा लिए<br />
तैरती आती है नींद</p>
<p>लेकिन जारी रहता है दुनिया का सुनाई पड़ना<br />
आसपास होती हरक़तों का महसूस होना जारी रहता है</p>
<p>वह शायद नींद नहीं<br />
नींद का विचार होता है<br />
जो आता है<br />
बरसों-बरस पीछा करता हुआ जीवन के पहले<br />
चलचित्र की तरह<br />
गुज़रे वक़्तों के श्वेत-श्याम दृश्यों<br />
चरित्रों<br />
और ग़ुबार से भरा</p>
<p>मेरे नन्हे बेटे के हाथ मुझे टटोलते हैं<br />
वह पुकारता है पूरी ताक़त से<br />
मेरी इस उचाट नींद में अपना मुंह डाल<br />
पर मैं उसे जवाब नहीं दे पाता<br />
मेरे चेहरे पर जमने लगती है<br />
उसके होने की<br />
बेहद सुखद<br />
गुनगुनी<br />
और नमकीन भाप</p>
<p>राह चलते<br />
मुझे बुलाता है कोई<br />
बार-बार<br />
वह मेरी पत्नी है शायद<br />
खड़ी<br />
शादी से पहले की बारह बरस पुरानी एक सड़क पर<br />
और हमारे बीच से<br />
गुज़रती जाती है गाड़ियां<br />
बेशुमार</p>
<p>मैं उस ओर अपने क़दम उठाना चाहता हूँ<br />
पर उठा नहीं पाता<br />
मैं हाथ हिलाना और जताना चाहता हूँ<br />
अपना वजूद<br />
खड़ा<br />
बारह बरस बाद की वैसी ही एक दूसरी सड़क पर<br />
इस पार<br />
पर जता नहीं पाता</p>
<p>ये कैसी दवा है कमबख़्त<br />
नींद की<br />
कि मैं जगाना चाहता हूँ मुझे<br />
तो जगा नहीं पाता</p>
<p>सो भी नहीं पाता<br />
मगर<br />
बन्द पलकों के नीचे इतनी हलचलों से भरी<br />
अपनी ईजाद की हुई ये<br />
सबसे नई<br />
जागती हुई नींद!<br />
2007<br />
***</p>
<p style="text-align:left;"><strong>एकालाप</strong></p>
<p>तुम भूलने लगे हो<br />
कि कितने लोगों चीज़ों और हलचलों से भरी है दुनिया<br />
उम्र अभी चौंतीस ही है तुम्हारी<br />
बावजूद इसके तुम व्यस्त रहने लगे हो अक्सर<br />
किसी खुफ़िया एकालाप में</p>
<p>लगता है तुम दुनिया में नहीं<br />
किसी रंगमंच पर हो<br />
और कुछ ही देर में शुरू होने वाला है तुम्हारा अभिनय<br />
जिसमें कोई दूसरा पात्र नहीं है<br />
और न ही ज़्यादा संवाद</p>
<p>पता नहीं अपनी उस विशिष्ट अकुलाहट भरी भारी भरभराती आवाज़ में<br />
त्रासदी अदा करोगे तुम या करोगे कोई प्रहसन</p>
<p>तुम्हारे भीतर एक जाल है<br />
धमनियों और शिराओं का<br />
और वे भी अब भूलने लगी हैं तुम्हारे दिमाग तक रक्त पहुंचाना<br />
इसलिए तुम कभी बेहद उत्तेजित<br />
तो कभी गहरे अवसाद में रहते हो</p>
<p>तुम भूल गए हो कि कितना वेतन मिलता है तुम्हें<br />
और उसके बदले कितना किया जाना चाहिए काम</p>
<p>तुम्हें लगता है वापस लौट गए हो<br />
बारह बरस पहले की अपनी उसी गर्म और उमस भरी उर्वर दुनिया में<br />
जहाँ कभी इस छोर से उस छोर तक<br />
नौकरी खोजते भटका करते थे तुम</p>
<p>सपने में दिखती छायाओं -से<br />
अब तुम्हें दिखने लगे हैं अपने जन<br />
किसी तरह रोटी कमाते<br />
काम पर जाते<br />
भीतर ही भीतर रोते- सुलगते<br />
किसी बड़े समर की तैयारी में जीवन की कई छोटी-छोटी लड़ाईयां हार जाते<br />
वे अपने जन जिनसे<br />
तुम दूर होते जा रहे थे<br />
लफ्ज़-दर-लफ्ज़</p>
<p>कहो कैसे हो शिरीष अब तो कहो ?<br />
जबकि भूला हुआ है वह सभी कुछ जिसे तुम भूल जाना चाहते थे<br />
अपने होशो -हवास में</p>
<p>अब अगर तुम अपने भीतर के द्वार खटखटाओ<br />
तो तुम्हें सुनाई देगी<br />
सबसे बुरे समय की मुसलसल पास आती पदचाप</p>
<p>अब तुम्हारा बोलना<br />
कहीं ज़्यादा अर्थपूर्ण और<br />
मंतव्यों भरा होगा !<br />
2007</p>
<p>***</p>
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		</media:content>

		<media:content url="http://shirishmourya.files.wordpress.com/2010/01/sleeping-pills.jpg" medium="image">
			<media:title type="html">Sleeping-Pills</media:title>
		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>टामस ट्रांसट्रोमर (तोमास त्रांसत्रोमर)-शंघाई की सड़कें</title>
		<link>http://shirishmourya.wordpress.com/2010/01/10/%e0%a4%9f%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%b8-%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%ae%e0%a4%b0-%e0%a4%a4%e0%a5%8b%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b8/</link>
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		<pubDate>Sun, 10 Jan 2010 07:32:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>shirishmourya</dc:creator>
				<category><![CDATA[अनुवाद - टामस ट्रांसट्रोमर (तोमास त्रांसत्रोमर)]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://shirishmourya.wordpress.com/?p=67</guid>
		<description><![CDATA[1950 के बाद से टामस ट्रांसट्रोमर (तोमास त्रांसत्रोमर) लगातार स्वीडिश कविता का सबसे महत्वपूर्ण चेहरा बने हुए हैं। आधुनिक स्वीडिश कविता का कोई भी जिक्र उनके बिना अधूरा होगा। नोबेल के इस देश में उनका नाम पिछले पांच दशकों से अधिक समय से न सिर्फ कवि-अनुवादक, बल्कि एक मनोविज्ञानी के रूप में भी एक स्थापित [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=shirishmourya.wordpress.com&amp;blog=10965121&amp;post=67&amp;subd=shirishmourya&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>1950 के बाद से टामस ट्रांसट्रोमर (तोमास त्रांसत्रोमर) लगातार स्वीडिश कविता का सबसे महत्वपूर्ण चेहरा बने हुए हैं। आधुनिक स्वीडिश कविता का कोई भी जिक्र उनके बिना अधूरा होगा। नोबेल के इस देश में उनका नाम पिछले पांच दशकों से अधिक समय से न सिर्फ कवि-अनुवादक, बल्कि एक मनोविज्ञानी के रूप में भी एक स्थापित और चर्चित नाम है।</p>
<p style="text-align:center;"><strong>शंघाई की सड़कें</strong></p>
<p style="text-align:center;"><a href="http://shirishmourya.files.wordpress.com/2010/01/nanjingrd.gif"><img class="aligncenter size-medium wp-image-68" title="nanjingrd" src="http://shirishmourya.files.wordpress.com/2010/01/nanjingrd.gif?w=300&#038;h=252" alt="" width="300" height="252" /></a></p>
<p><strong>एक</strong></p>
<p>पार्क में<br />
कई लोग ध्यान से देख रहे हैं<br />
सफेद तितलियों को<br />
मुझे वह तितली बहुत पसन्द है<br />
