दिसम्बर 2009 के लिए पुरालेख

नया साल

31/12/2009
 
मुझे कुछ
ग़लतियों की कथा
कहनी है
                                    
स्वीकार करना है
कुछ को
कुछ को
भूल जाना है
और नट जाना है कुछ से तो
साफ़ ही  
 
इस तरह करना है
प्रवेश
नए साल में
कहते हैं
परम्परा है कुछ ऐसी ही
***
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जिसकी दुनिया रोज़ बनती है !

29/12/2009

                                                          हर उस आदमी की एक नहीं कई प्रिय पुस्तकें होती हैं, जो किताबों की दुनिया में रहता है। मैं भी किसी हद तक इस दुनिया में रहता हूँ और ऐसी दस किताबें हैं, जिन्हें मैं  `मेरी प्रिय पुस्तक´ कह सकता हूँ। इन दस में पाँच कविता संकलन हैं और इन्हीं में शामिल है आलोक धन्वा का बमुश्किल अस्तित्व में आया संकलन `दुनिया रोज़ बनती है´। किताब के नाम में ही विद्वजन चाहें तो विखंडन और संरचना की अंतहीन बहस निकाल सकते हैं और यूरोपीय साहित्य-दर्शन की शरण भी ले सकते हैं। मेरे लिए तो यह वाकई उसी साधारण दुनिया की एक असाधारण झलक है जो रोज़ बनती है और बनती इसलिए है क्योंकि रोज़ उजड़ती भी है। आलोक धन्वा की यह दुनिया, वही दुनिया है जिसमें हम-आप-सब रहते हैं। हम भी उजड़ते और बनते हैं। आलोक धन्वा हमारे इस उजड़ने और बनने को साथ-साथ देखते हैं। दो विरोधी लेकिन पूरक जीवनक्रियाओं का यह विलक्षण कवि हमारे बीच एक कविता संकलन के साथ उपस्थित है, मेरे लिए यह बड़ी बात है।

आलोक धन्वा के कवि ने जिस दुनिया में आंखें खोलीं, वह मेरे जन्म से पहले की दुनिया थी लेकिन यही वह दुनिया थी जिसकी लगातार बढ़ती हुई गूँज से ही मैं आज अपनी दुनिया की शिनाख्त कर पाता हूँ । नक्सलबाड़ी के उस दौर में आलोक धन्वा बेहद सपाट लेकिन उतने ही प्रभावशाली क्रोध के कवि दिखाई पड़ते हैं। 1972 में लिखी जनता का आदमी हो या गोली दागो पोस्टर – आलोक धन्वा का अपने विचार के प्रति समर्पण ऊपरी तौर से बेहद उग्र और भीतर से काफी सुचिंतित नज़र आता है। कहने की ज़रूरत नहीं कि 70 के बाद की एक पूरी काव्यपीढ़ी ही उस एक विचार की देन है। आलोक धन्वा इस दुनिया में अपनी आग जैसी रोशन और दहकती उपस्थिति दर्ज कराते हैं। भीतर-भीतर यही सुगबुगाहट किंचित नए रूप में जारी रहती है, जिसकी अभिव्यक्ति `भूखा बच्चा´ और शंख के बाहर´ जैसी छोटे आकार की कविताओं में दिखती है। 1976 में वे एक लम्बी कविता `पतंग´ लेकर आते हैं। यह कविता उसी विचार को ज्यादा सघन या सान्द्र रूप में प्रस्तुत करती है, जिससे आलोक धन्वा ने अपनी यात्रा शुरू की और मुझे पूरा विश्वास है कि इसमें उनकी आस्था अंत तक बनी रहेगी। कविता की शुरूआती पंक्तिया हैं –

उनके रक्त से ही फूटते हैं पतंग के धागे 
और हवा की विशाल धाराओं तक उठते चले जाते हैं
जन्म से ही कपास वे अपने साथ लाते हैं

– इसे बूझना कठिन नहीं कि किन लोगों की बात यहाँ की जा रही है। इस कविता में ही आलोक धन्वा की काव्यभाषा और बिम्बों में बदलाव के कुछ संकेत भी मौजूद हैं –

धूप गरुड़ की तरह बहुत ऊपर उड़ रही हो
या फल की तरह बहुत पास लटक रही हो –
हलचल से भरे नींबू की तरह समय हरदम उनकी जीभ पर
रस छोड़ता रहता है

– यह कविता आँधियों, भादो की सबसे काली रातों, मेघों और बौछारों और इस सबमें शरण्य खोजती डरी हुई चिडियों के ब्योरों मे उतरती हुई अचानक फिर अपनी पुरानी शैली में एक बयान देती है –

चिडियाँ बहुत दिनों तक जीवित रह सकती हैं
अगर आप उन्हें मारना बंद कर दें
बच्चे बहुत दिनों तक जीवित रह सकते हैं
अगर आप उन्हें मारना बन्द कर दें ……………….बच्चों को मारने वाले शासको
सावधान
एक दिन आपको बर्फ में फेंक दिया जाएगा

– यहाँ आकर पता चलता है कि यह पतंग दरअसल किस दिशा में जा रही है। इसी कविता के तीसरे खंड में फिर भाषा और बिम्बों का वहीं संसार दिखाई देने लगता है, जिससे यह कविता शुरू हुई थी –

सवेरा हुआ
खरगोश की आंखों जैसा लाल सवेरा
शरद आया पुलों को पार करते हुए
अपनी नई चमकीली साइकिल तेज़ चलाते हुए

– पूरी कविता में मौसम का बदलना और उसके साथ पतंग उड़ाने वालों का छत के खतरनाक किनारों से गिरकर भी बच जाना और फिर उन बचे हुए पैरों के पास पृथ्वी का तेज़ी से घूमते हुए आना – ये सब उसी जगह की ओर संकेत करते हैं, जहाँ से आम जन का संघर्ष और आलोक धन्वा की कविता जन्म लेती है। यहाँ फर्क भाषा और बिम्बपरक अभिव्यक्ति भर का है – आक्रोश और उसके उपादान वही पुराने हैं। मैं कभी नहीं भूलता लखनऊ दूरदर्शन पर आलोक धन्वा का वह काव्यपाठ, जिसमें वे इसी कविता को इतनी आश्वस्तकारी नाटकीयता के साथ पढ़ते हैं कि सुनने वाला स्तब्ध रह जाता है। शायद यही कारण है कि उस कविता-पाठ में मौजूद चार-पाच बड़े कवियों में से मुझे आज सिर्फ़ आलोक धन्वा का वह दुबला और कठोर चेहरा याद है। अगर मैं कहूँ कि संजय चतुर्वेदी की `भारतभूषण पुरस्कृत -पतंग´ की प्रेरणा भी आलोक धन्वा से ही आयी होगी तो संजय भाई शायद इस बात का बुरा नहीं मानेंगे – यहाँ मैं सिर्फ़ आरंभिक प्रभाव की बात कर रहा हूँ , काव्यात्मक मौलिकता की नहीं।
***
1979 में आलोक धन्वा फिर एक लम्बी कविता के साथ उपस्थित होते हैं। `कपड़े के जूते´ नामक यह कविता `पहल´ में छपी और पहल वो पत्रिका है जिससे आज के कई बड़े कवियों का जन्म हुआ है। मैं अनुमान लगा सकता हूँ कि वहीं से आलोक धन्वा ने किंचित भिन्न भौगोलिक और सामाजिक परिवेश से आए अरुण कमल, राजेश जोशी, मनमोहन, वीरेन डंगवाल और मंगलेश डबराल जैसे अपने कई समानधर्मा युवा साथियों को पहली बार पहचाना होगा। रेल की पटरी के किनारे पड़े कैनवास के सफ़ेद परित्यक्त जूतों के थोड़े बोझिल विवरण के साथ कविता शुरू होती है लेकिन कुछ ही पंक्तियो बाद वह इस दृश्य के साथ अचानक एक बड़ा आकार लेने लगती है –

ज़मीन की सबसे बारीक़ सतह पर तो
वे जूते अंकुर भी रहे हैं

– यहाँ आलोक इन जूतों और उसी सदा चमकते हुए विचार और जोश के साथ अनगिन वंचितों, पीड़ितों और ठुकराए-सताए गए अपने प्रियतर लोगों की दुनिया में एक नई और अनोखी यात्रा आरम्भ कर देते हैं। वे खिलाडियों, सैलानियों की आत्माओं, चूहों, गड़रियों, नावों से लेकर ज़मीन, जानवर और प्रकृति तक के नए-नए अर्थ-सन्दर्भ खोलते हुए कविता को ऐसे उदात्त अन्त तक पहुंचाते हैं –

मृत्यु भी अब उन जूतों को नहीं पहनना चाहेगी
लेकिन कवि उन्हें पहनते हैं
और शताब्दियाँ पार करते हैं।

इस कविता में विचार समेत कई मानवीय भावनाओं का तनाव टूटने की हद तक खिंचता है और फिर एक ऐसे शानदार आत्मकथ्य में बदल जाता है, जो सारे कवियों का आत्मकथ्य हो सकता है।
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1988 के साथ ही समय बदलता है। आलोक धन्वा की कविता में भी ये बदलाव नज़र आते हैं। यहाँ से ही उनकी कविता स्त्रियों के एक विशाल, जटिल और गरिमामय संसार की ओर मुड़ जाती है। आलोक धन्वा से पहले और उनके साथ भी स्त्रियों पर कई कवि लिखते रहे हैं। आधुनिक हिन्दी कविता में निराला की सरोज-स्मृति, स्फटिक शिला और वह तोड़ती पत्थर में पहली बार स्त्रियों के प्रति एक विरल काव्य-संवेदना जन्म लेती दिखाई देती है, जिसका विकास नागार्जुन, शमशेर, त्रिलोचन, चन्द्रकान्त देवताले, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर, विष्णु खरे, मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल, असद ज़ैदी, विमल कुमार आदि तक कई-कई रूपों में देखने को मिलता है। आलोक धन्वा इस राह के बेहद संवेदनशील और समर्पित राही हैं। उनकी ऐसी कविताओं में ठीक वही गरिमा और सौन्दर्य मौजूद है, जो निराला में था। मुझे लगता है इस परम्परा में अगर पाँच-छह ही नाम लेने पड़ें तो मेरे लिए वो निराला, नागार्जुन, चन्द्रकान्त देवताले, रघुवीर सहाय, आलोक धन्वा और असद ज़ैदी होंगे। आलोक धन्वा की कविता में इस दौर की औपचारिक शुरूआत 1988 के आसपास से होती है। हम देख सकते हैं इस ओर मुड़ने में उन्होंने काफ़ी समय लिया। ऐसा इसलिए क्योंकि निश्चित रूप से वे उस जटिलता को व्यक्त करने के जोखिम जानते हैं, जिसे हम आम हिन्दुस्तानी स्त्री का अन्तर्जगत कहते हैं।

1988 में लिखी भागी हुई लड़किया उनकी प्रसिद्ध कविताओं में से एक है। इसमें आलोक धन्वा ने एक ऐसे संसार को हिन्दी जगत के सामने रखा जो आंखों के सामने रहते हुए भी अब तक लगभग अप्रस्तुत ही था। किसी लड़की के घर से भाग जाने का हमारे औसत भारतीय समाज में क्या आशय है, यह बहुत स्पष्ट बात है। जिस समाज में विशिष्ट सामन्ती परम्पराओं और आस्थाओं के चलते औरत की यौनशुचिता को ही आदमी की इज्जत माना जाता हो, वहाँ बेटी का प्रेम में पड़ना और फिर घर से भाग जाना अचानक आयी किसी दैवीय विपदा से कम नहीं होता। इक्कीसवीं सदी में भी जब पंचायतें ऐसी लड़कियों और प्रेमियों को सरेआम कानून की धज्जिया¡ उड़ाते हुए फांसी पर लटका देती हैं, तब आलोक धन्वा की ये पंक्तियाँ हमें अपने भीतर झाँकने का एक मौका देती हैं –

घर की ज़जीरें
कितना ज़्यादा दिखाई पड़ती हैं
जब घर से कोई लड़की भागती है

– ये स्त्रीविमर्श से अधिक कुछ है। साहित्यिक विमर्श के आईने में ही देखें तो ये भागी हुई लड़कियां प्रभा खेतान की तरह सम्पन्न नहीं हैं और न ही अनामिका की तरह विलक्षण बुद्धि-प्रतिभा की धनी हैं। ये तो हमारे गली-मोहल्लों की बेहद साधारण लड़कियां हैं। प्रभा खेतान या अनामिका का स्त्रीविमर्श इनके लिए शायद कुछ नहीं कर सकता। इनके दु:ख और यातना दिखा देने में ख़ुद विमर्श की मुक्ति भले ही हो, इन लड़कियों की मुक्ति कहीं नहीं है। उनका घर से भाग जाना महज एक पारिवारिक घटना नहीं, बल्कि एक जानलेवा सामाजिक प्रतिरोध भी है। वे अपने आप को जोखिम डालती हुई अपने बाद की पीढ़ी के लिए सामाजिक बदलाव का इतिहास लिखने की कोशिश करती हैं। ये प्रेम किसी प्रेमी के बजाए उस संसार के प्रति ज्यादा है, जिसमें एक दिन उनकी दुनिया की औरतें खुलकर साँस ले सकेंगी। हमारे सामन्ती समाज को समझाती हुई कितनी अद्भुत समझ है ये कवि की –

तुम्हारे टैंक जैसे बन्द और मजबूत घर से बाहर
लड़कियां काफ़ी बदल चुकी हैं
मैं तुम्हें यह इजाज़त नहीं दूँगा
कि तुम अब
उनकी सम्भावना की भी तस्करी करो

– आलोक धन्वा की कविता में वे लड़कियां घर से भाग जाती हैं क्योंकि वे जानती हैं कि उनकी अनुपस्थिति दरअसल उनकी उपस्थिति से कहीं अधिक गूंजेगी । वे लड़कियां अपने अस्तित्व की इस गूँज के लिए भागती हैं और तब तक भागती रहेंगी जब तक कि घर और समाज में उनकी उपस्थिति, अनुपस्थिति से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं हो जाती। ऐसी लड़कियों के सामाजिक बहिष्कार करने या उन्हें जान से मार देने वाली बर्बर पुरुषवादी मानसिकता को पहली बार कविता में इस तरह से एक अत्यन्त मार्मिक किन्तु खुली चुनौती दी गई है –

उसे मिटाओगे
एक भागी हुई लड़की को मिटाओगे
उसके ही घर की हवा से
उसे वहाँ से भी मिटाओगे
उसका जो बचपन है तुम्हारे भीतर
वहाँ से भी
मैं जानता हूँ
कुलीनता की हिंसा !

– यदि आलोक धन्वा की प्रवृत्ति बदलाव के स्वप्न और सामाजिक वास्तविकता के बीच झूलते रहने की ही होती तो वे कभी न लिखते –

लड़की भागती है
जैसे सफ़ेद घोड़े पर सवार
लालच और जुए के आरपार
जर्जर दूल्हों से
कितनी धूल उठती है

– और साथ ही यह भी कि

लड़की भागती है
जैसे फूलों में गुम होती हुई
तारों में गुम होती हुई
तैराकी की पोशाक में दौड़ती हुई
खचाखच भरे जगरमगर स्टेडियम में

– वे सिर्फ़ लड़की के भागने की बात नहीं कहते बल्कि उसके मूल में मौजूद सामाजिक कारणों को भी स्पष्ट करते हैं। वे जब उसे तैराकी की पोशाक में जगरमगर स्टेडियम में दौड़ते हुए दिखाते हैं तो अपने बर्बर सामन्ती समाज में हावी वर्जनाओं और पाशविकता के अन्तिम द्वार को भी तोड़ देने की एक निजी लेकिन ज़रूरी कोशिश करते हैं। उनकी इस कोशिश में वे कहाँ तक जाते हैं ये भी देखने चीज़ है –

तुम जो
पत्नियों को अलग रखते हो
वेश्याओं से
और प्रेमिकाओं को अलग रखते हो
पत्नियों से
कितना आतंकित होते हो
जब स्त्री बेखौफ भटकती है
ढूंढती हुई अपना व्यक्तित्व
एक ही साथ वेश्याओं और पत्नियों
और प्रेमिकाओं में !

– मुझे लगता है कि अपनी कविता में इस सच से आँख मिलाने वाला यह विलक्षण कवि अपनी ज़िन्दगी में भी इससे ज़रूर दो-चार हुआ होगा। कविता में भी उसने इस सच को एक गरिमा दी है और कविता में झलकती उसकी आत्मा का यक़ीन करें तो अपने जीवन में भी वह इससे ऐसे ही पेश आयेगा। इस कविता का जो झकझोरने वाला अन्त है, वह तो बिना किसी वास्तविक और जीवन्त अनुभव के आ ही नहीं सकता। इस अन्त में करुणा और शक्ति एक साथ मौजूद हैं। इतना सधा हुआ अन्त कि दूसरी किसी बहुत बड़ी कविता की शुरूआत-सा लगे। जहाँ तक मैं जानता हूँ समकालीन परिदृश्य पर इस भावात्मक लेकिन तार्किक उछाल में आलोक धन्वा की बराबरी करने वाले कवि बहुत कम हैं।
***
1989 में आलोक धन्वा ने बहुत कम पृष्ठों में एक महाकाव्य रचा, जिसे हिन्दी संसार `ब्रूनों की बेटियाँ´ नामक लम्बी कविता के रूप में जानता है। मुक्तिबोध की कुछ लम्बी कविताओं के अलावा मेरे लिए यह किसी कविता के इतना उदात्त हो सकने का एक दुर्लभतम उदाहरण है। एक कवि ख़ुद भी अपने विषय की ही तरह एक दुर्निवार आग में जलता हुआ अनाचार और पाशविकता के विरुद्ध किस तरह प्रतिरोध का एक समूचा संसार खड़ा करता है, इसे जानना हो तो यह कविता पढ़िये और इस सच को भी स्वीकार कर लीजिये कि इसके पहले एकाग्र पाठ के साथ ही आप भी अपने भीतर उतने साबुत नहीं बचेंगे। मैंने वाचस्पति जी (अब काशीवासी) के निजी पुस्तकालय से पहल का एक पुराना अंक निकालकर जब पहली बार इसे पढ़ा, तब शायद मैं 18-19 बरस का था। मुझे नहीं पता था कि इस पत्रिका के उन धूल भरे पीले पन्नों में एक आग छुपी होगी। जैसा कि होना ही था, मैं इस आग में कई दिन जलता रहा। नागार्जुन की हरिजनगाथा मेरी स्मृति में थी लेकिन यह कविता तो जैसे अपने साथ एक खौलता हुआ लावा लेकर बह रही थी, जिससे बचना नामुमकिन था। लेकिन मैं यह भी कहना चाहूँगा कि इस अद्भुत कविता में आलोक धन्वा स्त्रियों के संसार में दाखिल होकर भी एक ख़ास किस्म की वर्ग चेतना से मुक्त नहीं हो पाते –

रानियाँ मिट गईं
जंग लगे टिन जितनी कीमत भी नहीं
रह गई उनकी याद की
रानियाँ मिट गई
लेकिन क्षितिज तक फ़सल काट रही औरतें
फ़सल काट रही है

– यहाँ आकर मैं कथ्य के स्तर पर कवि से थोड़ा असहमत हो जाता हूँ । रानियाँ हों कि किसान औरतें – मेरी वर्ग चेतना के हिसाब से वे एक ही श्रेणी में आती हैं। रानी होना उन औरतों की प्रस्थिति मात्र थी, वरना थीं तो वे भी औरतें ही। उतनी ही जकड़ी हुई। मैं यहाँ तर्कजनित इतिहासबोध की बात कर रहा हूँ । कोई कैसे भुला सकता है, जौहर या सती जैसी कलंकित प्रथाओं को। भारतीय इतिहास में उन्हें भी हमेशा जलाया ही गया। इस कविता की औरतें ग़रीब और दलित भी हैं, इसलिए उनके अस्तित्व की अपनी मुश्किलें हैं लेकिन रानियों का यह चलताऊ ज़िक्र इस कविता के अन्त को थोड़ा हल्का बनाता है। बहरहाल मैं इस कविता की अपनी व्याख्या में अधिक नहीं जाना नहीं चाहता क्योंकि फिर वहाँ से लौटना मेरे लिए हर बार और भी मुश्किल होता जाता है। इस कविता ने मुझे आख्यान रचने की एक समझ दी है और परिणाम स्वरूप आज मेरे पास ख़ुद की कुछ लम्बी कविताएँ हैं। जब अग्रज सलाह देते हैं कि लम्बी कविता लिखनी है तो मुक्तिबोध को पढ़ो, तब वे आलोक धन्वा को भूल क्यों जाते हैं? मैं इस इलाक़े में कदम रखते हुए हमेशा ही मुक्तिबोध के अलावा आलोक धन्वा और विष्णु खरे को भी याद रखता हूँ । आज के समय में मेरे लिए ये दोनों ही लम्बे शिल्प के कविगुरू हैं।
***
1992 में लिखी छतों पर लड़कियां मुझे भागी हुई लड़कियों की कविता का आरिम्भक टुकड़ा जैसी लगती है जबकि उसे 4 साल बाद लिखा गया। उसी वर्ष में लिखी चौक कविता मेरे लिए आलोक धन्वा की एक बेमिसाल कविता है, जिसकी शुरूआती पंक्तियाँ न सिर्फ़ काव्यसाधना बल्कि एक अडिग भावसाधना का भी प्रमाण हैं –

उन स्त्रियों का वैभव मेरे साथ रहा
जिन्होंने मुझे चौक पार करना सिखाया !

– ये स्त्रियाँ ग़रीब मेहनकश स्त्रियाँ हैं जो हर सुबह अपनी आजीविका के लिए बरतन मांजने , कपड़े धोने या खाना पकाने जैसे कामों पर जाती हैं। ये भी ब्रूनो की वैसी ही बेटियाँ हैं जो ओस में भीगे अपने आँचल लिए अलसुब्ह काम पर निकल जाती हैं। कवि का स्कूल उनके रास्ते में पड़ता है इसलिए उसकी मां उसे उन्हें उनके हवाले कर देती है। क्या सिर्फ़ स्कूल के रास्ते में पड़ जाने का कारण ही पर्याप्त है? बड़ा कवि वह होता है जिसकी कविता में अनकहा भी मुखर होकर बोले। यहाँ वही अनकहा बोलता है – दरअसल वे स्त्रियाँ भी एक मां हैं। उन ग़रीब स्त्रियों के जिस वैभव की बात कवि कर रहा है, वह यही मातृत्व और विरल मानवीय सम्बन्धों का वैभव है। कई दशक बाद भी चौराहा पार करते कवि को वे स्त्रियाँ याद आती हैं और वह अपना हाथ उनकी ओर बढ़ा देता है। मुझे नहीं लगता कि यह सिर्फ़ अतीत का मोह है। मेरे लिए तो यह वर्तमान से विलुप्त होती कुछ ज़रूरी संवेदनाओं की शिनाख्त है। आलोक धन्वा `शरीर´ नामक तीन पंक्तियों की एक नन्हीं-सी कविता में लिखते हैं –

स्त्रियों ने रचा जिसे युगों में
उतने युगों की रातों में उतने निजी हुए शरीर
आज मैं चला ढूंढने अपने शरीर में

– मैं सोचता हूँ कि इस कविता की तीसरी पंक्ति में आज मैं चला ढूंढने के बाद “उसी निजता को” – ये तीन शब्द शायद छपने से रह गए है। इस तरह ये कविता पहली दृष्टि में एक पहेली-सी लगती है लेकिन इसके बाद छपी हुई और इसी वर्ष में लिखी हुई `एक ज़माने की कविता´ में यह गुत्थी सुलझने लगती है। कविता का शुरूआती बिम्ब ही बेहद प्रभावशाली है, जहाँ डाल पर फलों के पकने और उनसे रोशनी निकलने का एक अनोखा अनुभव हमें बांधता है। ये कौन से फल हैं, पकने पर जिनसे रोशनी निकलती है और यह पेड़ कैसा है? जवाब जल्द ही मिलता है, जब मेघों के घिरने और शाम से पहले ही शाम हो जाने पर बच्चों को पुकारती हुई मां गाँव के बाहर तक आ जाती है। इसके बाद आता है एक निहायत ही घरेलू लेकिन दुनिया भर के कविकौशल पर भारी यह दृश्य –

फ़सल की कटाई के समय
पिता थके-मांदे लौटते
तो मां कितने मीठे कंठ से बात करती

– पिता की थकान और मां की बातों की मिठास के अन्तर्सम्बन्ध का इस तरह कविता में आना दरअसल एक समूचे लोक का अत्यन्त सहज और कोमल किन्तु उतना ही दुर्लभ प्रस्फुटन है। इन तीन पंक्तियों में एक समूची दुनिया समाई है। मैं सोचता हूँ हिन्दी कविता में ऐसी कितनी पंक्तियाँ होंगी ? यह कवि अपनी मां और परिवार के बारे में लिखते हुए कितनी आसानी से दुनिया की सभी मांओं के हृदय तक पहुँच जाता है। ऐसा करने के लिए यह ज़रूरी है कि कवि की आत्मा समूची स्त्री जाति के प्रति एक आत्मीय अनुराग और आदर से भरी हो। इस कविता के अन्त में कवि कहता भी है कि उसने दर्द की आँधियों में भी मां के गाए संझा-गीतों को बचाया है। इन गीतों या इनकी स्मृतियों को सहजते हुए आलोक धन्वा अपने दिल को और साफ़ – और पारदर्शी बना लेते हैं। मुझे बहुत अच्छा लगता है जब रेल जैसी औपनिवेशिक मशीन को देखकर भी आलोक धन्वा इसी अकेले निष्कर्ष पर पहुँचते हैं –

हर भले आदमी की एक रेल होती है
जो मां के घर की ओर जाती है

– वे बार-बार मानो सिद्ध करना चाहते हैं कि स्त्री के कई रूपों में सबसे अहम है उसके भीतर की मां ! मां के प्रति यह झुकाव कवि के अपने निजी व्यक्तित्व की ओर भी इशारा करता है। “विस्मय तरबूज़ की तरह” कविता में वे लिखते हैं कि उन्हें सबसे ज्यादा याद हैं वे स्त्रियाँ जिन्होंने बचपन में उन्हें चूमा तो यहाँ भी मातृत्व का वही आग्रह दिखाई देता है। आलोक धन्वा के लिए बिना किसी अतिरेक के समूची सृष्टि ही जैसे मां हो जाती है। दुनिया की इस सबसे बड़ी सर्जक शक्ति का एक गुनगुना एहसास कभी उनका साथ नहीं छोड़ता और इसीलिए उनकी दुनिया रोज़ बनती है ।
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दुनिया रोज़ बनती है में मौजूद एक कम बड़ी कविता जिलाधीश का ज़िक्र भी मैं ज़रूर करना चाहूँगा , जिसमें आज़ाद भारत के नए कर्णधारों पर बहुत सार्थक और तल्ख़ टिप्पणी दर्ज है। यह मेरी बहुत चहेती कविताओं में से एक है। मैं कल्पना ही कर सकता हूँ कि आलोक धन्वा को यह विषय कैसे सूझा होगा। सचमुच हमारे गली-मुहल्लों में पला-बढ़ा एक लड़का जब सत्ता का औज़ार बनता है तो वह एक ही वक्त में हमसे कितना पास और कितना दूर होता है –

यह ज्यादा भ्रम पैदा कर सकता है
यह ज़्यादा अच्छी तरह हमें आज़ादी से दूर रख सकता है………..
कभी-कभी तो इससे सीखना भी पड़ सकता है

– मुझे जे एन यू में दीक्षित कुछ मित्रों ने बताया है कि आलोक धन्वा उनके बीच बहुत समय रहे हैं। जे एन यू में रहने या वहाँ आने-जाने के दौरान ही उन्होंने इस कविता का पहला सूत्र पकड़ा होगा। एक इतनी स्पष्ट बात पर जैसे आज तक किसी की नज़र ही नहीं थी। सामने मौजूद अदृश्यों पर रोशनी डाल उन्हें इस तरह अचानक पकड़ लेना भी शायद कला का ही एक ऐसा पहलू है, जो विचार के बिना सदा अधूरा ही रहेगा। आलोक धन्वा के यहाँ कला और विचार एकमेक हो जाते हैं। यह पूर्णता किसी भी बड़े और समर्थ कवि के लिए भी स्वप्न की तरह होती है और उतनी ही भ्रामक भी लेकिन आलोक धन्वा में इसका ज़मीनी रूप दिखता है। जहाँ कला बहुत होगी, वहाँ विचार कम होता जायेगा जैसी कोई भी टिप्पणी कभी उन पर लागू नहीं हो सकेगी। आलोक धन्वा की पहचान उनकी लम्बी कविताओं के कारण ज्यादा है, जबकि वे कुछ बेहद कलात्मक छोटी कविताओं के भी कवि हैं। शरद की रातें, सूर्यास्त के आसमान, पक्षी और तारे, सात सौ साल पुराना छन्द, पहली फ़िल्म की रोशनी, क़ीमत आदि ऐसी ही कविताए हैं। इन कविताओं में रोशनी से भरी बेहद हल्की भाषा और कलात्मक कुशलता का जैसा रूप दिखाई पड़ता है, उसे हिन्दी का तथाकथित कलावादी खेमा सात जन्म में भी नहीं पा सकेगा। शमशेर को जिन प्रभावों के कारण कलावादी मानकर मान्यता देने की राजनीति अब तक होती आयी है, आलोक धन्वा को उस ज़मीन पर कोई छू भी नहीं सका है। इस तरह देखूं तो आलोक धन्वा ने शमशेर की परम्परा को उसके सबसे सच्चे रूप में सहेजा है। ग़ौरतलब है कि मेरे दूसरे प्रिय कवि वीरेन डंगवाल के अब तक छपे दोनों संग्रहों में भी शमशेर को समर्पित कवितायेँ हैं लेकिन आलोक धन्वा के संकलन में यह समर्पण अनकहा होने बावजूद अधिक साफ़ दिखाई पड़ता है।
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आलोक धन्वा ने अपनी कविता की शुरूआत बेहद खुरदुरी और ज़मीनी वास्तविकताओं के बयान से की थी और इस किताब में देखें तो वह अपने उत्कर्ष तक आते-आते एक अलग बिम्बजगत और भाषा के साथ दुबारा उसी हक़ीक़त को अधिक प्रभावशाली ढंग से बयान करने लगती है। 1998 में आलोक धन्वा ने “सफ़ेद रात” लिखी। मुझे फिलहाल तो अमरीकी साम्राज्यवाद के विरोध में लिखी गई कोई कविता इसके बराबर क़द की नहीं लगती। मैं इधर अपने मित्र अशोक पांडे की प्रेरणा से इंटरनेट पर कविताओं की खोज में काफ़ी भटकने लगा हूँ – मुझे अब तक किसी और भाषा में भी ऐसा कोई उदाहरण नहीं दिखा है तो हो सकता है कि यह शायद मेरी खोज की सीमा हो। भारतीय सन्दर्भ में देखें तो क्रान्तिकारियों पर लिखे हज़ारों पृष्ठ भी उतना नहीं समझा पाते जितना आलोक धन्वा की ये तीन पंक्तियाँ समझा देती हैं –