जो खुद ही जैसे सत्य का फड़फड़ाता हुआ<br />
कोना है कोई</p>
<p>सूरज के उगते ही<br />
दौड़ती-भागती भीड़ हमारे इस खामोश ग्रह को<br />
गतिमान बना देती है<br />
और तब पार्क भर जाता है<br />
लोगों से</p>
<p>हर आदमी के पास आठ-आठ चेहरे होते हैं<br />
नगों-से चमचमाते<br />
गलतियों से बचने के वास्ते<br />
हर आदमी पास एक अदृश्य चेहरा भी होता है<br />
जो जताता है -<br />
&#8221; कुछ है जिसके बारे में आप बात नहीं करते!&#8221;</p>
<p>कुछ जो थकान के क्षणों में प्रकट होता है<br />
और इतना तीखा है<br />
जैसे किसी जानदार शराब का एक घूंट<br />
उसके बाद में महसूस होने वाले<br />
स्वाद की तरह</p>
<p>तालाब में हमेशा हिलती-डुलती रहती हैं मछलियां<br />
सोते में भी तैरती वे<br />
आस्थावान होने के लिए एक मिसाल हैं -हमेशा गतिवान</p>
<p>***</p>
<p><strong>दो</strong></p>
<p>अब यह दोपहर है<br />
सलेटी समुद्री हवा धुलते हुए कपड़ों-सी<br />
फड़फड़ाती है<br />
उन साइकिल सवारों के ऊपर<br />
जो चले आते हैं<br />
एक दूसरे से चिपके हुए<br />
एक समूह में<br />
किनारे की खाइयों से बेखबर</p>
<p>मैं घिरा हुआ हूं किताबी चरित्रों से<br />
लेकिन<br />
उन्हें अभिव्यक्त नहीं कर सकता<br />
निरा अनपढ़ हूं मैं</p>
<p>और<br />
जैसी कि उम्मीद की गई मुझसे<br />
मैंने कीमतें चुकाई हैं<br />
और मेरे पास हर चीज की रसीद है<br />
जमा हो चुकी हैं<br />
पढ़ी न जा सकने वाली ऐसी कई रसीदें<br />
-अब मैं एक पुराना पेड़ हूं इन्हीं मुरझाई पत्तियों वाला<br />
जो बस लटकती रहती हैं<br />
मेरे शरीर से<br />
धरती पर गिर नहीं पातीं</p>
<p>समुद्री हवाओं के तेज झोंके<br />
इनमें सीटिया बजाते हैं।</p>
<p>***</p>
<p><strong>तीन</strong></p>
<p>सूरज के डूबते ही<br />
दौड़ती-भागती भीड़ हमारे इस खामोश ग्रह को<br />
गतिमान बना देती है</p>
<p>हम सब<br />
सड़क के इस मंच पर खड़े हुए<br />
कलाकार हैं जैसे</p>
<p>यह भरी हुई है लोगों से<br />
किसी छोटी नाव के<br />
डेक की तरह<br />
हम कहां जा रहे हैं?<br />
क्या वहां चाय के इतने कप हैं?<br />
हम खुद को सौभाग्यशाली मान सकते हैं<br />
कि हम समय पर पहुंच गए हैं<br />
इस सड़क पर</p>
<p>क्लास्ट्रोफोबिया* की पैदाइश को तो अभी<br />
हजार साल बाकी है !</p>
<p>यहां<br />
हर चलते हुए आदमी के पीछे<br />
एक सलीब मंडराती है<br />
जो हमें पकड़ना चाहती है<br />
हमारे बीच से गुज़रना<br />
हमारे साथ आना चाहती है</p>
<p>कोई बदनीयत चीज़<br />
जो हमारे पीछे से हम पर झपटना<br />
और कहना चाहती है -बूझो तो कौन?</p>
<p>हम लोग<br />
ज्यादातर खुश ही दिखाई देते हैं<br />
बाहर की धूप में<br />
जबकि हम अपने घावों से रिसते खून के कारण<br />
मर जाने वाले हैं</p>
<p>हम इस बारे में<br />
कुछ भी नहीं जानते!</p>
<p>अनुवाद &#8211; शिरीष कुमार मौर्य</p>
<p>____________</p>
<p>*चिकित्सा विज्ञान के अनुसार किसी बंद या संकरी जगह में होने का एक असामान्य भय.</p>
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	</item>
		<item>
		<title>यरूशलम से समुद्र तक और वापसी &#8211; येहूदा आमीखाई</title>
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		<pubDate>Tue, 05 Jan 2010 11:41:30 +0000</pubDate>
		<dc:creator>shirishmourya</dc:creator>
				<category><![CDATA[अनुवाद-येहूदा आमीखाई/धरती जानती है]]></category>

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		<description><![CDATA[मेरा किया हुआ यह अनुवाद अशोक पांडे और उससे दोस्ती के उन विरल दिनों के लिए, जब उसने मुझे येहूदा आमीखाई जैसे कवि से परिचित कराया और उसे अनुवाद करने के लिए उकसाया। ऐसे दिनों का संस्मरण हमेशा बाक़ी रहता है। आमीखाई की इन कविताओं के बीहड़ में भटकना मुझे आज भी बहुत अच्छा लगता [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=shirishmourya.wordpress.com&amp;blog=10965121&amp;post=64&amp;subd=shirishmourya&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>मेरा किया हुआ यह अनुवाद अशोक पांडे और उससे दोस्ती के उन विरल दिनों के लिए, जब उसने मुझे येहूदा आमीखाई जैसे कवि से परिचित कराया और उसे अनुवाद करने के लिए उकसाया। ऐसे दिनों का संस्मरण हमेशा बाक़ी रहता है। आमीखाई की इन कविताओं के बीहड़ में भटकना मुझे आज भी बहुत अच्छा लगता है और हमेशा लगता रहेगा।</p>
<p><a href="http://shirishmourya.files.wordpress.com/2010/01/5849905.jpg"><img class="aligncenter size-medium wp-image-65" title="5849905" src="http://shirishmourya.files.wordpress.com/2010/01/5849905.jpg?w=202&#038;h=300" alt="" width="202" height="300" /></a></p>
<p style="text-align:center;"><strong>यरूशलम से समुद्र तक और वापसी</strong></p>
<p><strong>1. बंद यरूशलम से </strong></p>
<p>मैं गया<br />
बंद यरूशलम से खुले समुद्र की तरफ़<br />
मानो किसी वसीयत के खुलने की तरफ़<br />
मैं गया पुरानी सड़क पर<br />
रामल्ला से कुछ पहले<br />
सड़क के किनारे अभी तक खड़े हैं<br />
ऊंचे-ऊंचे अजीब-से विमानघर<br />
विश्वयुद्ध में आधे तबाह<br />
वहां वे विमानों के इंजनों की जांच किया करते थे<br />
जिनका शोर चुप करा देता था सारी दुनिया को</p>
<p>महज उड़ने भर को उड़ना कोई छुपा ख़ज़ाना हो गया था तब<br />
मेरे पूरे जीवन के लिए!</p>
<p><strong> </strong></p>
<p><strong>2.आत्मा</strong></p>
<p>मैं यात्रा करता हूं<br />
यात्राएं दुनिया की आत्मा हैं<br />
वे बची रहती हैं हमेशा</p>
<p>यह बहुत आसान है -<br />
बढ़ते हुए पेड़ों और घास से भरा ण्क पहाड़ी ढलान<br />
और दूसरी तरफ़<br />
एक सूखा पहाड़ी ढलान ग़र्म हवाओं से झुलसा हुआ<br />
- मैं इनके बीच यात्रा करता हूं</p>
<p>धूप और बरसात का आसान-सा तर्क<br />
वरदान और अभिशाप<br />
न्याय और अन्याय<br />
- मैं इनके बीच यात्रा करता हूं</p>
<p>आकाश की हवा और धरती की हवा<br />
मेरे खिलाफ़ की और मेरे साथ की हवा<br />
ग़र्म और ठंडा प्रेम<br />
पक्षियों के प्रवास की तरह</p>
<p>- करो,<br />
यात्रा करो, मेरी कार !</p>
<p><strong> </strong></p>
<p><strong>3.मृत्यु से बहुत दूर नहीं</strong></p>
<p>लाटरून में<br />
पहाड़ पर की मृत्यु और इमारतों की ख़ामोशी से बहुत दूर नहीं -<br />
एक औरत खड़ी होती है<br />
सड़क के किनारे</p>
<p>उसके ठीक बाद<br />
एक नई चमचमाती कार<br />
किसी सुरक्षित स्थान तक खींच लिए जाने की प्रतीक्षा में</p>
<p>औरत बहुत सुंदर है<br />
उसका चेहरा, उसका आत्मविश्वास और उन्माद<br />
उसकी पोशाक एक प्रेम-पताका है</p>
<p>एक बहुत कामुक औरत<br />
जिसके भीतर खड़े रहते हैं उसके मृत पिता<br />
एक ख़ामोश आत्मा की तरह</p>
<p>मैं उन्हें जानता था जब वे जीवित थे<br />
जब उनसे आगे निकला<br />
मैंने उन्हें अपनी शुभकामनाएं दीं !</p>
<p><strong> </strong></p>
<p><strong>4.एक पुराना बस-स्टॉप</strong></p>
<p>मैं गुज़रा एक पुराने बस-स्टॉप से<br />
जहां मैं खड़ा होता था कई बरस पहले<br />
किसी दूसरी जगह जाने के लिए<br />
बस के इंतज़ार में</p>
<p>वहां मैं खड़ा होता था<br />
संभलता हुआ नुक़सान से पहले<br />
और ठीक होता हुआ दर्द से पहले<br />
मृत्यु से पहले ही पुनर्जीवित<br />
और<br />
प्रेम से भरा अलगाव से पहले</p>
<p>यहां मैं खड़ा होता था<br />
नारंगी के झुरमुटों में फूलों के खिलने की सुगंध<br />
इस एक ही दिन<br />
आने वाले तमाम दिनों के लिए मदहोश कर देती थी मुझे</p>
<p>बस-स्टॉप अब भी वहां है<br />
ईश्वर को अब भी पुकारा जाता है `जगह´<br />
और मैं कभी -कभी उसे कहता हूं `समय´</p>
<p><strong>5.सूरजमुखी के खेत</strong></p>
<p>सूरजमुखी के खेत<br />
पकते और सूखते हुए भूरे और तरतीब वाले<br />
अब सूरज को नहीं<br />
मीठी छांव को तलाशते हैं<br />
एक आंतरिक मृत्यु<br />
एक दराज़ का भीतरी भाग<br />
एक थैला गहरा जैसे आकाश<br />
उनका आने वाला संसार<br />
एक घर का अंधेरा<br />
एक आदमी का अंतर्तम !</p>
<p><strong> </strong></p>
<p><strong>6.मैं समुद्र-तट पर</strong></p>
<p>मैं समुद्र पर<br />
कई-कई रंगों वाली पालदार नावें<br />
तैरती हैं पानी पर<br />
उनके ठीक बाद मैं -<br />
एक छोटे डेक वाली भद्दी-बेढंगी<br />
तेल ढोने वाली नाव !<br />
मेरा शरीर भारी और सिर छोटा है<br />
सोचता या न सोचता हुआ</p>
<p>रेत पर मैंने देखा एक लड़की को<br />
एक बड़े तौलिए के नीचे लोगों के बीच कपड़े बदलना सीखते हुए<br />
क्या ही अद्भुत उसके शरीर का वह नाच<br />
कैसी वह छुपी हुई सर्पीली तत्परता<br />
कैसा वह संघर्ष पहनने और उतारने के बीच<br />
जैकब और उसके फ़रिश्ते के बीच<br />
प्रेमी और प्रेमिका के बीच</p>
<p>किसी मूर्ति के अनावरण की तरह<br />
उसके बदन से तौलिया गिर जाता है<br />
लड़की जीत जाती है<br />
वह हंसती है<br />
वह इंतज़ार करती है<br />
और शायद वे इंतज़ार करते हैं उसका<br />
किसी आंसुओं भरी जगह पर<br />
वह मुझसे ज़्यादा ख़ूबसूरत और जवान है<br />
पर उससे अधिक भविष्य जानता हूं मैं !</p>
<p><strong> </strong></p>
<p><strong>7.और मैं लौटता हूं</strong></p>
<p>और मैं यरूशलम लौटता हूं<br />
मैं बैठता हूं अपनी सीट पर<br />
लेकिन मेरी आत्मा खड़ी रहती है मेरे भीतर<br />
जैसे कि किसी सामूहिक प्रार्थना-सभा में<br />
करो, यात्रा करो, मेरी कार !</p>
<p>एक छोटे पहाड़ पर सड़क के किनारे<br />
जो टैंक खड़े रहते थे<br />
वे अब नहीं हैं<br />
अब वहां कारोब* के पेड़ हैं<br />
सूरज ढलते वक़्त एक नर कारोब और एक मादा कारोब<br />
उस दूसरे संसार में<br />
जो और कुछ नहीं बस निरा प्यार है<br />
हवा में उनकी पत्तियों की झंकार है<br />
मानो पवित्र वाद्ययंत्रों की झंकार तोलती हुई अतुलता को</p>
<p>और वह छाया<br />
जो अभी नमूदार होगी और कहलाएगी रात<br />
और हम<br />
जो पुकारे जायेंगे हमारे पूरे नामों से<br />
जिनसे पुकारा जाता है सिर्फ़ मृत्यु के समय<br />
`दोबारा कभी नहीं´ वाली रात फिर आयेगी</p>
<p>मैं लौटता हूं<br />
यरूशलम में अपने घर की तरफ़</p>
<p>और हमारे नाम !<br />
- वे तो खो जायेंगे इन्हीं पहाड़ों में<br />
खोजियों के मुख से निकली<br />
पुकारों की तरह !<br />
***<br />
* इज़रायल में पाया जाने वाला एक पेड़.<br />
____________________________________________________<br />
इस श्रृंखला के सभी अनुवाद विख्यात अनुवादक अशोक पांडे के सानिध्य में संवाद प्रकाशन से छपी पुस्तक &#8220;धरती जानती है&#8221; के रूप में प्रकाशित.</p>
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	</item>
		<item>
		<title>पहाड़</title>
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		<pubDate>Fri, 01 Jan 2010 14:31:25 +0000</pubDate>
		<dc:creator>shirishmourya</dc:creator>
				<category><![CDATA[शब्दों के झुरमुट में]]></category>

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		<description><![CDATA[मैं जब भी उनके बारे में सोचता हूँ चले आते हैं एक के बाद एक छोटे-बड़े कई सारे पहाड़ और खड़े हो जाते हैं मेरी देह और आत्मा के अँधेरे सूंसाट में मेरे भीतर देर तक वे खड़े रहते हैं चुपचाप मैं उन्हें देखता हूँ और मेरी चढ़ाई चढ़ती सांसों के उत्तप्त वलय उनसे मिलते [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=shirishmourya.wordpress.com&amp;blog=10965121&amp;post=59&amp;subd=shirishmourya&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>मैं जब भी<a href="http://shirishmourya.files.wordpress.com/2010/01/himalayan-mountains1.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-61" title="himalayan-mountains" src="http://shirishmourya.files.wordpress.com/2010/01/himalayan-mountains1.jpg?w=300&#038;h=214" alt="" width="300" height="214" /></a><br />
उनके बारे में सोचता हूँ<br />
चले आते हैं<br />
एक के बाद एक<br />
छोटे-बड़े<br />
कई सारे पहाड़<br />
और खड़े हो जाते हैं<br />
मेरी देह और आत्मा के<br />
अँधेरे सूंसाट में</p>
<p>मेरे भीतर<br />
देर तक वे खड़े रहते हैं<br />
चुपचाप<br />
मैं उन्हें देखता हूँ<br />
और<br />
मेरी चढ़ाई चढ़ती सांसों के<br />
उत्तप्त वलय<br />
उनसे मिलते हैं</p>
<p>वे थोड़ा सा हिलते हैं और हो जाते हैं<br />
ख़ामोश<br />
उन्हीं पर खड़े हो कर<br />
कभी कभार<br />