जब भगत सिंह फांसी के तख्ते की ओर बढ़े
तो अहिंसा ही थी
उनका सबसे मुश्किल सरोकार।

सफ़ेद रात का ज़िक्र आते ही मेरा मन थोड़ा पर्सनल होने को करता है। 2003 की मई में यह रानीखेत की एक अंधेरी रात थी। घर में कवि वीरेन डंगवाल और अशोक पांडे मेरे साथ थे। रात गहराती गई और तभी दूर तक फैली घाटियों और पहाड़ों पर तारों-सी टिमटिमाती बत्तियां अचानक गुल हो गईं। तब हमने अपने हिस्से की उस दुनिया में एक पतली-सी मोमबत्ती जलाई और कुछ शुरूआती हँसी -मज़ाक के बाद अचानक वीरेन दा ने इस कविता का पाठ करना शुरू कर दिया। उन्होंने जिस तरह भावावेग में काँपते हुए इसे पढ़ा वह आने वाली पीढ़ियों के सुनने के लिए रिकार्ड करने योग्य था। कविता की एक-एक पंक्ति में मौजूद तनाव उस हिलती हुई थोड़ी-सी पीली रोशनी में मानो आकाशीय बिजली-सा कौंधता और कड़कता था। अशोक और मैं स्तब्ध थे। हमारी पलकें भीग रही थीं। बगदाद की गलियों में सिर पर फिरोजी रुमाल बांधे उस लड़की का ज़िक्र आते-आते हम फूट ही पड़े। हमारा ये भीतरी रूदन शायद हमारे निजी दु:खों से उपजा हो पर वह बर्बरों द्वारा लगातार उजाड़े जा रहे इस संसार की प्राचीनतम सभ्यताओं में हमारी ताक़तवर और मानवीय उपस्थिति का भी पता देता था। मैंने इसे आंशिक रूप से एक कविता में भी लिखा है, जो पिछले दिनों आए विपाशा के कवितांक में दर्ज़ है।
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मेरे लिए दुनिया रोज़ बनती है की  कविताओं का कवि भी इस महादेश के जीवन और जनता के कुछ बेहद सच्चे और खरे अनुभवों का एक बड़ा कवि है, जिसे मैं अब तक पढ़ी विश्वकविता के साथ रखकर देखता हूँ तो तब भी वह वहीं दिखाई देता है, क्योंकि उसके पास अपनी ज़मीन है और बक़ौल कवि चन्द्रकांत देवताले एक कवि के पास उसके ज़मीर और ज़मीन का होना ही उसकी सबसे बड़ी पूँजी है। इस अर्थ में आलोक धन्वा की समृद्धता किसी के भी लिए स्पृहणीय हो सकती है।

(यह आलेख आशय 2009 में छपा है….और कवि का स्केच कम्प्यूटर की मदद से मैंने ही तैयार किया है.)

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स्पष्ट राजनीतिक चेतना की कविताएँ

28/12/2009

(यह समीक्षा दैनिक जागरण के पुनर्नवा के लिए लिखी गई थी और जाहिर है इसकी कई सीमाएं भी हैं. अख़बार आपको कम लिखने को कहता है. मैं सोचता हूँ कभी पंकज की कविता पर एक लम्बा लेख लिखूंगा.)

बहुत कम उम्र (सबसे कम?) में युवा-कविता का प्रतिष्ठित भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार प्राप्त करने वाले पंकज चतुर्वेदी ने पिछले कुछ समय में बहुत तेज़ी से एक युवा और सिद्धहस्त आलोचक के रूप में अपनी पहचान बनाई है। उन्हें `सिर्फ आलोचना` के लिए दिए जाने वाले देवीशंकर अवस्थी सम्मान से भी नवाज़ा गया है। पहल के पन्नों में हिन्दी के महत्वपूर्ण कवियों पर जमकर लिखते हुए उन्होंने अपनी प्रतिभा के साक्ष्य प्रस्तुत किए है। युवा पीढ़ी में उन्होंने वागर्थ की अपनी टिप्पणियों से एक अद्भुत आत्मीयता अर्जित है। `चुका हुआ कवि आलोचक बन जाता है` – यह बीती बात हो चुकी है। हमारे समय के राजेश जोशी, अरूण कमल, चन्द्रकांत देवताले, विष्णु नागर जैसे कवियों ने बहुत समर्थ आलोचना लिखी है, यह अलग बात है कि वे अपने लिखे को अत्यन्त विनम्रता से महज एक कवि का लेखा मानते हैं। पंकज ने इस परम्परा को समृद्ध करते हुए इस संकोच को भी तोड़ा है। वे अब खुलेआम आलोचक हैं। लेकिन इन सब बातों से परे मूल और मुख्य बात यह है कि पंकज प्रथमत: और शायद अन्तत: भी, एक कवि हैं। यही उनके भीतर की दुनिया है।

पंकज की कविता पर बात करने से पहले आलोचना पर इतना कुछ कहना दरअसल ज़रूरी है। यह देखना अत्यन्त रोचक है कि आलोचना में पंकज ने बहुत खुले तौर पर काव्यभाषा का इस्तेमाल किया है। चाहे वे पहल के पन्ने हों या वागर्थ के, पंकज की भाषा हर जगह आलोचक से अधिक एक भावुक हृदय और मानवीय संवेदना से संचालित कवि की भाषा है। और इसी बात को उनके नये कविता संकलन `एक ही चेहरा` के सन्दर्भ में देखें तो पायेंगे कि आलोचना लिखने का एक स्पष्ट लेकिन अत्यन्त काव्यात्मक प्रभाव उनकी काव्यदृष्टि पर पड़ा है। जैसा कि ब्लर्ब में असद जैदी ने उल्लेख भी किया है कि पंकज की कविताओं का गद्य बहुत सावधान और सतर्क गद्य है। काव्यभाषा में गद्य और पद्य की बहस अब पुरानी हो चुकी है। कविता में गद्य सिर्फ विचारशीलता या विवेक का औज़ार नहीं रह गया है, वह कविता का अपना औज़ार भी है। हिन्दी में इस बात पर कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है लेकिन हिन्दी से बाहर की कविता को पढ़ने-गुनने वाले शायद ही इससे इनकार कर पायें। पंकज की काव्यभाषा गद्य का बखूबी इस्तेमाल करते हुए भी खुद गद्यात्मक बनने से बची है, यह कौशल कम बड़ा नहीं है।

पंकज के पहले संकलन की कविताएँ मुख्यत: प्रेमकविताएँ थीं, जिन पर उनके नौउम्र होने की स्पष्ट छाप थी। देखना चाहिए कि उस दौर में भी उनकी ये कविताएँ देहधर्म के पार जाती थीं। उनके भीतर कोई तहख़ाना नहीं, बल्कि एक छुपा हुआ आलोक था जिसमें सतत् लेकिन निष्फल प्रेम की कई परतें दिखाई पड़ती थीं। इधर पंकज का भावलोक और भी समृद्ध हुआ है और वे प्रेम के साथ-साथ घर के बारे में भी सोचते हुए यह मानने लगे हैं कि

जो एक घेरा प्रदान करता हो
किसी आक्रामक अर्थ में नहीं
बल्कि बाँध लेने के
बहुत आत्मीय अर्थ में
वही घर है`

और यह भी कि

स्मारक उचित नहीं होते
और स्मारकों से अधिक महत्वपूर्ण है जीवन।

यह भावुकता से बाहर आना नहीं बल्कि उसके भीतर को बाहर लाना है। इसी भीतर को बाहर लाने की एक छोटी लेकिन बेहतरीन कविता है `इच्छा` –

मैंने तुम्हें देखा
और उसी क्षण
तुमसे बातें करने की बड़ी इच्छा हुई
फिर यह सम्भव नहीं हुआ
फिर याद आया
कि यह तो याद ही नहीं रहा था
कि हमारे समय में
इच्छाओं का बुरा हाल है।

यह देखना भी अत्यन्त सुखद है कि दुनियावी वास्तविकताओं की इस अच्छी और व्यावहारिक समझ को पंकज ने अपने ऊपर इतना भी हावी नहीं होने दिया है कि वे `तुम मुझे मिलीं` जैसी कविता लिखने से चूक जाते। पंकज के लिए प्रेम लगभग हर कहीं है। वे उसे कोलाहल और भीड़ में भी साकार होता पाते हैं। डबडबाए दृश्य में प्रेयसी के और भी सुन्दर दिखने का भावात्मक संकल्प हमें रोकता है। कई बार कही गई इस एक बात को पंकज अपने अन्दाज़ कुछ ऐसे कहते हैं कि वह अभी कही हुई-सी लगती है –

वह जो तुम्हारे लिए
सपने नहीं देखता
उसके पहलू में तुम
चैन से सो नहीं सकते।

हिन्दी में उसने कहा था को प्रेम और काल के सम्बन्ध का सर्वाधिक सम्मोहक आख्यान माना गया है। `उसने क्या कहा था` शीर्षक कविता में पंकज इस कहानी की उस छुपी हुई मार्मिकता को भी उद्घाटित करते हैं, जिसकी ओर किसी आलोचक या व्याख्याकार का कभी ध्यान नहीं गया –

मगर कहानी में न सही
कहानी के बाहर भी आज तक
तुमसे किसी ने नहीं जानना चाहा
न तुम्हारी प्रेयसी ने ही पूछा
तुम्हारी किससे हुई थी कुड़माई- तुम्हारे बेटे की माँ
वह जीवित थी या मृत…..कैसा था जीवन तुम्हारा
कैसा था उसमें प्यार का रंग …… तुम्हारे बलिदानों के नेपथ्य में
तुम्हारे जितना ही मरती है वह स्त्री-
हालाँकि उसे न कोई देखता है न सुनता है
न किसी को पता है
जो उसने कहा था।

पंकज पेशे से हिन्दी के प्राध्यापक हैं लेकिन उनकी इस प्राध्यापकतेर दृष्टि का भी लाभ उनके छात्रों को मिलता होगा….. या शायद नहीं क्योंकि –

…….. मैं उन छात्रों से मिलता हूँ
जो कुछ जानना नहीं चाहते
जिनमें कुछ जानने की ख़ुशी
या सिहरन नहीं है`।

पंकज के इस संकलन में हमारे समय के कई समर्थ कवियों/लेखकों से उनका संवाद दर्ज़ है। इस संवाद की सार्थकता पर बात करने से पहले इस सफलता को देख लेना भी ज़रूरी है कि पंकज संवाद तो करते हैं लेकिन किसी भी स्तर पर इन कवियों की कविताई के असर में नहीं दिखते। कहीं-कहीं लगता है कि `एक कवि`, `प्रख्यात कवि`, `मशहूर कवि` या `बड़े कवि` के स्थान पर कवियों के नाम दर्ज़ होते तो यह संवाद अधिक खुला और आत्मीय होता, लेकिन इतना संकोच शायद पंकज के व्यक्तिगत स्वभाव में है। यह संकोच `जबलपुर में क्या है` शीर्षक कविता में ज़रूर टूटा है, लेकिन यह कविता कुछ ब्यौरों की माँग करती दीखती है – इसे कुछ और लम्बा होना चाहिए था, अधिक विवरणपूर्ण।

पंकज के पहले और इस दूसरे संकलन के बीच एक सुखद बदलाव जो साफ दिखाई देता है, वह राजनीतिक पक्षधरता और पहचान के अधिक मुखर हो जाने का है। अत्यन्त ख़ुशी की बात है कि पंकज राजनीतिक मोर्चे पर लगभग अमूर्तता की स्थिति से गुज़र रही युवा कविता के एक ऐसे पार्टनर हैं, जिनकी पालिटिक्स बहुत मूर्त्त या स्पष्ट है। इस पालिटिक्स को आप `देश नहीं चिड़िया` शीर्षक कविता की इन लगभग सपाट लेकिन अर्थपूर्ण पंक्तियों में पायेंगे-

मैंने उनसे अनुरोध किया : फ़ैजाबाद से अयोध्या तक
एक जुलूस निकालना है
और माँग करनी है
कि विवादित रामजन्मभूमि परिसर में
अठारह सौ सत्तावन के शहीदों का
राष्ट्रीय स्मारक बनवाया जाय
आप भी इसमें हमारा साथ दीजिए
साम्प्रदायिकता और साम्राज्यवाद की
दुरभिसन्धि का
यही सच्चा प्रतिकार हो सकता है।

कविता के शिल्प से समझौता करके भी राजनीतिक पक्षधरता को सामने रखने का यह संकल्प मूल्यवान है। इसे राजनीति नहीं, कविता की बढ़ती ताकत का प्रमाण माना जायेगा। वरिष्ठ कवियों में कुछ नाम इस संकल्प का परिचय अकसर देते रहे हैं, लेकिन काव्य के खो जाने के भय से भ्रमित हमारी स्थापित युवाकविता में क्या यह दुर्लभ नहीं है… अखंड-मानसपाठ और मंगल-अमंगल भवन भी राजनीति की कविताएँ हैं और यह एक ठेठ राजनीतिक टिप्पणी कि

सबेरे यह बच रहा एहसास
किस विकट बेसुरेपन से
गाए गए तुलसीदास

यही राजनीति `हिन्दी विभागाध्यक्ष` जैसी कविता तक जाती है, जिसे एक विभागाध्यक्ष की तस्वीर भर मान लेना काफी नहीं है। इस समय इस कविता का सच्चा विस्तार और सबूत मध्य प्रदेश में मिलता है, जहाँ विभागाध्यक्ष ही नहीं, अधिकांश प्राचार्य और कुलपति तक इसी `एक ही चेहरे` में समाए दीखते हैं। लोगों का ऐसा होना और ऐसे पदों पर होना भी दरअसल एक राजनीतिक दुश्चक्र ही है। शिक्षा विभाग एक आसान लेकिन सबसे महत्वपूर्ण निशाना है, जहाँ से बहुत सारी चीज़ें बदली और संचालित की जा सकती हैं। हमें यह मानना पड़ेगा कि तुलसी को विकट बेसुरेपन से गाने वाले भी कोई चूके हुए चौहान नहीं हैं। विद्या और संस्कार की यह भारती भारत में बहुत गहरे तक घर बना चुकी है, जबकि देश की प्रगतिशील ताकतों ने अब तक शायद इसे महज बच्चों का ही खेल समझा है।

जिस निम्नमध्यवर्गीय जीवन का हम हिस्सा हैं, उसके पेचो-ख़म को पंकज खूब जानते हैं। पंकज की कविता इस जीवन के जिन ब्यौरों जाती है, वह अब तक कहानी-उपन्यास के अलावा उदयप्रकाश की कुछ शुरूआती कविताओं में ही दिखते थे। तूफान, ह.च.रा., हिन्दी, दिल्ली-प्रसंग, नमस्ते से बरजिए, एक महाविद्यालय से, लिफ्ट का संस्मरण, देवी चबूतरा, वजह आदि ऐसी कविताएँ हैं, जो कविता से अधिक कुछ कहती हैं। इन कविताओं में जीवन भी उसी भाषा की तरह है, जिसके बारे में उन्हीं की कविता का एक बुजुर्ग मुलाजिम अपने साहब से कहता है –