मैं अपने आसपास पुकार दिया करता हूँ<br />
मेरी ज़िन्दगी में शामिल<br />
कोई नाम</p>
<p>मैं चाहता हूँ<br />
मेरे भीतर बढ़ता रहे<br />
उनका क़द<br />
उर्वर होते रहे<br />
उनके ढलान<br />
जंगल घने और ज़मीन<br />
ठोस होती रहे</p>
<p>उनकी चट्टानें<br />
पकती रहें मेरे रक्त की<br />
आंच में</p>
<p>मैं सोचता हूँ<br />
तो मेरे अतीत का<br />
और मेरे भविष्य का<br />
एक एक<br />
दिन बोलता है</p>
<p>मैं बदल जाना चाहता हूँ<br />
ख़ुद एक पहाड़ में.<br />
***<br />
रचनाकाल -1995</p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/shirishmourya.wordpress.com/59/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/shirishmourya.wordpress.com/59/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/shirishmourya.wordpress.com/59/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/shirishmourya.wordpress.com/59/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/shirishmourya.wordpress.com/59/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/shirishmourya.wordpress.com/59/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/shirishmourya.wordpress.com/59/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/shirishmourya.wordpress.com/59/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/shirishmourya.wordpress.com/59/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/shirishmourya.wordpress.com/59/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/shirishmourya.wordpress.com/59/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/shirishmourya.wordpress.com/59/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/shirishmourya.wordpress.com/59/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/shirishmourya.wordpress.com/59/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=shirishmourya.wordpress.com&amp;blog=10965121&amp;post=59&amp;subd=shirishmourya&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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		</media:content>

		<media:content url="http://shirishmourya.files.wordpress.com/2010/01/himalayan-mountains1.jpg?w=300" medium="image">
			<media:title type="html">himalayan-mountains</media:title>
		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>नया साल</title>
		<link>http://shirishmourya.wordpress.com/2009/12/31/%e0%a4%a8%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b2/</link>
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		<pubDate>Thu, 31 Dec 2009 13:53:59 +0000</pubDate>
		<dc:creator>shirishmourya</dc:creator>
				<category><![CDATA[शब्दों के झुरमुट में]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://shirishmourya.wordpress.com/?p=55</guid>
		<description><![CDATA[  मुझे कुछ ग़लतियों की कथा कहनी है                                      स्वीकार करना है कुछ को कुछ को भूल जाना है और नट जाना है कुछ से तो साफ़ ही     इस तरह करना है प्रवेश नए साल में कहते हैं परम्परा है कुछ ऐसी ही ***<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=shirishmourya.wordpress.com&amp;blog=10965121&amp;post=55&amp;subd=shirishmourya&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div><a href="http://shirishmourya.files.wordpress.com/2009/12/w020090720407049547893.jpg"><img class="aligncenter size-medium wp-image-56" title="W020090720407049547893" src="http://shirishmourya.files.wordpress.com/2009/12/w020090720407049547893.jpg?w=300&#038;h=203" alt="" width="300" height="203" /></a> </div>
<div>मुझे कुछ</div>
<div>ग़लतियों की कथा</div>
<div>कहनी है</div>
<div>                                    </div>
<div>स्वीकार करना है</div>
<div>कुछ को</div>
<div>कुछ को</div>
<div>भूल जाना है</div>
<div>और नट जाना है कुछ से तो</div>
<div>साफ़ ही  </div>
<div> </div>
<div>इस तरह करना है</div>
<div>प्रवेश</div>
<div>नए साल में</div>
<div>कहते हैं</div>
<div>परम्परा है कुछ ऐसी ही</div>
<div>***</div>
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		<title>जिसकी दुनिया रोज़ बनती है !</title>
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		<pubDate>Tue, 29 Dec 2009 13:52:27 +0000</pubDate>
		<dc:creator>shirishmourya</dc:creator>
				<category><![CDATA[समीक्षा]]></category>

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		<description><![CDATA[                                                          हर उस आदमी की एक नहीं कई प्रिय पुस्तकें होती हैं, जो किताबों की दुनिया में रहता है। मैं भी किसी हद तक इस दुनिया में रहता हूँ और ऐसी दस किताबें हैं, जिन्हें मैं  `मेरी प्रिय पुस्तक´ कह सकता हूँ। इन दस में पाँच कविता संकलन हैं और इन्हीं में शामिल है आलोक [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=shirishmourya.wordpress.com&amp;blog=10965121&amp;post=50&amp;subd=shirishmourya&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>                   <a href="http://shirishmourya.files.wordpress.com/2009/12/alokdhanwa.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-51" title="alokdhanwa" src="http://shirishmourya.files.wordpress.com/2009/12/alokdhanwa.jpg?w=170&#038;h=223" alt="" width="170" height="223" /></a>                                       हर उस आदमी की एक नहीं कई प्रिय पुस्तकें होती हैं, जो किताबों की दुनिया में रहता है। मैं भी किसी हद तक इस दुनिया में रहता हूँ और ऐसी दस किताबें हैं, जिन्हें मैं  `मेरी प्रिय पुस्तक´ कह सकता हूँ। इन दस में पाँच कविता संकलन हैं और इन्हीं में शामिल है आलोक धन्वा का बमुश्किल अस्तित्व में आया संकलन `दुनिया रोज़ बनती है´। किताब के नाम में ही विद्वजन चाहें तो विखंडन और संरचना की अंतहीन बहस निकाल सकते हैं और यूरोपीय साहित्य-दर्शन की शरण भी ले सकते हैं। मेरे लिए तो यह वाकई उसी साधारण दुनिया की एक असाधारण झलक है जो रोज़ बनती है और बनती इसलिए है क्योंकि रोज़ उजड़ती भी है। आलोक धन्वा की यह दुनिया, वही दुनिया है जिसमें हम-आप-सब रहते हैं। हम भी उजड़ते और बनते हैं। आलोक धन्वा हमारे इस उजड़ने और बनने को साथ-साथ देखते हैं। दो विरोधी लेकिन पूरक जीवनक्रियाओं का यह विलक्षण कवि हमारे बीच एक कविता संकलन के साथ उपस्थित है, मेरे लिए यह बड़ी बात है।</p>
<p>आलोक धन्वा के कवि ने जिस दुनिया में आंखें खोलीं, वह मेरे जन्म से पहले की दुनिया थी लेकिन यही वह दुनिया थी जिसकी लगातार बढ़ती हुई गूँज से ही मैं आज अपनी दुनिया की शिनाख्त कर पाता हूँ । नक्सलबाड़ी के उस दौर में आलोक धन्वा बेहद सपाट लेकिन उतने ही प्रभावशाली क्रोध के कवि दिखाई पड़ते हैं। 1972 में लिखी जनता का आदमी हो या गोली दागो पोस्टर &#8211; आलोक धन्वा का अपने विचार के प्रति समर्पण ऊपरी तौर से बेहद उग्र और भीतर से काफी सुचिंतित नज़र आता है। कहने की ज़रूरत नहीं कि 70 के बाद की एक पूरी काव्यपीढ़ी ही उस एक विचार की देन है। आलोक धन्वा इस दुनिया में अपनी आग जैसी रोशन और दहकती उपस्थिति दर्ज कराते हैं। भीतर-भीतर यही सुगबुगाहट किंचित नए रूप में जारी रहती है, जिसकी अभिव्यक्ति `भूखा बच्चा´ और शंख के बाहर´ जैसी छोटे आकार की कविताओं में दिखती है। 1976 में वे एक लम्बी कविता `पतंग´ लेकर आते हैं। यह कविता उसी विचार को ज्यादा सघन या सान्द्र रूप में प्रस्तुत करती है, जिससे आलोक धन्वा ने अपनी यात्रा शुरू की और मुझे पूरा विश्वास है कि इसमें उनकी आस्था अंत तक बनी रहेगी। कविता की शुरूआती पंक्तिया हैं -</p>
<p>उनके रक्त से ही फूटते हैं पतंग के धागे <br />
और हवा की विशाल धाराओं तक उठते चले जाते हैं<br />
जन्म से ही कपास वे अपने साथ लाते हैं</p>
<p>- इसे बूझना कठिन नहीं कि किन लोगों की बात यहाँ की जा रही है। इस कविता में ही आलोक धन्वा की काव्यभाषा और बिम्बों में बदलाव के कुछ संकेत भी मौजूद हैं -</p>
<p>धूप गरुड़ की तरह बहुत ऊपर उड़ रही हो<br />
या फल की तरह बहुत पास लटक रही हो -<br />
हलचल से भरे नींबू की तरह समय हरदम उनकी जीभ पर<br />
रस छोड़ता रहता है</p>
<p>- यह कविता आँधियों, भादो की सबसे काली रातों, मेघों और बौछारों और इस सबमें शरण्य खोजती डरी हुई चिडियों के ब्योरों मे उतरती हुई अचानक फिर अपनी पुरानी शैली में एक बयान देती है -</p>
<p>चिडियाँ बहुत दिनों तक जीवित रह सकती हैं<br />
अगर आप उन्हें मारना बंद कर दें<br />
बच्चे बहुत दिनों तक जीवित रह सकते हैं<br />
अगर आप उन्हें मारना बन्द कर दें &#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.बच्चों को मारने वाले शासको<br />
सावधान<br />
एक दिन आपको बर्फ में फेंक दिया जाएगा</p>
<p>- यहाँ आकर पता चलता है कि यह पतंग दरअसल किस दिशा में जा रही है। इसी कविता के तीसरे खंड में फिर भाषा और बिम्बों का वहीं संसार दिखाई देने लगता है, जिससे यह कविता शुरू हुई थी -</p>
<p>सवेरा हुआ<br />
खरगोश की आंखों जैसा लाल सवेरा<br />
शरद आया पुलों को पार करते हुए<br />
अपनी नई चमकीली साइकिल तेज़ चलाते हुए</p>
<p>- पूरी कविता में मौसम का बदलना और उसके साथ पतंग उड़ाने वालों का छत के खतरनाक किनारों से गिरकर भी बच जाना और फिर उन बचे हुए पैरों के पास पृथ्वी का तेज़ी से घूमते हुए आना &#8211; ये सब उसी जगह की ओर संकेत करते हैं, जहाँ से आम जन का संघर्ष और आलोक धन्वा की कविता जन्म लेती है। यहाँ फर्क भाषा और बिम्बपरक अभिव्यक्ति भर का है &#8211; आक्रोश और उसके उपादान वही पुराने हैं। मैं कभी नहीं भूलता लखनऊ दूरदर्शन पर आलोक धन्वा का वह काव्यपाठ, जिसमें वे इसी कविता को इतनी आश्वस्तकारी नाटकीयता के साथ पढ़ते हैं कि सुनने वाला स्तब्ध रह जाता है। शायद यही कारण है कि उस कविता-पाठ में मौजूद चार-पाच बड़े कवियों में से मुझे आज सिर्फ़ आलोक धन्वा का वह दुबला और कठोर चेहरा याद है। अगर मैं कहूँ कि संजय चतुर्वेदी की `भारतभूषण पुरस्कृत -पतंग´ की प्रेरणा भी आलोक धन्वा से ही आयी होगी तो संजय भाई शायद इस बात का बुरा नहीं मानेंगे &#8211; यहाँ मैं सिर्फ़ आरंभिक प्रभाव की बात कर रहा हूँ , काव्यात्मक मौलिकता की नहीं।<br />
***<br />
1979 में आलोक धन्वा फिर एक लम्बी कविता के साथ उपस्थित होते हैं। `कपड़े के जूते´ नामक यह कविता `पहल´ में छपी और पहल वो पत्रिका है जिससे आज के कई बड़े कवियों का जन्म हुआ है। मैं अनुमान लगा सकता हूँ कि वहीं से आलोक धन्वा ने किंचित भिन्न भौगोलिक और सामाजिक परिवेश से आए अरुण कमल, राजेश जोशी, मनमोहन, वीरेन डंगवाल और मंगलेश डबराल जैसे अपने कई समानधर्मा युवा साथियों को पहली बार पहचाना होगा। रेल की पटरी के किनारे पड़े कैनवास के सफ़ेद परित्यक्त जूतों के थोड़े बोझिल विवरण के साथ कविता शुरू होती है लेकिन कुछ ही पंक्तियो बाद वह इस दृश्य के साथ अचानक एक बड़ा आकार लेने लगती है -</p>
<p>ज़मीन की सबसे बारीक़ सतह पर तो<br />
वे जूते अंकुर भी रहे हैं</p>
<p>- यहाँ आलोक इन जूतों और उसी सदा चमकते हुए विचार और जोश के साथ अनगिन वंचितों, पीड़ितों और ठुकराए-सताए गए अपने प्रियतर लोगों की दुनिया में एक नई और अनोखी यात्रा आरम्भ कर देते हैं। वे खिलाडियों, सैलानियों की आत्माओं, चूहों, गड़रियों, नावों से लेकर ज़मीन, जानवर और प्रकृति तक के नए-नए अर्थ-सन्दर्भ खोलते हुए कविता को ऐसे उदात्त अन्त तक पहुंचाते हैं -</p>
<p>मृत्यु भी अब उन जूतों को नहीं पहनना चाहेगी<br />
लेकिन कवि उन्हें पहनते हैं<br />
और शताब्दियाँ पार करते हैं।</p>
<p>इस कविता में विचार समेत कई मानवीय भावनाओं का तनाव टूटने की हद तक खिंचता है और फिर एक ऐसे शानदार आत्मकथ्य में बदल जाता है, जो सारे कवियों का आत्मकथ्य हो सकता है।<br />