यह हिन्दी है हुजूर
इससे निहुरकर मिलना चाहिए।`

इस संकलन से गुज़रने के बाद पंकज से कुछ शिकायतें भी हैं। पहली और बड़ी शिकायत यह कि वे आलोचकों को अपनी कविता में ज़रूरत से ज़्यादा तूल देते हैं। पुरस्कार और आलोचक जैसी कविताएँ अपने व्यंग्यात्मक लहजे और उद्देश्य के बावजूद निरर्थक ही लगती हैं। इसी तरह `राष्ट्रपति जी` वैचारिक रूप से एक बेहद सपाट कविता है और कोरा राजनीतिक बयान-सी लगती है, हालाँकि कविता का शिल्प यहाँ ज़्यादा सुरक्षित है। पंकज की एक कविता `निरावरण वह` बहुत आश्चर्यजनक रूप से अशोक वाजपेयी की याद दिलाती है। बावजूद इन शिकायतों के पंकज की कविताओं में `कुछ` नहीं, बल्कि `कई चीज़ें अब भी अच्छी हैं` जो उनकी एक बहुत अच्छी कविता का शीर्षक भी है। अंत में उन्हीं के प्रिय कवि वीरेन डंगवाल के शब्दों में कहें तो

इच्छाएँ आती हैं तरह-तरह के बाने धरे
उनके पास मेरी हर ज़रूरत दर्ज़ है
एक फेहरिस्त में मेरी हर कमज़ोरी
उन्हें यह तक मालूम है
कि कब मैं चुप होकर गरदन लटका लूँगा
मगर फिर भी मैं जाता रहूँगा ही
हर बार भाषा को रस्से की तरह थामे
साथियों के रास्ते पर
…. एक कवि और कर ही क्या सकता है
सही बने रहने की कोशिश के सिवा।´

बनारस से निकला हुआ आदमी

25/12/2009

जनवरी की उफनती पूरबी धुंध
और गंगातट से अनवरत उठते उस थोड़े से धुँए के बीच
मैं आया इस शहर में
जहाँ आने का मुझे बरसों से
इन्तज़ार था

किसी भी दूसरे बड़े शहर की तरह
यहाँ भी
बहुत तेज़ भागती थी सड़कें
लेकिन रिक्शों, टैम्पू या मोटरसाइकिल-स्कूटरवालों में
बवाल हो जाने पर
रह-रहकर
रुकने-थमने भी लगती थी

मुझे जाना था लंका और उससे भी आगे
सामने घाट
महेशनगर पश्चिम तक

मैं पहली बार शहर आए
किसी गँवई किसान-सा निहारता था
चीज़ों को
अलबत्ता मैंने देखे थे कई शहर
किसान भी कभी नहीं था
और रहा गँवई होना –
तो उसके बारे में खुद ही बता पाना
कतई मुमकिन नहीं
किसी भी कवि के लिए

स्टेशन छोड़ते ही यह शुरू हो जाता था
जिसे हम बनारस कहते हैं
बहुत प्राचीन-सी दिखती कुछ इमारतों के बीच
अचानक ही
निकल आती थी
रिलायंस वेब वल्र्ड जैसी कोई अपरिचित परालौकिक दुनिया

मैंने नहीं पढ़े थे शास्त्र
लेकिन उनकी बहुश्रुत धारणा के मुताबिक
यह शहर पहले ही
परलोक की राह पर था
जिसे सुधारने न जाने कहाँ से भटकते आते थे साधू-सन्यासी
औरतें रोती-कलपती
अपना वैधव्य काटने
बाद में विदेशी भी आने लगे बेहिसाब
इस लोक के सीमान्त पर बसे
अपनी तरह के एक अकेले अलबेले शहर को जानने

लेकिन
मैं इसलिए नहीं आया था यहाँ
मुझे कुछ लोगों से मिलना था
देखनी थीं
कुछ जगहें भी
लेकिन मुक्ति के लिए नहीं
बँध जाने के लिए
खोजनी थीं कुछ राहें
बचपन की
बरसों की ओट में छुपी
भूली-बिसरी गलियों में कहीं
कोई दुनिया थी
जो अब तलक मेरी थी

नानूकानू बाबा की मढ़िया
और उसके तले
मंत्र से कोयल को मार गिराते एक तांत्रिक की
धुंधली-सी याद भी
रास्तों पर उठते कोलाहल से कम नहीं थी

पता नहीं क्या कहेंगे इसे
पर पहुँचते ही जाना था हरिश्चंद्र घाट
मेरे काँधों पर अपनी दादी के बाद
यह दूसरी देह
वाचस्पति जी की माँ की थी
बहुत हल्की
बहुत कोमल
वह शायद भीतर का संताप था
जो पड़ता था भारी
दिल में उठती कोई मसोस

घाट पर सर्वत्र मँडराते थे
डोम
शास्त्रों की दुहाई देते एक व्यक्ति से
पैसों के लिए झगड़ते हुए कहा उनमें से एक काले-मलंग ने –
`किसी हरिश्चंद्र के बाप का नहीं
कल्लू डोम का है ये घाट !´

उनके बालक लम्बे और रूखे बालों वाले
जैसे पुराणों से निकलकर उड़ाते पतंग
और लपकने को उन्हें
उलाँघते चले जाते
तुरन्त की बुझी चिताओं को भी
                     आसमान में धुँए और गंध के साथ
                     उनका यह
                     अलिखित उत्साह भी था

पानी बहुत मैला लगभग मरी हुई गंगा का
उसमें भी
गुड़प-गुड़प डुबकी लगाते कछुए
जिनके लिए फेंका जाता शव का कोई एक अधजला हिस्सा

शवयात्रा के अगुआ डॉ0 गया सिंह पर नहीं चलता था रौब
किसी भी डोम का
कीनाराम सम्प्रदाय के वे कुशल अध्येता
गालियों से नवाज़ते उन्हें लगभग समाधिष्ठ से थे

लगातार आते अंग्रेज़ तरह-तरह के कैमरे सम्भाले
देखते हिन्दुओं के इस आख़िरी सलाम को
उनकी औरतें भी
लगभग नंगी
जिन्हें इस अवस्था में अपने बीच पाकर
किशोर और युवतर डोमों की जाँघों में रह-रहकर
एक हर्षपूर्ण खुजली-सी उठती थी
खुजाते उसे वे
अचिम्भत से लुंगी में हाथ डाल टकटकी बाँधे
मानो आँखो ही आँखों में कहते
उनसे –
हमारी मजबूरी है यह कृपया इस कार्य-व्यापार का
कोई अनुचित या अश्लील अर्थ न लगाएँ
˜˜˜
गहराती शाम में आए काशीनाथ जी
शोकमग्न
घाट पर उन्हें पा घुटने छूने को लपके बी.एच.यू. के
दो नौजवान प्राध्यापक
जिन्हें अपने निकटतम भावबोध में अगल-बगल लिए
वे एक बैंच पर विराजे
`यह शिरीष आया है रानीखेत से´ – कहा वाचस्पति जी ने
पर शायद
दूर से आए किसी भी व्यक्ति से मिल पाने की
फ़ुर्सत ही नहीं थी उनके पास उस शाम
एक बार मेरी तरफ अपनी आँखें चमका
वे पुन: कर्म में लीन हुए
                        मैं निहारने लगा गंगा के उस पार
                        रेती पर कंडे सुलगाए खाना पकाता था कोई
                        इस तरफ लगातार जल रहे शवों से
                        बेपरवाह

रात हम लौटे अस्सी-भदैनी से गुज़रते
और हमने पोई के यहाँ चाय पीना तय किया
लेकिन कुछ देर पहले तक
वह भी हमारे साथ घाट पर ही था
और अभी खोल नहीं पाया था अपनी दुकान

पोई – उसी केदार का बेटा
बरसों रहा जिसका रिश्ता राजनीति और साहित्य के संसार से
सुना कई बरस पहले
गरबीली ग़रीबी के दौरान नामवर जी के कुर्ते की जेब में
अकसर ही कुछ पैसे डाल दिया करता था

रात चढ़ी चली आती थी
बहुत रोशन
लेकिन बेतरतीब-सा दीखता था लंका
सबसे ज़्यादा चहल-पहल शाकाहारी भोजनालयों में थी

चौराहे पर खड़ी मूर्ति मालवीय जी की
गुज़रे बरसों की गर्द से ढँकी
उसी के पास एक ठेला
तली हुई मछली-मुर्गे-अंडे इत्यादि के सुस्वादु भार से शोभित
जहाँ लड़खड़ाते कदम बढ़ते कुछ नौजवान
ठीक सामने – विराट द्वार `काशी हिन्दू विश्वविद्यालय´ का
˜˜˜
अजीब थी आधी रात की नीरवता
घर से कुछ दूर
गंगा में डुबकी लगातीं शिशुमार

मछलियाँ सोतीं एक सावधान डूबती-उतराती नींद
तल पर पाँव टिकाए पड़े हों शायद कछुए भी
शहर नदी की तलछट में भी
कहीं साफ़ चमकता था

तब भी हमारी पलकों के भीतर नींद से ज़्यादा धुँआ था
फेफड़ों में हवा से ज़्यादा एक गंध

बहुत ज़ोर से साँस भी नहीं ले सकते थे हम
अभी इस घर से कोई गया था
अभी इस घर में उसके जाने से अधिक
उसके होने का अहसास था
रसोई में पड़े बर्तनों के बीच शायद कुलबुला रहे थे चूहे
खाना नहीं पका था इस रात
और उनका उपवास था
˜˜˜
सुबह आयी तो जैसे सब कुछ धोते हुए
क्या इसी को कहते हैं
सुबहे-बनारस…
क्या रोज़ यह आती है ऐसे ही…
गंगा के पानी से उठती भाप
बदलती हुई घने कुहरे में
कहीं से भटकता आता आरती का स्वर

कुछ भैंसें बहुत गदराए काले शरीर वाली
धीरे से पैठ जातीं
सुबह 6 बजे के शीतल पानी में
हले! हले! करते पुकारते उन्हें उनके ग्वाले
कुछ सूअर भी गली के कीच में लोट लगाते
छोड़ते थूथन से अपनी
गजब उसाँसे
जो बिल्कुल हमारे मुँह से निकलती भाप सरीखी ही
दिखती थीं
साइकिल पर जाते बलराज पांडे रीडर हिन्दी बी.एच.यू.
सड़क के पास अचानक ही दिखता
किसी अचरज-सा एक पेड़ बादाम का

एक बच्चा लपकता जाता लेने
कुरकुरी जलेबी
एक लौटता चाशनी से तर पौलीथीन लटकाए
अभी पान का वक़्त नहीं पर
दुकान साफ़ कर अगरबत्ती जलाने में लीन
झबराई मूँछोंवाला दुकानदार भी

यह धरती पर भोर का उतरना है
इस तरह कि बहुत हल्के से हट जाए चादर रात की
उतारकर जिसे
रखते तहाए
चले जाते हैं पीढ़ी दर पीढ़ी
बनारस के आदमी

अभी धुंध हटेगी
और राह पर आते-जातों की भरमार होगी
अभी खुलेंगे स्कूल
चलते चले जायेंगे रिक्शे ढेर के ढेर बच्चों को लाद
अभी गुज़रेंगे माफियाओं के ट्रक रेता-रोड़ी गिराते
जिनके पहियों से उछलकर थाम ही लेगा
हर किसी का दामन
गड्ढों में भरा गंदला पानी
अभी एक मिस्त्री की साइकिल गुज़रेगी
जो जाता होगा कहीं कुछ बचाने – बनाने को
अभी गुज़रेगी ज़बरे की कार भी
हूटर और बत्ती से सजी
ललकारती सारे शहर को एक अजब-सी
मदभरी अश्लील आवाज़ में

इन राहों पर दुनिया चलती है
ज़रूर चलते होंगे कहीं इसे बचाने वाले भी
कुछ ही देर पहले वे उठे होंगे एक उचाट नींद से
कुछ ही देर पहले उन्होंने अपने कुनमुनाते हुए बच्चों के
मुँह देखे होंगे
अभी उनके जीवन में प्रेम उतरा होगा
अभी वे दिन भर के कामों का ब्यौरा तैयार करेंगे
और चल देंगे
कोई नहीं जानता कि उनके कदम किस तरफ़ बढ़ेंगे
लौटेंगे रोज़ ही की तरह पिटे हुए
या फिर चुपके से कहीं कोई एक हिसाब
बराबर कर देंगे

अभी तो उमड़ता ही जाता है यह मानुष-प्रवाह
जिसमें
अगर छुपा है हलाहल जीवन का
तो कहीं थोड़ा-सा अमृत भी है
जिसकी एक बूँद अभी उस बच्चे की आँखों में चमकी थी
जो अपना बस्ता उतार
रिक्शा चलाने की नाकाम कोशिश में था
दूसरी भी थी वहीं रिक्शेवाले की पनियाली आँखों में
जो स्नेह से झिड़कता कहता था उसे – `हटो बाबू साहेब
यह तुम्हारा काम नहीं!´
˜˜˜
बहुत शान्त दीखते थे बी.एच.यू. के रास्ते
टहलते निकलते लड़के-लड़कियाँ
`मैत्री´ के आगे खड़े
चंदन पांडे, मयंक चतुर्वेदी और श्रीकान्त
मेरे इन्तज़ार में
उनसे गले मिलते
अचानक लगा मुझे इसी गिरोह की तो तलाश थी
अजीब-सी भंगिमाओं से लैस हिन्दी के हमलावरों के बीच
कितना अच्छा था
कि इन छात्रों में से किसी की भी पढ़ाई में
हिन्दी शामिल नहीं थी

ज़िन्दगी की कहानियाँ लिखते
वे सपनों से भरे थे और हक़ीक़त से वाकिफ़
मैं अपनी ही दस बरस पुरानी शक्ल देखता था उनमें
हम लंका की सड़क पर घूमते थे
यूनीवर्सल में किताबें टटोलते
आनी वाली दुनिया में अपने वजूद की सम्भावनाओं से भरे
हम जैसे और भी कई होंगे
जो घूमते होंगे किन्हीं दूसरी राहों पर
मिलेंगे एक दिन वे भी यों ही अचानक
वक्त के परदे से निकलकर
ये
वो
और हम सब दोस्त बनेंगे
अपनी दुनिया अपने हिसाब से रचेंगे

फिलहाल तो धूल थी और धूप हमारे बीच
और हम बढ़ चले थे अपनी जुदा राहों पर
एक ही जगह जाने को
साथ थे पिता की उम्र के वाचस्पति जी
जिन्हें मैं चाचा कहता हूँ
बुरा वक़्त देख चुकने के बावजूद
उनकी आँखों में वही सपना बेहतर ज़िन्दगी का
और जोश हमसे भी ज़्यादा
साहित्य, सँस्कृति और विचार के स्वघोषित आकाओं के बरअक्स
उनके भीतर उमड़ता एक सच्चा संसार
                       जिसमें दीखते नागार्जुन, शमशेर, त्रिलोचन, धूमिल और केदार
                       और उनके साथ
                       कहीं-कहीं हमारे भी अक्स दुविधाओं में घिरे राह तलाशते
                       किसी बड़े का हाथ पकड़ घर से निकलते
                       और लौटते
˜˜˜
हम पैदल भटकते थे – वाचस्पति जी और मैं
जाना था लोहटिया
जहाँ मेरे बचपन का स्कूल था
याद आती थीं प्रधानाध्यापिका मैडम शकुन्तला शुक्ल
उनका छह महीने का बच्चा
रोता नींद से जागकर गुँजाता हुआ सारी कक्षाओं को
व्योमेश
जो अब युवा आलोचक, कवि और रंगकर्मी बना

एक छोटी सड़क से निकलते हुए वाचस्पति जी ने कहा –
यहाँ कभी प्रेमचन्द रहते थे
थोड़ा आगे बड़ा गणेश
गाड़ियों की आवाजाही से बजबजाती सड़क
धुँए और शोर से भरी
इसी सब के बीच से मिली राह
और एक गली के अखीर में वही – बिलकुल वही इमारत
स्कूल की
और यह जीवन में पहली बार था
जब छुट्टी की घंटी बज चुकने के बाद के सन्नाटे में
मैं जा रहा था वहाँ
वहाँ मेरे बचपन की सीट थी सत्ताइस साल बाद भी बची हुई
ज्यों की त्यों
अब उस पर कोई और बैठता था
मेरे लिए वह लकड़ी नहीं एक समूचा समय था
धड़कता हुआ मेरी हथेलियों के नीचे
जिसमें एक बच्चे का पूरा वजूद था
ब्लैकबोर्ड पर छूट गया था उस दिन का सबक
जिसके आगे इतने बरस बाद भी मैं लगभग बेबस था

बदल गयी मेरी ज़िन्दगी
लेकिन बनारस ने अब तलक कुछ भी नहीं बदला था
यह वहीं था सत्ताइस बरस पहले
खोलता हुआ दुनिया को बहुत सम्भालकर मेरे आगे
˜˜˜
गाड़ी खुलने को थी – बुन्देलखण्ड एक्सप्रेस जाती पूरब से
दूर ग्वालियर की तरफ
याद आते थे कल शाम इसी स्टेशन के पुल पर खड़े
कवि ज्ञानेन्द्रपति
देखते अपने में गुम न जाने क्या-क्या
गुज़रता जाता था एक सैलाब
बैग-अटैची बक्सा-पेटी
गठरी-गुदड़ी लिए कई-कई तरह के मुसाफ़िरों का
मेरी निगाह लौटने वालों पर थी
वे अलग ही दिखते थे जाने वालों से
उनके चेहरे पर थकान से अधिक चमक नज़र आती थी
वे दिल्ली और पंजाब से आते थे
महीनों की कमाई लिए
कुछ अभिजन भी अपनी सार्वभौमिक मुद्रा से लैस
जो एक निगाह देख भर लेने से शक करते थे
छोड़ने आए वाचस्पति जी की आँखों में अचानक पढ़ा मैंने – विदाई!
अब मुझे चले जाना था सीटी बजाती इसी गाड़ी में
जो मेरे सामने खड़ी थी
भारतीय रेल का सबसे प्रामाणिक संस्करण

प्लेटफार्म भरा हुआ आने-जाने और उनसे भी ज़्यादा
छोड़ने लेने आने वालों से
सीट दिला देने में कुशल कुली और टी.टी. भी
अपने-अपने सौदों में लीन
समय दोपहर का साढ़े तीन

कहीं पहुँचना भी दरअसल कहीं से छूट जाना है
लेकिन बनारस में पहुँचा फिर नहीं छूटता – कहते हैं लोग
इस बात को याद करने का
यही सबसे वाजिब समय था
अपनी तयशुदा मद्धम रफ़्तार से चल रही थी ट्रेन
और पीछे बगटुट भाग रहा था बनारस
मुझे मालूम था कुछ ही पलों में यह आगे निकल जाएगा
बार-बार मेरे सामने आएगा

इस दुनिया में
क्या किसी को मालूम है –
                       बनारस से निकला हुआ आदमी
                       आख़िर कहाँ जाएगा…
2006

देवताले जी को कुछ चिट्ठियाँ

23/12/2009

24.09.2005

हमारे बहुत प्यारे दादा जी,
                                             हमारा बहुत-बहुत प्यार,

जैसा कि तय था नए घर में आपकी चिट्ठी ही डाकिये को पहली बार मुझसे मिलाने लायी। आपके अक्षर अब भी मोती जैसे ही हैं। अब यह ज़रूरी तो नहीं कि मोती माला में व्यवस्थित ही रहें, वे बिखरे हुए भी सुन्दर लगते हैं।

यहाँ भी भारी बरसात है। जिसे उधर झड़ी लगना कहते हैं, उसे कुमाऊँनी में तौड़ा लगना कहते है। झड़ी से तौड़ा ज़्यादा शक्तिशाली होता है। नए घर में खूब जगह है। बाज़ार में होकर भी यह उससे बचा हुआ है। हिमालय उतना ही दिखता है। गौतम का प्रस्तावित स्कूल यहाँ से आधा कि0मी0 है। शायद 1 अक्टूबर से वह स्कूल जाएगा। मेरा कालेज अलबत्ता अब ढाई कि0मी0 हो गया है, पहले डेढ़ था।

अभी खूब झमाझम बरसात है। बाहर बंदरों का झुंड आसरा तलाशता हमारे बरामदे में आ धमका है। बंदरियों ने हाल में पैदा हुए बच्चों को कस के चिपटा रखा है। बड़े बंदर घुड़की दे रहे हैं। ख़ास कर एक जो मुखिया लगता है, मकानों के भीतर की ज़िन्दगी में ख़ासी दिलचस्पी रखता है। सीमा ने मेरी पसन्द का आटे का हलुआ बनाया है। उसकी गंध शायद बंदरों में भी कुछ खलबली मचा रही है। गौतम के लिए यह सारा कार्य-व्यापार जैसे उसके पसंदीदा ज्योग्राफिक चैनल का जीवन्त हिस्सा है। ऐसी बरसात और ऐसे माहौल में हमारा रानीखेत आपको मीठी नींद के लिए आमंत्रित करता है।

मैं कुछ देर पहले ही बाहर से आया हूँ। आज राष्ट्रीय सेवा योजना दिवस है और मेरी सलाह पर हमारी इकाई ने इसे स्थानीय अस्पताल में परिचर्या करते हुए मनाया है।

मेरा पिछला पत्र आपको अब मिल गया होगा….

दादी जी को हम सभी का प्रणाम।

 अनु जी से मेरे लिए उनकी कोई रिकार्डिंग माँगिएगा।

सादर आपका

शिरीष

***

27.10.2005

आदरणीय दादा जी तक हमारा प्यार पहुंचे,

आप आजकल व्यस्त होंगे। दिल्ली आवागमन जोरों पर होगा। आपको इस तरह कामकाजी देखना-सुनना अच्छा लगता है। मैं भी इधर शानी पर अपने शोध के अंतिम हिस्से पर हूँ। गो कि मुझे पी.एच-डी. करना रास नहीं आ रहा, फिर भी ……वेतनमान के चक्कर में पड़ गया हूँ। पी.एच-डी. धारियों से दो साल पिछड़ गया हूँ। वहाँ का तो पता नहीं पर हमारे इधर मैंने अपने सामने कम से कम दस स्त्री-पुरुषों को देखा है, जो पचास हज़ार के ठेके पर डॉक्टर कहलाने लगे – एकाध की नौकरी भी लग गई। फिर वीरेन दा ने समझाया कि बेटा ये नौकरी है, इसमें कवि होने भर से काम नहीं चलता, थोड़ी-बहुत घास भी छीलनी पड़ती है- इंक्रीमेंट और स्केल के घोड़े जो पालने हैं। बहरहाल मैं चिकित्सावकाश लेकर घास छील रहा हूँ। इस महीने के आख़िर तक `यह ले अपनी लकुटि-कमरिया` कहने की स्थिति में आ जाऊँगा।

वागर्थ वाली कविताएँ 23 से 29 जून के बीच लिखीं थीं फिर मामला ठप्प पड़ गया। कुछ भी लिखना नहीं हो पाया। आमीखाई वाली किताब के लिए छह पेज की सामग्री ज़रूर अनुवाद की, पर रचनात्मक कुछ भी नहीं। एक हफ्ते पहले परममित्र रमदा आए। दो दिन रहे। हमेशा की तरह दोनों ने मिलकर जंगलों की ख़ाक छानी। खोई ऊर्जा दुबारा लौटती लगी। जेब काटने वाली एक औरत पर कविता लिखी। इस हैरतअंगेज़ आपबीती को कई महीनों से भीतर छुपाए बैठा था। लिखकर अच्छा लगा। बाद में जिन बंदरों को लगातार निहार रहा था, उन पर एक लम्बी कविता हुई, जिसे मैंने तुलसी और निराला को समर्पित किया। हिमाचल से निकलने वाली एक पत्रिका `इरावती` में कुमार विकल पर मेरी एक कविता छपी है। आप तक न पहुँचे तो मैं छायाप्रति कर पहुँचाऊंगा।

सीमा ने हिमालय को खूब झाड़ा-पोंछा था। उसके श्रम का सम्मान करते हुए रोज़ कुछ देर अपलक उधर ही निहारता  हूँ। इधर बारिश नहीं होने के कारण घाटियों से उठती किंचित गर्म हवा ठंडी होकर पहाड़ों पर धुंध बना रही है। हिमालय अकसर अलक्षित हो जाता है। मैदानों में तो अब भी पंखे ही चल रहे होंगे। यहाँ दिन का तापमान 16 और रात का 8 से भी कम है। कुल मिलाकर मज़े हैं।

आपकी लिखा-पढ़ी कैसी चल रही है….

इधर तनाव के तीन अंक एक साथ आए हैं। सुरेश सलिल जी द्वारा किए गए आमीखाई के अनुवादों की घोषणा भी है- शायद अगला अंक यही होगा।

मैं इस बार शीतावकाश यहीं गुज़ारने के बारे में सोच रहा  हूँ। बेटा हिमपात देखना चाहता है। निकला भी तो 10 से 25 जनवरी के बीच निकलकर लौट भी आऊँगा। मैंने कई बार गिरती बर्फ का मंज़र देखा है। हिमपात के वक़्त बहुत शान्त और अपेक्षाकृत गर्म मौसम होता है। जाड़ा अगले रोज़ पड़ता है, जब बर्फ पिघलनी शुरू होती है। और उस पर पाला गिरता जाता है। रास्ते फिसलने लगते हैं – यातायात में तेज़ी आ जाती है। गिर पड़े तो हर गंगे भी नहीं कर सकते।

उम्मीद है जल्द ही आपका पत्र आएगा। दादी जी को मेरा और सीमा का प्रणाम देंगे। गौतम भी आपको याद करता है।

आपका

शिरीष

***

03.04.2006

प्रिय दादा जी,
                          बहुत-बहुत प्यार,

फोन पर अपनी बात हुई, पर जैसा कि आप कहते हैं आख़िरी बात हमेशा रह जाती है। इस आख़िरी बात को आप दुबारा, तिबारा…..जितनी बार भी कहना चाहें, यह रह ही जायेगी।

आपकी कविता पर हम बात कर रहे थे और आपने कहा कि मैं ओपेन हार्टेड नहीं बोल रहा हूँ। ऐसा कुछ नहीं था। मैं जिस ज़िद की बात कर रहा था, उसे शायद ठीक से कभी बता भी नहीं पाऊँगा। मेरे लिए यह कुछ इस तरह है। मंगलेश दा की कविता में एक कोमल काँपती हुई-सी ज़िद जगजाहिर है। वीरेन दा में यह खुराफ़ात की हद तक जा पहुँचती है और बाबा की याद दिलाती है। आपमें इस ज़िद के दो छोर हैं- एक छोर पर बाबा हैं और दूसरे पर मुक्तिबोध। मैं यहाँ प्रभाव की बात बिल्कुल नहीं कर रहा हूँ। जो मैं कह रहा हूँ पता नहीं कह भी पा रहा हूँ या नहीं… आपकी कविता मुझे तब बहुत अच्छी लगती है, जब इस ज़िद के दोनों छोर पकड़ में आ जाएँ। `सबसे ग़रीब आदमी` में दोनों छोर मेरी पकड़ में आते हैं, लेकिन `बुश` की कविता में सिर्फ एक छोर। हाँ, सबसे ग़रीब आदमी की भाषा में मेरे लिए कुछ दिक्कतें हैं, जैसे कि `गफ़लत में गाफ़िल` सरीखा प्रयोग! इन दिक्कतों को छोड़ हूँ तो पूरी कविता एक ऐसी आग और आवेग से भरी है, जो आपकी ही नहीं, युवतर पीढ़ी में भी दुर्लभ है। इस कविता के लिए आपको अलग से प्यार। पिपरियावाली कविता मेरे लिए वहाँ लौटने जैसी है- उस रेल्वे स्टेशन पर रात-बिरात तक बैठे रहना आज भी मेरा प्रिय शगल है।

यहाँ गर्मी आने में देर है। रह-रहकर बरसात हो जाती है और लोग स्वेटर पहनकर घूमने लगते हैं। कालेज में परीक्षा ज़ोर पर है। रोज़ाना दो ड्यूटी करके थक जाता हूँ। यह सिलसिला अप्रैल के आख़िर तक जायेगा। तब तक मेरे भीतर से मगज़ निकलकर उसकी जगह भूसा भर जायेगा। होने को भूसा अब भी कम नहीं है – राह में मिलनेवाले गाय-बैल अकसर मेरे पीछे-पीछे आने लगते हैं! आपका क्या ख़याल है….

जैसी मंगलेश दा की ज़िद है वैसी दादी जी की स्नेहभरी आवाज़, उन्हें मेरा प्रणाम। उत्कृष्ट महाविद्यालय की मैडम को बाअदब सलाम। लूसी-टिग्रेस-ब्लैकी को प्यार…… लूसी को कम….. ब्लैकी को ज़्यादा।

शिरीष

***

17.07.2006
बहुत प्यारे दादा जी,

आप रंगून से लौट रहे होंगे। मैंने दादी जी को फोन पर पूछा था कि आपके रंगून जाने से उन्हें एक पुराना गीत याद आता है कि नहीं…. मैं तो रंगून ही कहूँगा – यांगून नहीं। मेरे भीतर की कोई छवि टूटती है। पूरा विश्वास है वहाँ सब बढ़िया रहा होगा। मज्जे किए होंगे। राशन 60 ही रक्खा होगा, ज़्यादा नहीं! एक अच्छी यात्रा थकाने की बजाए आदमी को आगे के लिए स्फूर्ति देती है। आप भी ऐसे ही लौटे होंगे। आज दो-एक चिट्ठियाँ मजबूरी में लिखनी पड़ीं तो दिल ने कहा जहाँ लिखना चाहता है वहाँ भी लिख। इसलिए ये चिट्ठी, बस यूँ ही……..

इधर पहाड़ों पर झमाझम बरसात उमड़ आयी है। गाड़-गधेरे उफन रहे हैं। बरसात में पहाड़ी ढलान से जो प्राकृतिक नाले नीचे की ओर बह चलते हैं, उन्हें गधेरा कहते हैं और जगह-जगह गधेरों के मिलने-जुड़ने से दो पहाड़ों बीच जो स्थायी जलधारा बन जाती है, उसे गाड़ कहते हैं। यहाँ बादल आकाश से ही नहीं बरसते, कभी-कभी घर में घुसकर भी सब चीज़ों को नम कर जाते हैं। पहाड़ों में ऐसी आत्मीय गतिविधियों से नम होने जाने वाली चीज़ों में मेरी आँखें तो हमेशा ही शामिल हैं। बरसात मेरे बचपन का मौसम है। पहाड़ों में सड़कें टूटने का मौसम। असली बरसात गाँवों में होती है। रानीखेत तो शहर है, यहाँ वो मज़ा नहीं। मुझे मेरा पहाड़ी गाँव याद आता है, जहाँ बरसात रुकते ही हमें घर तक आते कच्चे रास्ते सुधारने पड़ते थे। अकसर छत पर लगे सलेटी पत्थरों की मरम्मत भी करनी होती थी। रास्तों से फिसलने वाले पत्थर निकालकर हम नए खुरदुरे पत्थर लगाते और निकाले हुए चिकने पत्थरों को किनारे-किनारे गाड़ कर बाड़-सी बना देते थे। इस मेहनत के बाद ताई के हाथों की गर्मागर्म चाय गुड़ के टुकड़े के साथ। गायें जंगल न जा पाने के कारण रम्भाती रहतीं, हालाँकि घास उन्हें भरपूर मिलती थी। वे छोटी-छोटी पहाड़ी गायें ढलानों पर कुलाँचे मारने की आदी होती थीं, जिनके साथ दौड़ना हम बच्चों को बहुत भाता था।

………दुनिया अब भी सुन्दर है दादा जी, है ना….