***<br />
1988 के साथ ही समय बदलता है। आलोक धन्वा की कविता में भी ये बदलाव नज़र आते हैं। यहाँ से ही उनकी कविता स्त्रियों के एक विशाल, जटिल और गरिमामय संसार की ओर मुड़ जाती है। आलोक धन्वा से पहले और उनके साथ भी स्त्रियों पर कई कवि लिखते रहे हैं। आधुनिक हिन्दी कविता में निराला की सरोज-स्मृति, स्फटिक शिला और वह तोड़ती पत्थर में पहली बार स्त्रियों के प्रति एक विरल काव्य-संवेदना जन्म लेती दिखाई देती है, जिसका विकास नागार्जुन, शमशेर, त्रिलोचन, चन्द्रकान्त देवताले, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर, विष्णु खरे, मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल, असद ज़ैदी, विमल कुमार आदि तक कई-कई रूपों में देखने को मिलता है। आलोक धन्वा इस राह के बेहद संवेदनशील और समर्पित राही हैं। उनकी ऐसी कविताओं में ठीक वही गरिमा और सौन्दर्य मौजूद है, जो निराला में था। मुझे लगता है इस परम्परा में अगर पाँच-छह ही नाम लेने पड़ें तो मेरे लिए वो निराला, नागार्जुन, चन्द्रकान्त देवताले, रघुवीर सहाय, आलोक धन्वा और असद ज़ैदी होंगे। आलोक धन्वा की कविता में इस दौर की औपचारिक शुरूआत 1988 के आसपास से होती है। हम देख सकते हैं इस ओर मुड़ने में उन्होंने काफ़ी समय लिया। ऐसा इसलिए क्योंकि निश्चित रूप से वे उस जटिलता को व्यक्त करने के जोखिम जानते हैं, जिसे हम आम हिन्दुस्तानी स्त्री का अन्तर्जगत कहते हैं।</p>
<p>1988 में लिखी भागी हुई लड़किया उनकी प्रसिद्ध कविताओं में से एक है। इसमें आलोक धन्वा ने एक ऐसे संसार को हिन्दी जगत के सामने रखा जो आंखों के सामने रहते हुए भी अब तक लगभग अप्रस्तुत ही था। किसी लड़की के घर से भाग जाने का हमारे औसत भारतीय समाज में क्या आशय है, यह बहुत स्पष्ट बात है। जिस समाज में विशिष्ट सामन्ती परम्पराओं और आस्थाओं के चलते औरत की यौनशुचिता को ही आदमी की इज्जत माना जाता हो, वहाँ बेटी का प्रेम में पड़ना और फिर घर से भाग जाना अचानक आयी किसी दैवीय विपदा से कम नहीं होता। इक्कीसवीं सदी में भी जब पंचायतें ऐसी लड़कियों और प्रेमियों को सरेआम कानून की धज्जिया¡ उड़ाते हुए फांसी पर लटका देती हैं, तब आलोक धन्वा की ये पंक्तियाँ हमें अपने भीतर झाँकने का एक मौका देती हैं -</p>
<p>घर की ज़जीरें<br />
कितना ज़्यादा दिखाई पड़ती हैं<br />
जब घर से कोई लड़की भागती है</p>
<p>- ये स्त्रीविमर्श से अधिक कुछ है। साहित्यिक विमर्श के आईने में ही देखें तो ये भागी हुई लड़कियां प्रभा खेतान की तरह सम्पन्न नहीं हैं और न ही अनामिका की तरह विलक्षण बुद्धि-प्रतिभा की धनी हैं। ये तो हमारे गली-मोहल्लों की बेहद साधारण लड़कियां हैं। प्रभा खेतान या अनामिका का स्त्रीविमर्श इनके लिए शायद कुछ नहीं कर सकता। इनके दु:ख और यातना दिखा देने में ख़ुद विमर्श की मुक्ति भले ही हो, इन लड़कियों की मुक्ति कहीं नहीं है। उनका घर से भाग जाना महज एक पारिवारिक घटना नहीं, बल्कि एक जानलेवा सामाजिक प्रतिरोध भी है। वे अपने आप को जोखिम डालती हुई अपने बाद की पीढ़ी के लिए सामाजिक बदलाव का इतिहास लिखने की कोशिश करती हैं। ये प्रेम किसी प्रेमी के बजाए उस संसार के प्रति ज्यादा है, जिसमें एक दिन उनकी दुनिया की औरतें खुलकर साँस ले सकेंगी। हमारे सामन्ती समाज को समझाती हुई कितनी अद्भुत समझ है ये कवि की -</p>
<p>तुम्हारे टैंक जैसे बन्द और मजबूत घर से बाहर<br />
लड़कियां काफ़ी बदल चुकी हैं<br />
मैं तुम्हें यह इजाज़त नहीं दूँगा<br />
कि तुम अब<br />
उनकी सम्भावना की भी तस्करी करो</p>
<p>- आलोक धन्वा की कविता में वे लड़कियां घर से भाग जाती हैं क्योंकि वे जानती हैं कि उनकी अनुपस्थिति दरअसल उनकी उपस्थिति से कहीं अधिक गूंजेगी । वे लड़कियां अपने अस्तित्व की इस गूँज के लिए भागती हैं और तब तक भागती रहेंगी जब तक कि घर और समाज में उनकी उपस्थिति, अनुपस्थिति से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं हो जाती। ऐसी लड़कियों के सामाजिक बहिष्कार करने या उन्हें जान से मार देने वाली बर्बर पुरुषवादी मानसिकता को पहली बार कविता में इस तरह से एक अत्यन्त मार्मिक किन्तु खुली चुनौती दी गई है -</p>
<p>उसे मिटाओगे<br />
एक भागी हुई लड़की को मिटाओगे<br />
उसके ही घर की हवा से<br />
उसे वहाँ से भी मिटाओगे<br />
उसका जो बचपन है तुम्हारे भीतर<br />
वहाँ से भी<br />
मैं जानता हूँ<br />
कुलीनता की हिंसा !</p>
<p>- यदि आलोक धन्वा की प्रवृत्ति बदलाव के स्वप्न और सामाजिक वास्तविकता के बीच झूलते रहने की ही होती तो वे कभी न लिखते -</p>
<p>लड़की भागती है<br />
जैसे सफ़ेद घोड़े पर सवार<br />
लालच और जुए के आरपार<br />
जर्जर दूल्हों से<br />
कितनी धूल उठती है</p>
<p>- और साथ ही यह भी कि</p>
<p>लड़की भागती है<br />
जैसे फूलों में गुम होती हुई<br />
तारों में गुम होती हुई<br />
तैराकी की पोशाक में दौड़ती हुई<br />
खचाखच भरे जगरमगर स्टेडियम में</p>
<p>- वे सिर्फ़ लड़की के भागने की बात नहीं कहते बल्कि उसके मूल में मौजूद सामाजिक कारणों को भी स्पष्ट करते हैं। वे जब उसे तैराकी की पोशाक में जगरमगर स्टेडियम में दौड़ते हुए दिखाते हैं तो अपने बर्बर सामन्ती समाज में हावी वर्जनाओं और पाशविकता के अन्तिम द्वार को भी तोड़ देने की एक निजी लेकिन ज़रूरी कोशिश करते हैं। उनकी इस कोशिश में वे कहाँ तक जाते हैं ये भी देखने चीज़ है -</p>
<p>तुम जो<br />
पत्नियों को अलग रखते हो<br />
वेश्याओं से<br />
और प्रेमिकाओं को अलग रखते हो<br />
पत्नियों से<br />
कितना आतंकित होते हो<br />
जब स्त्री बेखौफ भटकती है<br />
ढूंढती हुई अपना व्यक्तित्व<br />
एक ही साथ वेश्याओं और पत्नियों<br />
और प्रेमिकाओं में !</p>
<p>- मुझे लगता है कि अपनी कविता में इस सच से आँख मिलाने वाला यह विलक्षण कवि अपनी ज़िन्दगी में भी इससे ज़रूर दो-चार हुआ होगा। कविता में भी उसने इस सच को एक गरिमा दी है और कविता में झलकती उसकी आत्मा का यक़ीन करें तो अपने जीवन में भी वह इससे ऐसे ही पेश आयेगा। इस कविता का जो झकझोरने वाला अन्त है, वह तो बिना किसी वास्तविक और जीवन्त अनुभव के आ ही नहीं सकता। इस अन्त में करुणा और शक्ति एक साथ मौजूद हैं। इतना सधा हुआ अन्त कि दूसरी किसी बहुत बड़ी कविता की शुरूआत-सा लगे। जहाँ तक मैं जानता हूँ समकालीन परिदृश्य पर इस भावात्मक लेकिन तार्किक उछाल में आलोक धन्वा की बराबरी करने वाले कवि बहुत कम हैं।<br />