आप अपनी यात्रा के अनुभव सुनाइएगा। मैं आठ बरस पहले एक बार बदहवास-सा ईटानगर तक गया हूँ – वहाँ के लोक सेवा आयोग में नौकरी का साक्षात्कार देने।

पूरब आपको ज़रूर भाया होगा…

दादी जी और मैडम को प्रणाम। लूसी-टिग्रेस-ब्लैकी को प्यार।

आपका……..

शिरीष

***

डायरी के कुछ अटपटे पन्ने !

19/12/2009
                                            
यह डायरी हिमाचल प्रदेश से श्री गुरमीत बेदी के सम्पादन में छपने वाली पत्रिका “पर्वत राग” के जुलाई-सितम्बर 2008 अंक में छपी है.

  

14 जुलाई 2005
                                        

दिल्ली से लौटा। इस बार का अंकुर मिश्र पुरस्कार फैजाबाद के विशाल को मिला। बहुत अच्छा कवि है और कर्रा वक्ता भी। आत्मीय थोड़ा कम है। गले नहीं मिलता। शायद इसे ही सौम्यता कहते हैं। मैंने कभी ऐसा औपचारिक वातावरण नहीं पाया, सो इसके आदाब भी नहीं जानता। गले मिलता हूँ। दोस्तों के गले में हाथ डाल देता हूँ। पीठ पर धौल खाना और जड़ना, दोनों अच्छा लगता है।
                 

इस बार लौटते हुए अपने पुरस्कार की एक बात बार-बार याद आयी। 14 की रात मैं रेल में था। दो बजे वीरेन दा का फोन आया – `जो कुछ हुआ उसे भूल जा तुरंत! इसी में उलझा रहा तो काम ना पाएगा तेरे से। तूने बतेरा काम करना है अभी।` इस संवाद की याद ने एक बरस बाद भी उतनी ही ताकत दी और लौटने के बाद मुझे एक ही काम सूझा – सोना!
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16 जुलाई 2005

कल रातभर सपनों में झूलता रहा। बचपन से आए सपने। समय को पार करने में हमें भले ही समय लगता हो पर सपने पल भर में इधर से उधर हो जाते है। ताऊ जी (श्री जयदेव पाँथरी) को गुज़रे कई बरस बीत गए पर मेरे लिए उन तक पहुंचना बस एक सपने से गुज़रना भर है। सपने में अपने लोग थे और अपना गाँव भी। बहुत कुछ असली और कुछ सोये हुए दिमाग की दिपदिपाती कल्पना से निकला। बारिश के दिनों का नौगाँवखाल। पहाड़ों पर गिरती अनथक बरसात। जगह-जगह उग आयी काई रंग की मखमली वनस्पतियाँ। हाथों पर सफेद छाप छोड़ने वाली पत्तियाँ। मकानों और रास्तों में मरम्मत और सुधार का मौसम। धूप निकलते ही हम काम पर जुट जाते। छतों पर इधर-उधर खिसके सलेटी पत्थरों को सही जगह पर लगाते। रास्तों से मिट्टी हटाते। कोटद्वार से आती रसद लाती सड़क इन दिनों अक्सर बंद ही रहती। इन सब चीज़ों को पहले हक़ीक़त में जीना और फिर इनसे दूर होकर इन्हें सपने में देखना एक विचित्र किंतु आत्मीय अनुभव है। कभी-कभी लगता है कि मेरे पास यह हक़ीक़त और इसे बार-बार सपने में देख सकने की यह थोड़ी सी ताकत नहीं होती तो मैं क्या करता….. कहाँ होता….
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24 जुलाई 2005

आज फिर ताऊ जी याद आए। जब कभी कहीं से ठेस लगती है वे याद आते हैं। उनकी और नौगाँवखाल की याद एक आसरा-सी लगती है। मैं हारकर वहाँ छुप सकता हूँ। अतीत में ही सही पर हारने के बाद ताकत जुटाने और दोबारा मुकाबले में लौट सकने के लिए एक आसरा तो है मेरे पास।

कुलीन पाँथरी ब्राह्मण होने के बावजूद उन्होंने शायद ही कभी अपने घर में पुरोहित बुलाया हो। कट्टर आर्यसमाजी। मूर्ति और मंदिर को न मानने वाले ताऊ जी की साहसी छवि जैसे आज भी मेरे भीतर मंत्रोच्चार करती है। यज्ञ की वैदिक विधियों से गुज़रते कमरे का वह धूम्रसिक्त वातावरण और हवन सामग्री की अरघान मेरी आत्मा में सुरक्षित है। कोई कितना ही खुद को कम्युनिस्ट कहे पर इस पूँजी को छोड़ पाना उसके लिए नामुमकिन ही होगा।

याद आता है छोकरेपन में एक बार ठोड़ी फोड़कर घर आया था। माँ ने चोट देखकर पहली प्रतिक्रिया थप्पड़ मारकर दी। पिता ने कालेज से लौटने पर त्यौरियाँ चढाई। ताऊ जी थे जिन्होंने मुझे घास के गट्ठर की तरह झप्प से उठाया और अस्पताल की ओर दौड़ गए। मैं 15 बरस का था। किशोरावस्था में अपमान भी ज्यादा सालता है। ताऊ जी ने मेरा खून ही नहीं, आँसू भी पोंछे। रोना आने पर उनकी वह गरम हथेली आज भी अपने चेहरे पर महसूस करता हूँ।
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14 अगस्त 2005

उस्ताद सलामत अली खान का एक चंद्रकौंस मिला। सुनकर हैरान हूँ। बड़े गुलाम अली खाँ , अमीर खाँ साहब, राशिद खाँ वगैरह को सुनते हुए अकसर सोचता हूँ कि मुस्लिम गला इतना मीठा क्यों होता है…. लोग वादन गायकी अंग में करते हैं पर उस्ताद सलामत अली ने गायकी में वादन जैसा प्रभाव पैदा किया है। उनकी तान में वायलिन बजता हुआ महसूस होता है। अंत में तराना अमीर खुसरो का । इस सबको सुन पाना भी एक कविता ही है।

दादाजी* से भी बात हुई। आँख के आपरेशन के बाद अब उनका चश्मा बन रहा है। कुछ दिन से पढ़ना-लिखना बंद है। चार-पाँच रोज़ और बंद रहेगा। मैंने उन्हें नहीं बताया की वागर्थ में मेरी कविताएँ छपी हैं। हालाँकि उनकी प्रतिक्रिया का हमेशा इंतज़ार होता है। किसी चिट्ठी में लिखी उनकी यह बात हमेशा याद रहती है कि कविता अपनी ज़मीन और ज़मीर से आती है। दुनिया में हज़ारों तरह के लोग हैं। उनके बीच अपनी आवाज़ सुन पाना ही बड़ी बात है। पता नहीं हो पाता है या नहीं, लेकिन मैं अपनी आवाज़ सुनने की पूरी कोशिश कर रहा हूँ।
* दादा जी – कवि चंद्रकांत देवताले को आत्मीय संबोधन।
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15 अगस्त 2005

क्या आज़ादी सिर्फ तीन थके हुए रंगों का नाम है
जिन्हें एक पहिया ढोता है
या इसका कोई ख़ास मतलब होता है…
  
लोहे का स्वाद लुहार से नहीं
उस घोड़े से पूछो
जिसके मुँह में लगाम है। (धूमिल)

आज़ादी का दिन। एक बार फिर। वही जलसा कालेज का। जन-गण-मन। शिक्षा निदेशक महोदय का वही सालाना संदेश। तबीयत भी ख़राब। आँतों में संक्रमण। डॉक्टर के अनुसार अब रात के खाने में माँस के बिना कौर न तोड़ने की आदत कम से कम बरसात भर के लिए त्यागनी पड़ेगी। खाने की आज़ादी की ख़त्म।
 

नागार्जुन याद आ रहे हैं। पर क्यों… कवि अरुण कमल को क्या सूझी `जिनके मुँह में कौर माँस का उनको मगही पान`´ लिखने की… रामनगर के घर में एक बार मुर्गे का भोग लगाते बाबा ने लटपटी जीभ से बताया था 36 तरह के माँस का स्वाद, जिसमें मुसहरों के साथ खाया चूहा भी शामिल था। वह पहली बार हमारे साथ इतने दिन गुज़ार रहे थे। मैं 18 बरस का था और उनके आगमन से लगभग पगलाया हुआ सा। आवभगत से ऊब कर बोले थे `सुनो शिरीष ! हमें छाती पर उठाने की कोशिश मत करो। यहीं दीवान पर रहने दो। हम भी आराम से रहेंगे और तुम भी।´ उनकी कई बातें हैं जो रह-रहकर याद आती हैं। कभी कहीं आते-जाते, यहाँ तक कि कक्षा में लेक्चर झाड़ते हुए भी वे याद आ जाते हैं। भाऊ पर कथ्यरूप ने विशेशांक निकाला तो मेरे पिता ने भी सहायता की। बाबा तब काशीपुर-रामनगर प्रवास पर थे। उन्होंने भाऊ के बारे में मुझे बहुत कुछ बताया। बाबा को एक बार भाऊ ने डपटा। बाबा ने बताया `मैं एक बार कह बैठा चलो भाऊ आज तो तुम्हारे घर ही रहेंगे। यह भन्ते बड़े-बड़े आदमियों से मिलाता है। इसके साथ और रहा तो मेरे सींग उग जायेंगे। भाऊ ने एक बार अनसुनी करी। फिर कहा तो गुस्से में लगभग रोते हुए बोले – मुँह उठाया और कह दिया तुम्हारे घर चलेंगे। पता नहीं मेरे पास बिस्तर है कि नहीं… और हो भी तो मैं अभी घर जाकर खुद क्या खाऊँगा क्या तुम्हें खिलाऊँगा…`´ ये घटना नागपुर में मेरे पिता के सामने घटी थी और वे भी कई बार इसका ज़िक्र करते रहते हैं।

क्या वाकई इतनी मुश्किल दुनिया थी वह…. एक बड़ा चित्रकार इस तरह खाने को मोहताज़ था। अपने सबसे प्यारे दोस्त को भी वह एक रात के लिए घर नहीं ले जा पाया। हम जो दावतें देते हैं अपने लेखक दोस्तों को, साथ मिलते-बैठते खूब खाते-पीते हैं, क्या इसमें गुज़र चुके उन लोगों का कोई हिस्सा नहीं है… मैं एक दावत का ख़्वाब देखता हूँ, जिसमें पीते-पिलाते हुए बाबा वीरेन दा, मंगलेश दा, रमदा, खरे जी, अशोक और देवताले जी को उन 36 जीवों का अलग-अलग स्वाद बताएँ और खूब पी चुकने के बाद कहीं से अचानक आकर भाऊ हम सबको खाने पर अपने घर ले जाएँ।

मैं अपनी ज़िन्दगी में मुक्तिबोध, परसाई जी और भाऊ – इन तीन लोगों से मिलना चूक गया। मुक्तिबोध से तो मिलना मुमकिन ही नहीं था पर बाक़ी दो लोग मेरी और मेरे समय की ज़द में थे। भाऊ को छोड़ भी दूँ, तब भी परसाई जी काफ़ी बाद तक दुनियानशीं रहे। मैं शायद इस दुनिया की सच्ची क़ीमत ही नहीं जानता था तब।
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17 अगस्त 2005

दो-तीन दिन व्यस्तता में बीते। कालेज में चल रही अंतर्महाविद्यालय शतरंज प्रतियोगिता समाप्त हुई तो कुछ राहत मिली। दूसरी चीज़ों के बारे में सोचने का वक्त मिला। इस बीच कक्षाएँ भी नहीं लगीं। न पढना हुआ न पढ़ाना। लड़के यहाँ हिंदी साहित्य नहीं लेते। इसे लड़कियों का विषय माना जाता है। वे सब बहुत भली होती हैं। अधिकांश ग्रामीण इलाक़े की। अभी सितम्बर के महीने से घास काटने चली जायेंगी। उन दिनों कक्षा की उपस्थिति आधी रह जाती है। पहाड़ों में जाड़ों के लिए तैयारी पहले ही शुरू करनी पड़ती है, जिसमें ईधन के लिए चीड़ की सूखी टहनियाँ तोड़ना और पशुओं के लिए पेड़ों पर लूटा लगाना शामिल है। बरसात के तुरन्त बाद ढलानों से लंबी हरी घास को काट कर उसे पेड़ों पर गट्ठरों में बाँधने को लूटा लगाना कहते हैं। यह घास सर्दियों भर पशुओं के आहार का मुख्य स्त्रोत होती है। इस काम में जुटी स्त्रियों की थकान का शायद ही कोई मोल हो। सीमा अकसर ऐसी औरतों चाय पिलाने बिठा लेती है। चार साल का गौतम श्रम के बारे में कुछ नहीं जानता। लेकिन वह खेल-खेल में उनकी साड़ी में चिपके कुम्मर (काँटे) निकाल देता है और वे उस पर अपनी ममता लुटाती हैं। घर से सास के हाथों पिटकर घास काटने आयी एक औरत उसकी इस कार्रवाई पर उसे चिपटा कर रोने लगी। एक बच्चा ही शायद इतनी आत्मीयता पैदा कर सकता है। इन औरतों के पति ग़रीब और कामचोर हैं। शराब उन्हें और बिगाड़ती है। विडम्बना यह कि घरों में बच्चों की सहानुभूति भी अकसर माँ के साथ नहीं होती। वे अपना दुख कहीं कह नहीं सकतीं। उन्हें काम पर जुटे देखकर लगता है कि ये ख़ुद को ख़त्म कर देने के लिए इतनी मेहनत कर रही हैं। किसी आत्मलीन घसियारी की दराँती कभी-कभार खुद के ही हाथों पर चल जाती है। एक बार मैंने देखा कि एक औरत की दराती से घास में छुपा साँप कट गया। मैं तब बहुत छोटा था। स्त्रियों के साहस का ज़िक्र छिड़ने पर मुझे कोई ऐतिहासिक चरित्र नहीं, हाथ में काले नाग के दो टुकड़े झुलाती वह महिला ही याद आती है। अपनी ज़िन्दगी के छुपे हुए साँपो के साथ वह वैसा सलूक नहीं कर पायी। जब मैं पंद्रह साल का था, वह इलाज के अभाव और घरवालों की लापरवाही के चलते घुट-घुटकर मर गई।

मेरी डायरी में वर्तमान कम है, अतीत ज़्यादा। शायद इसलिए कि अतीत अधिक अनुभव सम्पन्न था। कवि के लिए उसका वर्तमान भी कविता में लिखे जाने तक अतीत में बदल चुका होता है। मेरी उम्र लगभग बत्तीस साल है और मेरे लिए दुनिया को अभी और प्रकट होना है। लेकिन कब…. पता नहीं। अभी तो वही दुनिया है जो पीछे छूट गई और बहुत याद आती है। मैं बार-बार वहाँ पहुँच कर खुद को पुकारता हूँ। यह नास्टेल्जिया से कुछ अधिक है। लगभग अपरिभाषित। इसमें मेरा पूरा परिवेश है। मैं आज की चीज़ों को पुराने वक़्त में और तब की चीज़ों को नए वक़्त में लाता ले जाता रहता हूँ। यह एलिस इन वंडरलैंड जैसा होता है। पर इससे ताकत मिलती है। मैं कविताओं में इसका अधिक जोखिम नहीं ले सकता। हालाँकि बहकता वहाँ भी हूँ। बिना अतीत की कविता का शायद ही कोई भविष्य होता हो।
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21 अगस्त 2005

कालेज में अभी प्रवेश हुए ही हैं कि परीक्षाफल सुधार परीक्षा आ गई। साथी और राजनीति विज्ञान के लेक्चरर पुष्पेश इसे `फिर वही दिल लाया हूँ ´ कहते हैं। इस परीक्षा के बाद छात्र राजनीति का महापर्व छात्र-संघ के गठन के रूप में मनाया जाता है, जिसके लिए बाकायदा निर्वाचन प्रक्रिया चलती है। पंद्रह दिन होम हो जाते हैं। फिर पाठ्येतर गतिविधियों के नाम पर राष्ट्रीय सेवा योजना के दो दस दिवसीय शिविर लगते हैं और दशहरा-दीवाली आदि होता रहता है। फिर ठंड बढ़ती है। मौसम ख़राब रहने लगता है। कालेज सिर्फ दिखावे के लिए खुलता है और फिर जनवरी के प्रथम सप्ताह से फरवरी के दूसरे सप्ताह तक के लिए शीतावकाश हो जाता है। मार्च से परीक्षा शुरू यानी `फिर वही दिल लाया हूँ´ !

तद्भव 12 पढ़ रहा था अभी। हरेप्रकाश उपाध्याय की कविताएँ अच्छी हैं। उनमें लय खोजने की वही चाह है, जो मुझे खुद में महसूस होती है। उन्हें अपने विषय खोजने होंगे। मुझे पता नहीं क्यों ऐसा लगता है पर जैसे हर सच्चे रचनाकार का स्वभाव अलग होता है, वैसे ही हर कविता का भी। जब मिलती-जुलती कविताएँ दिखाई देने लगें तो क्लोन बनाने जैसा लगने लगता है। मैं अकसर खुद को इस कटघरे में खड़ा करता हूँ और अपनी लिखी कुछ चीज़ें फाड़ देता हूँ। बेहतर होने के लिए निर्मम भी होना पड़ता है। अपने और अपने लिखे के प्रति शायद ही कोई वीरेन डंगवाल जितना निर्मम हो पाए। उनके दो संग्रह हैं और दोनों एक ही आत्मा के साथ बिल्कुल अलग ज़मीन पर खड़े दिखाई देते हैं। वे एक ही खेत में कई फसलें उगा पा रहे हैं। उनके जैसा हो पाना कठिन है, लेकिन उनसे प्रेरित तो हो ही सकते हैं।
आजकल कविता लिखना बंद है। कुछ चीज़ें हैं जो खदबदा रही हैं। शायद कुछ समय बाद हाँडी चढ़ानी पड़े। अभी तो सब कुछ स्थगित है।
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04 सितम्बर 2005

कल रात वीरेन दा का फोन ! बाद में फोन पर ही हाल की लिखी लम्बी नई कविता का अद्भुत पाठ। रात 11 बजे तक तो जिन चिराग से बाहर आ ही चुका होता है। कविता अब भी दिल में गूँजती है। बरेली से लगा हुआ रामगंगा के कछार पर बसा कटरी गाँव। वहाँ रहती रुक्मिणी और उसकी माँ की यह काव्य-कथा। नदी की पतली धार के साथ बसा हुआ साग-सब्जी उगाते नाव खेते मल्लाहों-केवटों के जीवन की छोटी-बड़ी लतरों से बना एक हरा कच्चा संसार। कलुआ गिरोह। 5-10 हज़ार की फिरौती के लिए मारे जाते लोग, गो अपहरण अब सिर्फ उच्च वर्ग की घटना नहीं रही। कच्ची खेंचने की भट्टियाँ। चौदह बरस की रुक्मिणी को ताकता नौजवान ग्राम प्रधान। पतेलों के बीच बरसों पहले हुई मौत से उठकर आता दीखता रुक्मिणी का किशोर भाई। पतवार चलाता 10 बरस पहले मर खप गया सबसे मजबूत बाँहों वाला उसका बाप नरेसा। एक पूरा उपन्यास भी नाकाफ़ी होता इतना कुछ कह पाने को। यह कविता हमारे समय की मनुष्यनिर्मित विडम्बनाओं और विसंगतियों के बीच कवि की अछोर करुणा का सघनतम आख्यान प्रस्तुत करती हुई सदी के आरम्भ की सबसे महत्वपूर्ण कविता मानी जाएगी। मैं सिर्फ आने वाले कुछ दिन नहीं, बल्कि पूरी उमर इसके असर में रहूँगा। वीरेन दा से कह नहीं सकता और भाग्य को भी नहीं मानता पर कहना ऐसे ही पड़ेगा कि हमारा सौभाग्य है कि हम उन्हें अपने बीच पा रहे हैं।
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06 सितम्बर.2005

आज की डाक में `एक कवि की नोटबुक` आयी। राजेश जोशी कई बार पत्रिकाओं में जो नोट्स लिखते रहे हैं, यह लगभग उन्हीं का संग्रह है। उन्होंने नागार्जुन के बारे में अद्भुत लिखा है। कितनी खुशी की बात है कि किसी स्वनामधन्य आलोचक ने नहीं, एक कवि ने नागार्जुन के केंद्रीय पद `देखा है` को पहचाना है। मुक्तिबोध, शमशेर, केदार और कुमार विकल पर राजेश जोशी का आकलन एक दस्तावेज़ सरीखा है। देवताले जी के बारे में उनके विचार जानने को उत्सुक था। पढ़कर हैरानी ही हाथ लगी। क्या देवताले जी ने सचमुच सिर्फ अकविता ही से शुरू किया था… वे कब और कैसे अकवि से कवि बन गए…. क्या वे कवि बन भी पाए…

हरम और हमाम औरतों के बनाए हुए नहीं हैं। यदि वे सड़क को ही हरम और हमाम की तरह वापर रही हैं तो पुरुषों की रची इस दुनिया में यह भी उनकी एक नियति है, जिसमें तीखा व्यंग्य और प्रतिकार भी है। राजनीति मार्क्स का खूँटा पकड़ कर बैठ जाने से ही नहीं होती। उन औरतों से बड़ा सर्वहारा कौन है, जिन से देवताले जी की कविता एक लगातार आत्मीयता के साथ बोलती-बतियाती दीखती है।

बिम्बों की लदान खुद राजेश जोशी में भी कम नहीं है। देवताले के बिम्ब तो बिम्ब जैसे भी नहीं हैं। उनमें रंग-गंध की कातरता भी उस स्तर पर नहीं है। वे राजेश जोशी की तरह नारे नहीं लगाते तो इसका अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि वे नए समाज का स्वप्न नहीं देखते। हर सपना पोस्टर में नहीं बदला जा सकता। देवताले समाज और जीवन की भर्त्सना करते हैं और विश्लेशण नहीं, इस बात को मान लेना एक अपराध होगा। जो किसी वाद में शामिल नहीं, वो कवि नहीं का ज़माना लदे कुछ बरस तो बीत ही गए हैं। देवताले जी का रेह्टारिक असली है और जीवन के बीहड़ में भटकने से पैदा होता है। यह सच है कि वे हमेशा ही सब कुछ ठीक नहीं लिखते। उनमें एक जिद है, जो कभी-कभी अखरती है। लेकिन इसे उनके व्यक्तित्व का हिस्सा मानना चाहिए, न कि उनके कवि की असफलता। मुक्तिबोध के बाद मध्य प्रदेश में चन्द्रकांत देवताले और विष्णु खरे से बड़ा कवि कोई नहीं हुआ। इस निष्कर्ष से सहमत होना सबके लिए मुमकिन नहीं होगा, लेकिन मेरे लिए यही हक़ीक़त है।
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10 सितम्बर 2005

कालेज में अनुवाद पर एक सेमीनार का प्रस्ताव जमा किया। हो पाया तो ठीक-ठाक काम हो जाएगा। रमदा ने `गिद्ध` माँगी। मेरे हस्तलेख में। फिलहाल छपी हुई भेजी। उनके दिमाग में भी कुछ अजीब-सा पकता रहता है।

इधर कई दिनों से लिखने की तमाम कोशिशें नाकामयाब हो रही हैं। कुछ समय के लिए मुझे ये कोशिशें भी स्थगित कर देनी चाहिए। मैंने कभी कोशिश करके नहीं लिखा। जो हुआ अपने आप अनायास हुआ। शायद यह खुद को जाँचने-परखने का अन्तराल है। ऐसे भी दिन आते हैं। लिखना सम्भव न हो पाए तो अनुवाद करने चाहिए। पढ़ना चाहिए। आने वाले दिनों में निराला, मुक्तिबोध और शमशेर को नए सिरे से पढ़ने की योजना बना रहा हूँ। कोशिश करूँगा कि उन्हें पढ़ते हुए अपने समझने के लिए कुछ बातें इस डायरी में नोट करता जाऊँ। यह एक अच्छी आदत है। इससे बाद में चीज़ें आसान हो जाती हैं। अपना सोचा-समझा हुआ लिखित रूप में रहे तो समझ में आए बदलाव को भी समझा जा सकता है।

पवनकरण की निरर्थक अनर्गल प्रलाप जैसी लम्बी कविताएँ पढ़ीं तो विमल कुमार की कविताएँ अचानक याद आयीं! संकलन मेरे पास है पर मकान बदलने की तैयारी में सारी किताबें बाँधी जा चुकी हैं। स्त्रियों पर उनकी कविताएँ बहुत अच्छी हैं। पिछली दिल्ली यात्रा में उन्हें देखा था। मिलना नहीं हो पाया।
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12.06.2006

यह डायरी इतनी अनियमित है कि अब इसका शायद कोई मतलब ही नहीं रह गया है। सितम्बर के बाद यह जून है। इस बीच बहुत कुछ बदल गया। 13 दिसम्बर को पल्लवी कपूर नहीं रही। मेरे जन्मदिन के दिन उसका जाना बहुत तकलीफदेह है। और भी बहुत कुछ बदल गया। दुनिया हमेशा क्या, कभी एक-सी नहीं रहती।

किताब राजकमल से लौट आयी। पहले माँगने फिर लौटाने का ये चलन मेरे लिए ख़ास रहा। सीखने के ऐसे मौके मिलते रहने चाहिए। मुझे खुद के कवि होने का आभास भले हो पर विश्वास बिल्कुल नहीं है। मैं किसी दौड़ या होड़ में भी शामिल नहीं। हो सकता है मैं उसके लायक ही नहीं। चुपचाप लिखता रहा और अपनी बनाई चीज़ें ही तोड़ पाया तो कवि होने का यह थोड़ा-सा आभास भी संतोष देगा। इधर एक उत्कृष्ट महाविद्यालय की मैडम को वचन दिया था कि अब और कविताई नहीं करूँगा, लेकिन बनारस पर एक कवितानुमा संस्मरण लिख बैठा। लताड़ भी पड़ी। भीतर की छटपटाहट निकलनी ही थी, निकल गई। ज्ञान जी कुछ दिन पहले आए अपने फोन के अनुसार उसे अगले अंक में छाप रहे हैं। छपने पर थोड़ा हल्ला मचेगा, ख़ासकर बनारस में। बहुत लोग ख़ुश भी होंगे, ख़ासकर बनारस के! मैं शायद ऐसा ही हूँ – समर्पित लेकिन शातिर भी। जगहें और लोग मुझमें कई-कई तरह की हलचलें पैदा कर देते हैं। मैं उनसे उदासीन नहीं रह सकता। अपने हिसाब से उसमें अच्छा-बुरा भी तय कर लेता हूँ। एक पागलपन है, जो बढ़ता ही जाता है। एक उलझन है, जो सुलझती जाती है। इधर अचानक ही मध्य प्रदेश से नाता जोड़ बैठा हूँ। पुरखों के रहवास के हिसाब से वहीं का हूँ पर अम्मा के गुज़रने के बाद उसके लिए कभी कोई सम्वेदना नहीं जागी। अब जाग रही है। जाग ही नहीं रही बल्कि मुझे जगा भी रही है। अभी पूरी तरह आश्वस्त नहीं हूँ। क्या अम्मा के बाद भी सचमुच मेरे लिए वहाँ से प्यार आएगा…

नौगाँवखाल फिर लौट रहा है। दरअसल वह कहीं गया ही नहीं- मेरे भीतर बसा रहा। आज गिरिराज किराडू की एक कविता पढ़ रहा था, भीतर के संसार के बारे में। नौगाँवखाल एक ऐसा ही संसार है। मैं वहाँ नहीं हूँ लेकिन वो यहाँ है। राह चलते अचानक किसी पहाड़ी वनस्पति की परिचित-सी गंध आते ही लगता है अरे यह तो मेरे बचपन की गंध है। कोई मुलायम-सा पत्थर, चीड़ और बाँज की टूटी टहनियाँ, एक झुर्रीदार चेहरा, कोई अकेला जाता बच्चा, अख़बार में किसी तेंदुए के नरभक्षी हो जाने की खबर, घासवालियों के हाथों में दराँती की छुमछुम – एक नहीं अनगिन चीज़ें हैं जो रोज़ कई बार मुझे टाइम मशीन की तरह विगत की यात्रा पर ले जाती रहती हैं। इसे अतीतजीविता नहीं कहूँगा। यह तो मेरे अतीत की समकालीनता है।
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23.07.2007

लगभग एक साल बाद आज इस डायरी के पन्ने खुल रहे हैं। मैं बहुत टूट चुका हूँ। मेरे दिल और दिमाग़ ने मेरा साथ देना छोड़ दिया है। जीवन तो किसी तरह निभता ही जाता है पर आग मन्द पड़ती जा रही है। अब तक पुल के नीचे से काफी रक्त बह चुका है। इधर काफ़ी कविता-कविता होता रहा। मैंने ख़ुद काफ़ी लिखा और इधर ज्ञानोदय में नयी पीढ़ी का चक्कर भी चलता रहा है। इस दौरान मैंने पाया कि विशाल की कविता अब भी बहुत सलीके से अपनी बात कहती है, लेकिन अलग नज़र नहीं आती। उसने जतिन मेहता लिखकर अपने लिए एक बड़ी चुनौती रख ली है, जिस पर हर बार उसे खरा उतरना है। व्योमेश शुक्ल काफी चमक के साथ सामने आया है – आगे चलकर उसे शायद अपनी ही चमक से चकाचौंध होना पड़े!
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24.07.2007 / आज डायरी में कुछ लेख जैसा लिखूंगा …………