***<br />
1989 में आलोक धन्वा ने बहुत कम पृष्ठों में एक महाकाव्य रचा, जिसे हिन्दी संसार `ब्रूनों की बेटियाँ´ नामक लम्बी कविता के रूप में जानता है। मुक्तिबोध की कुछ लम्बी कविताओं के अलावा मेरे लिए यह किसी कविता के इतना उदात्त हो सकने का एक दुर्लभतम उदाहरण है। एक कवि ख़ुद भी अपने विषय की ही तरह एक दुर्निवार आग में जलता हुआ अनाचार और पाशविकता के विरुद्ध किस तरह प्रतिरोध का एक समूचा संसार खड़ा करता है, इसे जानना हो तो यह कविता पढ़िये और इस सच को भी स्वीकार कर लीजिये कि इसके पहले एकाग्र पाठ के साथ ही आप भी अपने भीतर उतने साबुत नहीं बचेंगे। मैंने वाचस्पति जी (अब काशीवासी) के निजी पुस्तकालय से पहल का एक पुराना अंक निकालकर जब पहली बार इसे पढ़ा, तब शायद मैं 18-19 बरस का था। मुझे नहीं पता था कि इस पत्रिका के उन धूल भरे पीले पन्नों में एक आग छुपी होगी। जैसा कि होना ही था, मैं इस आग में कई दिन जलता रहा। नागार्जुन की हरिजनगाथा मेरी स्मृति में थी लेकिन यह कविता तो जैसे अपने साथ एक खौलता हुआ लावा लेकर बह रही थी, जिससे बचना नामुमकिन था। लेकिन मैं यह भी कहना चाहूँगा कि इस अद्भुत कविता में आलोक धन्वा स्त्रियों के संसार में दाखिल होकर भी एक ख़ास किस्म की वर्ग चेतना से मुक्त नहीं हो पाते -</p>
<p>रानियाँ मिट गईं<br />
जंग लगे टिन जितनी कीमत भी नहीं<br />
रह गई उनकी याद की<br />
रानियाँ मिट गई<br />
लेकिन क्षितिज तक फ़सल काट रही औरतें<br />
फ़सल काट रही है</p>
<p>- यहाँ आकर मैं कथ्य के स्तर पर कवि से थोड़ा असहमत हो जाता हूँ । रानियाँ हों कि किसान औरतें &#8211; मेरी वर्ग चेतना के हिसाब से वे एक ही श्रेणी में आती हैं। रानी होना उन औरतों की प्रस्थिति मात्र थी, वरना थीं तो वे भी औरतें ही। उतनी ही जकड़ी हुई। मैं यहाँ तर्कजनित इतिहासबोध की बात कर रहा हूँ । कोई कैसे भुला सकता है, जौहर या सती जैसी कलंकित प्रथाओं को। भारतीय इतिहास में उन्हें भी हमेशा जलाया ही गया। इस कविता की औरतें ग़रीब और दलित भी हैं, इसलिए उनके अस्तित्व की अपनी मुश्किलें हैं लेकिन रानियों का यह चलताऊ ज़िक्र इस कविता के अन्त को थोड़ा हल्का बनाता है। बहरहाल मैं इस कविता की अपनी व्याख्या में अधिक नहीं जाना नहीं चाहता क्योंकि फिर वहाँ से लौटना मेरे लिए हर बार और भी मुश्किल होता जाता है। इस कविता ने मुझे आख्यान रचने की एक समझ दी है और परिणाम स्वरूप आज मेरे पास ख़ुद की कुछ लम्बी कविताएँ हैं। जब अग्रज सलाह देते हैं कि लम्बी कविता लिखनी है तो मुक्तिबोध को पढ़ो, तब वे आलोक धन्वा को भूल क्यों जाते हैं? मैं इस इलाक़े में कदम रखते हुए हमेशा ही मुक्तिबोध के अलावा आलोक धन्वा और विष्णु खरे को भी याद रखता हूँ । आज के समय में मेरे लिए ये दोनों ही लम्बे शिल्प के कविगुरू हैं।<br />
***<br />
1992 में लिखी छतों पर लड़कियां मुझे भागी हुई लड़कियों की कविता का आरिम्भक टुकड़ा जैसी लगती है जबकि उसे 4 साल बाद लिखा गया। उसी वर्ष में लिखी चौक कविता मेरे लिए आलोक धन्वा की एक बेमिसाल कविता है, जिसकी शुरूआती पंक्तियाँ न सिर्फ़ काव्यसाधना बल्कि एक अडिग भावसाधना का भी प्रमाण हैं -</p>
<p>उन स्त्रियों का वैभव मेरे साथ रहा<br />
जिन्होंने मुझे चौक पार करना सिखाया !</p>
<p>- ये स्त्रियाँ ग़रीब मेहनकश स्त्रियाँ हैं जो हर सुबह अपनी आजीविका के लिए बरतन मांजने , कपड़े धोने या खाना पकाने जैसे कामों पर जाती हैं। ये भी ब्रूनो की वैसी ही बेटियाँ हैं जो ओस में भीगे अपने आँचल लिए अलसुब्ह काम पर निकल जाती हैं। कवि का स्कूल उनके रास्ते में पड़ता है इसलिए उसकी मां उसे उन्हें उनके हवाले कर देती है। क्या सिर्फ़ स्कूल के रास्ते में पड़ जाने का कारण ही पर्याप्त है? बड़ा कवि वह होता है जिसकी कविता में अनकहा भी मुखर होकर बोले। यहाँ वही अनकहा बोलता है &#8211; दरअसल वे स्त्रियाँ भी एक मां हैं। उन ग़रीब स्त्रियों के जिस वैभव की बात कवि कर रहा है, वह यही मातृत्व और विरल मानवीय सम्बन्धों का वैभव है। कई दशक बाद भी चौराहा पार करते कवि को वे स्त्रियाँ याद आती हैं और वह अपना हाथ उनकी ओर बढ़ा देता है। मुझे नहीं लगता कि यह सिर्फ़ अतीत का मोह है। मेरे लिए तो यह वर्तमान से विलुप्त होती कुछ ज़रूरी संवेदनाओं की शिनाख्त है। आलोक धन्वा `शरीर´ नामक तीन पंक्तियों की एक नन्हीं-सी कविता में लिखते हैं -</p>
<p>स्त्रियों ने रचा जिसे युगों में<br />
उतने युगों की रातों में उतने निजी हुए शरीर<br />
आज मैं चला ढूंढने अपने शरीर में</p>
<p>- मैं सोचता हूँ कि इस कविता की तीसरी पंक्ति में आज मैं चला ढूंढने के बाद &#8220;उसी निजता को&#8221; &#8211; ये तीन शब्द शायद छपने से रह गए है। इस तरह ये कविता पहली दृष्टि में एक पहेली-सी लगती है लेकिन इसके बाद छपी हुई और इसी वर्ष में लिखी हुई `एक ज़माने की कविता´ में यह गुत्थी सुलझने लगती है। कविता का शुरूआती बिम्ब ही बेहद प्रभावशाली है, जहाँ डाल पर फलों के पकने और उनसे रोशनी निकलने का एक अनोखा अनुभव हमें बांधता है। ये कौन से फल हैं, पकने पर जिनसे रोशनी निकलती है और यह पेड़ कैसा है? जवाब जल्द ही मिलता है, जब मेघों के घिरने और शाम से पहले ही शाम हो जाने पर बच्चों को पुकारती हुई मां गाँव के बाहर तक आ जाती है। इसके बाद आता है एक निहायत ही घरेलू लेकिन दुनिया भर के कविकौशल पर भारी यह दृश्य -</p>
<p>फ़सल की कटाई के समय<br />
पिता थके-मांदे लौटते<br />
तो मां कितने मीठे कंठ से बात करती</p>
<p>- पिता की थकान और मां की बातों की मिठास के अन्तर्सम्बन्ध का इस तरह कविता में आना दरअसल एक समूचे लोक का अत्यन्त सहज और कोमल किन्तु उतना ही दुर्लभ प्रस्फुटन है। इन तीन पंक्तियों में एक समूची दुनिया समाई है। मैं सोचता हूँ हिन्दी कविता में ऐसी कितनी पंक्तियाँ होंगी ? यह कवि अपनी मां और परिवार के बारे में लिखते हुए कितनी आसानी से दुनिया की सभी मांओं के हृदय तक पहुँच जाता है। ऐसा करने के लिए यह ज़रूरी है कि कवि की आत्मा समूची स्त्री जाति के प्रति एक आत्मीय अनुराग और आदर से भरी हो। इस कविता के अन्त में कवि कहता भी है कि उसने दर्द की आँधियों में भी मां के गाए संझा-गीतों को बचाया है। इन गीतों या इनकी स्मृतियों को सहजते हुए आलोक धन्वा अपने दिल को और साफ़ &#8211; और पारदर्शी बना लेते हैं। मुझे बहुत अच्छा लगता है जब रेल जैसी औपनिवेशिक मशीन को देखकर भी आलोक धन्वा इसी अकेले निष्कर्ष पर पहुँचते हैं -</p>
<p>हर भले आदमी की एक रेल होती है<br />
जो मां के घर की ओर जाती है</p>
<p>- वे बार-बार मानो सिद्ध करना चाहते हैं कि स्त्री के कई रूपों में सबसे अहम है उसके भीतर की मां ! मां के प्रति यह झुकाव कवि के अपने निजी व्यक्तित्व की ओर भी इशारा करता है। &#8220;विस्मय तरबूज़ की तरह&#8221; कविता में वे लिखते हैं कि उन्हें सबसे ज्यादा याद हैं वे स्त्रियाँ जिन्होंने बचपन में उन्हें चूमा तो यहाँ भी मातृत्व का वही आग्रह दिखाई देता है। आलोक धन्वा के लिए बिना किसी अतिरेक के समूची सृष्टि ही जैसे मां हो जाती है। दुनिया की इस सबसे बड़ी सर्जक शक्ति का एक गुनगुना एहसास कभी उनका साथ नहीं छोड़ता और इसीलिए उनकी दुनिया रोज़ बनती है ।<br />
***<br />
दुनिया रोज़ बनती है में मौजूद एक कम बड़ी कविता जिलाधीश का ज़िक्र भी मैं ज़रूर करना चाहूँगा , जिसमें आज़ाद भारत के नए कर्णधारों पर बहुत सार्थक और तल्ख़ टिप्पणी दर्ज है। यह मेरी बहुत चहेती कविताओं में से एक है। मैं कल्पना ही कर सकता हूँ कि आलोक धन्वा को यह विषय कैसे सूझा होगा। सचमुच हमारे गली-मुहल्लों में पला-बढ़ा एक लड़का जब सत्ता का औज़ार बनता है तो वह एक ही वक्त में हमसे कितना पास और कितना दूर होता है -</p>
<p>यह ज्यादा भ्रम पैदा कर सकता है<br />
यह ज़्यादा अच्छी तरह हमें आज़ादी से दूर रख सकता है&#8230;&#8230;&#8230;..<br />
कभी-कभी तो इससे सीखना भी पड़ सकता है</p>
<p>- मुझे जे एन यू में दीक्षित कुछ मित्रों ने बताया है कि आलोक धन्वा उनके बीच बहुत समय रहे हैं। जे एन यू में रहने या वहाँ आने-जाने के दौरान ही उन्होंने इस कविता का पहला सूत्र पकड़ा होगा। एक इतनी स्पष्ट बात पर जैसे आज तक किसी की नज़र ही नहीं थी। सामने मौजूद अदृश्यों पर रोशनी डाल उन्हें इस तरह अचानक पकड़ लेना भी शायद कला का ही एक ऐसा पहलू है, जो विचार के बिना सदा अधूरा ही रहेगा। आलोक धन्वा के यहाँ कला और विचार एकमेक हो जाते हैं। यह पूर्णता किसी भी बड़े और समर्थ कवि के लिए भी स्वप्न की तरह होती है और उतनी ही भ्रामक भी लेकिन आलोक धन्वा में इसका ज़मीनी रूप दिखता है। जहाँ कला बहुत होगी, वहाँ विचार कम होता जायेगा जैसी कोई भी टिप्पणी कभी उन पर लागू नहीं हो सकेगी। आलोक धन्वा की पहचान उनकी लम्बी कविताओं के कारण ज्यादा है, जबकि वे कुछ बेहद कलात्मक छोटी कविताओं के भी कवि हैं। शरद की रातें, सूर्यास्त के आसमान, पक्षी और तारे, सात सौ साल पुराना छन्द, पहली फ़िल्म की रोशनी, क़ीमत आदि ऐसी ही कविताए हैं। इन कविताओं में रोशनी से भरी बेहद हल्की भाषा और कलात्मक कुशलता का जैसा रूप दिखाई पड़ता है, उसे हिन्दी का तथाकथित कलावादी खेमा सात जन्म में भी नहीं पा सकेगा। शमशेर को जिन प्रभावों के कारण कलावादी मानकर मान्यता देने की राजनीति अब तक होती आयी है, आलोक धन्वा को उस ज़मीन पर कोई छू भी नहीं सका है। इस तरह देखूं तो आलोक धन्वा ने शमशेर की परम्परा को उसके सबसे सच्चे रूप में सहेजा है। ग़ौरतलब है कि मेरे दूसरे प्रिय कवि वीरेन डंगवाल के अब तक छपे दोनों संग्रहों में भी शमशेर को समर्पित कवितायेँ हैं लेकिन आलोक धन्वा के संकलन में यह समर्पण अनकहा होने बावजूद अधिक साफ़ दिखाई पड़ता है।<br />
***<br />
आलोक धन्वा ने अपनी कविता की शुरूआत बेहद खुरदुरी और ज़मीनी वास्तविकताओं के बयान से की थी और इस किताब में देखें तो वह अपने उत्कर्ष तक आते-आते एक अलग बिम्बजगत और भाषा के साथ दुबारा उसी हक़ीक़त को अधिक प्रभावशाली ढंग से बयान करने लगती है। 1998 में आलोक धन्वा ने &#8220;सफ़ेद रात&#8221; लिखी। मुझे फिलहाल तो अमरीकी साम्राज्यवाद के विरोध में लिखी गई कोई कविता इसके बराबर क़द की नहीं लगती। मैं इधर अपने मित्र अशोक पांडे की प्रेरणा से इंटरनेट पर कविताओं की खोज में काफ़ी भटकने लगा हूँ &#8211; मुझे अब तक किसी और भाषा में भी ऐसा कोई उदाहरण नहीं दिखा है तो हो सकता है कि यह शायद मेरी खोज की सीमा हो। भारतीय सन्दर्भ में देखें तो क्रान्तिकारियों पर लिखे हज़ारों पृष्ठ भी उतना नहीं समझा पाते जितना आलोक धन्वा की ये तीन पंक्तियाँ समझा देती हैं -</p>
<p>जब भगत सिंह फांसी के तख्ते की ओर बढ़े<br />
तो अहिंसा ही थी<br />
उनका सबसे मुश्किल सरोकार।</p>
<p>सफ़ेद रात का ज़िक्र आते ही मेरा मन थोड़ा पर्सनल होने को करता है। 2003 की मई में यह रानीखेत की एक अंधेरी रात थी। घर में कवि वीरेन डंगवाल और अशोक पांडे मेरे साथ थे। रात गहराती गई और तभी दूर तक फैली घाटियों और पहाड़ों पर तारों-सी टिमटिमाती बत्तियां अचानक गुल हो गईं। तब हमने अपने हिस्से की उस दुनिया में एक पतली-सी मोमबत्ती जलाई और कुछ शुरूआती हँसी -मज़ाक के बाद अचानक वीरेन दा ने इस कविता का पाठ करना शुरू कर दिया। उन्होंने जिस तरह भावावेग में काँपते हुए इसे पढ़ा वह आने वाली पीढ़ियों के सुनने के लिए रिकार्ड करने योग्य था। कविता की एक-एक पंक्ति में मौजूद तनाव उस हिलती हुई थोड़ी-सी पीली रोशनी में मानो आकाशीय बिजली-सा कौंधता और कड़कता था। अशोक और मैं स्तब्ध थे। हमारी पलकें भीग रही थीं। बगदाद की गलियों में सिर पर फिरोजी रुमाल बांधे उस लड़की का ज़िक्र आते-आते हम फूट ही पड़े। हमारा ये भीतरी रूदन शायद हमारे निजी दु:खों से उपजा हो पर वह बर्बरों द्वारा लगातार उजाड़े जा रहे इस संसार की प्राचीनतम सभ्यताओं में हमारी ताक़तवर और मानवीय उपस्थिति का भी पता देता था। मैंने इसे आंशिक रूप से एक कविता में भी लिखा है, जो पिछले दिनों आए विपाशा के कवितांक में दर्ज़ है।<br />
***<br />
मेरे लिए दुनिया रोज़ बनती है की  कविताओं का कवि भी इस महादेश के जीवन और जनता के कुछ बेहद सच्चे और खरे अनुभवों का एक बड़ा कवि है, जिसे मैं अब तक पढ़ी विश्वकविता के साथ रखकर देखता हूँ तो तब भी वह वहीं दिखाई देता है, क्योंकि उसके पास अपनी ज़मीन है और बक़ौल कवि चन्द्रकांत देवताले एक कवि के पास उसके ज़मीर और ज़मीन का होना ही उसकी सबसे बड़ी पूँजी है। इस अर्थ में आलोक धन्वा की समृद्धता किसी के भी लिए स्पृहणीय हो सकती है।</p>
<p><strong>(यह आलेख आशय 2009 में छपा है&#8230;.और कवि का स्केच कम्प्यूटर की मदद से मैंने ही तैयार किया है.)</strong></p>
<p><strong>***</strong></p>
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