जनवादी कविता की याद में………

हिन्दी में जनवादी कविता की एक प्रभावी धारा रही है। मुझ जैसे लोग तो यह भी मानते हैं कि यही बीसवीं सदी में हिन्दी कविता की असली ताक़त भी रही है। कबीर में इसके शुरूआती बीज हैं। भक्तिकाल में धर्म और दर्शन की भूलभुलैया से कतई परे भक्ति का एक अलग जनपक्षीय स्वरूप साफ पहचाना जा सकता है। रीति में भी कुछ मुक्त कवि मौजूद रहे। थोड़े बाद के समय में आगरे के नज़ीर को कौन भुला सकता है। आधुनिक युग में 1857 की विफलता के बाद भारतेन्दु ने किसी हद तक जनपक्षीय कविता का सूत्रपात कर दिया था, लेकिन उनका स्वर कई बार साम्प्रदायिक भी हुआ है। मैथिलीशरण गुप्त को भी हम सिरे नकार नहीं सकते। उनकी कविता अपने समय की जनता के स्वर को पहचानने में एक हद तक सफल रही है। ये और बात है उस समझ पर कवि के अपने सपाट और आदर्शवादी जीवन-दर्शन का आवरण सर्वत्र नज़र आ जाता है। छायावाद ने ज़रूर एक घना कुहासा उत्पन्न किया लेकिन उसे भेदने वाला सूर्य भी उसी के बीच से उगा और चमका। निराला को हम बीसवीं सदी का पहला प्रतिबद्ध जनकवि कहेंगे। उनकी कविता में इस देश की जनता अपने पूरे जीवट और संघर्ष के साथ मौजूद दिखती है। उसमें पराजय और अपमान है तो जूझने का अपार साहस भी – ठीक किसी ठेठ उत्तरभारतीय किसान की तरह। निराला के जीवन में विक्षिप्तता के बरसों को हम सीधे उस समय के उत्तर भारतीय जनमानस से जोड़कर देख सकते हैं। इसी दौर में उन्होंने अपने लोगों पर सबसे ज़्यादा कविताएँ लिखीं। उन भीषण जीवन स्थितियों में वे जैसे अपने ही जन का आईना हो जाते हैं। उनकी तैयार की हुई ज़मीन पर ही नागार्जुन, केदार, त्रिलोचन, मुक्तिबोध और शमशेर ने अपनी यात्राएँ कीं। यही बीसवीं सदी में हिन्दी की जनवादी कविता का आधारभूत ढाँचा है।

बाद के समय में धूमिल के आगमन ने जनवादी कविता में एक नया मुहावरा जोड़ा। जो विद्वान धूमिल के काव्य-मुहावरे को अकविता से जोड़ते हैं, वे सरासर गलत रास्ते पर हैं, फिर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वे कितने बड़े आलोचक या विचारक हैं। धूमिल का स्वर जन का स्वर है। उसमें यदि पुरुषवादी वर्चस्वता वगैरह दिखाई पड़ती है तो दरअसल उस जनमानस का हिस्सा है, जिसे धूमिल अपनी आवाज़ दे रहे थे। यहाँ बहुत कड़क अभिव्यक्ति मिलेगी। एक किसान ही जान सकता है कि ऊसर को जोतना कैसा होता है। धूमिल वही किसान थे। उनके साथ के लोगों में देखें तो कुमार विकल भाषा और अभिव्यक्ति में उनसे फ़र्क़ होते हुए भी उसी राह पर थे। नक्सलबाड़ी एक जनान्दोलन था और उसे आज के नक्सवादियों से जोड़कर देखना एक विचार को स्खलित होते हुए देखना है। इसमें हिंसा नहीं थी – प्रतिहिंसा थी, जिसके लिए नागार्जुन की यह घोषणा हमेशा प्रासंगिक रहेगी – `प्रतिहिंसा ही स्थायी भाव है अब मेरे कवि का!`

रघुवीर सहाय अपनी कविता में शहरी जन को लाए थे। उन्हें मैं जन के अर्थविस्तार का श्रेय देना चाहूँगा, चाहे वे एक अलहदा स्कूल के कवि रहे हों। यही बात सर्वेश्वर के लिए भी कही जायेगी। उसी दौर में केदारनाथ सिंह भी अभी बिल्कुल अभी के बाद ज़मीन पक रही है कि भावभूमि से दो-चार हो रहे थे। वे चुपचाप इसे रच रहे थे। लीलाधर जगूड़ी धूमिल के प्रभाव से निकलने की छटपटाहट में अपनी राह खोज रहे थे। चन्द्रकांत देवताले दरअसल आक्रोश के कवि थे और जनता के पक्ष में उसे सम्भालने और विवेकवान बनाने की कोशिश कर रहे थे, जिसका काफी सुघड़ और प्रभावशाली रूप उनकी बाद के सभी संग्रहों में दिखाई देता है।

70 के बाद प्रकाश में आयी समूची पीढ़ी ही मानो नक्सलबाड़ी की उपज थी। आलोक धन्वा का नाम इसमें सबसे पहले आयेगा। गोरख पाण्डेय भी साथ ही होंगे, लेकिन वे कविता में कुछ बड़ा और सार्थक करने से पहले ही नितान्त व्यक्तिगत और पतनशील कारणों से संसार छोड़ गए, जिसकी कोई जनपक्षीय व्याख्या सम्भव नहीं होगी। यह एक जनकवि और राजनैतिक कार्यकर्ता का पतनशील प्रस्थान था।

पाश पंजाबी में जितना थे, उससे कम हिन्दी में नहीं रहे होंगे। उन्हें हमने हमेशा हिन्दी का ही कवि माना है। पाश की कविताओं में पश्चिमी भारत की जद्दोजहद अपने पूरे तनाव के साथ थी। सबसे बड़ी बात यह कि यह सारे कवि सत्ता को चुनौती दे रहे थे। ये निडर थे और इसीलिए जनप्रिय भी। इस पूरे परिदृश्य में नागार्जुन सबसे पुराने होते हुए भी समान रूप से सक्रिय थे। नई पीढ़ी के जनवादी कवियों ने उनसे बहुत कुछ पाया और सहेजा भी, जिससे उनका स्नेह तो होना ही था। त्रिलोचन अपने साथ जन ही नहीं, पूरे जनपद को ले आए थे। शमशेर मजूरों पर कविता लिख रहे थे तो केदार बुन्देलखंड के श्रमशील और मुश्किल जीवन पर। दुख की बात थी मुक्तिबोध दुनिया छोड़ चुके थे लेकिन उनकी कविता अपना काम कर रही थी। उसमें भारतीय जन के जीवन की रोंगटे खड़े कर देने वाली तस्वीरें थीं, जो अपने विशिष्ट फंतासीपरक शिल्प के चलते दुगना प्रभाव उत्पन्न करती थीं।

यहाँ तक आते-आते ही एक बार मुड़कर देखें तो यह एक समृद्ध दुनिया थी। यह कविता जन का जितना सम्मान करती थी, उतना ही जन भी इसका सम्मान करत थे। बाद के समय में इसका क्षरण हुआ। कुछ समय के लिए दुष्यंत और अदम जनता की आवाज़ बने पर एक की वास्तविक और दूसरे की रचनात्मक मृत्यु हो जाने से ये उनकी आहटें आना बन्द हो गयीं। हालाँकि विष्णु खरे, वीरेन डंगवाल, मंगलेश डबराल, असद ज़ैदी, देवीप्रसाद मिश्र, राजेश जोशी, मनमोहन वगैरह कई बड़े कवि अब भी परिदृश्य पर मौजूद हैं। नई पीढ़ी में जनवाद की खोज फ़िलहाल मैं न ही करूँ तो बेहतर होगा, क्योंकि अब जन का अर्थ बदल रहा है और कवि का भी।
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एम. आर. आई.

17/12/2009

( अप्रैल 2006 में मुझ पर एक आफ़त आई और मैंने बदहवासी की हालत में ख़ुद को एम० आर० आई० मशीन में पाया। उस जलती – बुझती सुरंग में मेरे अचेतन जैसे मन में कई ख़याल आते रहे। उन्हें मैंने थोड़ा ठीक होने पर इस कविता में दर्ज़ किया और ये कविता हंस, जनवरी 2008  में प्रकाशित हुई। पता नहीं इसे पारम्परिक रूप में कविता कहा भी जाएगा या नहीं ? )

 
वहाँ कोई नहीं है
मैं भी नहीं
वह जो पड़ी है देह
हाथ बांधे
दांत भींचे
बाहर से निस्पन्द
भीतर से रह-रहकर सहमती
थूक निगलती
वह मेरी है
लेकिन वहाँ कोई नहीं है
 
तो फिर मैं कहाँ हूँ ?
क्या वहाँ, जहाँ से आ रही है
नलकूप खोदने वाली मशीन की आवाज़?
अफ़सोस
पानी भी दरअसल यहाँ नहीं है
रक्त है लेकिन बहुत सारा खुदबुदाता-खौलता

लाल रक्त कणिकाओं में सबसे ज़्यादा खलबली है
मेरे शरीर में सिर्फ वही हैं जो लोहे से बनी हैं

होते-होते बीच में अचानक थम जाती है खुदाई
शायद दम लेने और बीड़ी सुलगाने को रुकते हों मजदूर
ठक!
ठक!
ठक!
दरवाज़ा खटखटाता है कोई
मेरे भीतर

सबसे पहले एक खिड़की खुलती है
धीरे से झाँककर देखता हूँ
बाहर
कोई भी नहीं है

सृष्टि में मूलाधार से लेकर ब्रह्मचक्र तक
कोई हलचल नहीं है

मैं दूर ……….
बहुत दूर…
मालवा के मैदानों में भटक रहा हूँ कहीं
अपने हाथों में मेरा लुढ़कता सिर सम्भाले
दो बेहद कोमल
और कांपते हुए हाथ हैं
पुराने ज़माने के किसी घंटाघर से
पुकारती आती रात है

कच्चे धूल भरे रस्ते पर अब भी एक बैलगाड़ी है
तीसरी सहस्त्राब्दी की शुरूआत में भी
झाड़ियों से लटकते हैं
मेहनती
बुनकर
बयाओं के घोसले

तालों में धीरे-धीरे काँपता
सड़ता है
दुर्गन्धित जल

कोई घुग्घू रह-रहकर बोलता है
दूर तक फैले अन्धेरे में एक चिंगारी-सी फूटती है

वह हड़ीला चेहरा कौन है
इतने सन्नाटे में
जो अपनी कविताओं के पन्ने खोलता है

गूंजता है खेतों में
गेंहूँ की बालियों के पककर चटखने का
स्वरहीन
कोलाहल

तभी
न जाने कहाँ से चली आती है दोपहर
आंखों को चुंधियाती
अपार रोशनी में थ्रेशर से निकलते भूसे का
ग़ुबार-सा उमड़ता है

न जाने कैसे
पर
मेरे भीतर का भूगोल बदलता है

सुदूर उत्तर के पहाड़ों में कहीं
निर्जन में छुपे हुए धन-सा एक छलकता हुआ सोता है
पानी भर रही हैं कुछ औरतें
वहाँ
उनमें से एक का पति फ़ौज से छुट्टी पर आया है
नम्बर तोड़कर
सबसे पहले अपनी गागर लगाने को उद्धत
वही तो संसार की सुन्दरतम
स्वकीया
विकल हृदया है

मैं भी खड़ा हूँ वहीं
उसी दृश्य के आसपास आंखों से ओझल
मुझमें से आर-पार जाती हैं
तरंगे
मगर हवाओं का घुसना मना है

सोचता हूँ
अभी कुछ दिन पहले ही खिले थे बुरुंश यहाँ ढाढ़स बंधाते
सुर्ख़ रंगत वाले
सुगंध और रस से भरे
अब वो जगह कितनी ख़ाली है

इन ढेर सारी आख़िरी
अबूझ ध्वनियों
और बेहद अस्थिर ऋतुचक्रों के बीच
टूट गया है एक भ्रम

एक संशय
मगर अभी जारी है !
2007

टीकाराम पोखरियाल की वसन्तकथा

15/12/2009

उस दूरस्थ पहाड़ी इलाके में कँपकँपाती सर्दियों के बाद
आते वसन्त में खुलते थे स्कूल
जब धरती पर साफ सुनाई दे जाती थी
क़ुदरत के क़दमों की आवाज़
गाँव-गाँव से उमड़ते आते
संगी
साथी
यार
सुदीर्घ शीतावकाश से उकताए
अपनी उसी छोटी-सी व्यस्त दुनिया को तलाशते

9 किलोमीटर दूर से आता था टीकाराम पोखरियाल

आया जब इस बार तो हर बार से अलग उसकी आँखों में
जैसे पहली बार जागने का प्रकाश था

सत्रह की उमर में
अपनी असम्भव-सी तीस वर्षीया प्रेयसी के वैभव में डूबा-डूबा
वह किसी और ही लोक की कहानियाँ लेकर आया था
हमारे खेलकूद
और स्थानीय स्तर पर दादागिरी स्थापित करने के उन थोड़े से
अनमोल दिनों में

यह हमारे संसार में सपनों की आमद थी
हमारी दुबली-पतली देहों में उफनती दूसरी किसी ज़्यादा मजबूत और पकी हुई देह के
हमलावर सपनों की आमद
घेरकर सुनते उसे हम जैसे आपे में नहीं थे

उन्हीं दिनों हममें से ज़्यादातर ने पहली बार घुटवाई थी
अपनी वह पहली-पहली सुकोमल
भूरी रोयेंदार दाढ़ी

बारहवीं में पढ़ता
हमारा पूरा गिरोह अचानक ही कतराने लगा था
बड़े-बुज़ुर्गों के राह में मिल जाने से
जब एक बेलगाम छिछोरेपन
और ढेर सारी खिलखिलाहट के बीच
जबरदस्ती ओढ़नी पड़ जाती थी विद्यार्थीनुमा गम्भीरता

सबसे ज़्यादा उपेक्षित थीं तो हमारी कक्षा की वे दो अनमोल लड़कियाँ
जिनके हाथों से अचानक ही निकल गया था
हमारी लालसाओं का वह ककड़ी-सा कच्चा आलम्बन
जिसके सहारे वे आतीं थीं हर रोज़
अपनी नई-नई खूबसूरत दुनिया पर सान चढ़ातीं

अब हमें उनमें कोई दिलचस्पी नहीं थी
टीका हमें दूसरी ही राह दिखाता था जो ज़्यादा प्रशस्त
और रोमांच से भरी थी
हम आकुल थे जानने को उस स्त्री के बारे में जो दिव्य थी
दुनियावी तिलिस्म से भरी
बहुत खुली हुई लगभग नग्न भाषा में भी रह जाता था
जिसके बारे में कुछ न कुछ अनबूझा – अनजाना

टीका के जीवन में पहली बार आया था वसन्त इतने सारे फूलों के साथ
और हम सब भी सुन सकते थे उसके इस आगमन की
उन्मादित पदचाप

लेकिन
अपने पूरे उभार तक आकर भी आने वाले मौसमों के लिए
धरती की भीतरी परतों में कुछ न कुछ सहेजकर
एक दिन उतर ही जाता है वसन्त

उस बरस भी वह उतरा
हमारे आगे एक नया आकाश खोलते हुए
जिसमें तैरते रुई जैसे सम्मोहक बादलों के पार
हमारे जीवन का सूर्य अपनी पूरी आग के साथ तमतमाता था
अब हमें उन्हीं धूप भरी राहों पर जाना था

टीका भी गया एक दिन ऐसे ही
उस उतरते वसन्त में
लैंसडाउन छावनी की भरती में अपनी क़िस्मत आजमाने
कड़क पहाड़ी हाथ-पाँव वाला वह नौजवान
लौटा एक अजीब-सी अपरिचित प्रौढ़ मुस्कान के साथ
हम सबमें सबसे पहले उसी ने विदा ली

उसकी वह वसन्तकथा मँडरायी कुछ समय तक
बाद के मौसमों पर भी
किसी रहस्यमय साए -सी फिर धूमिल होती गई
हम सोचने लगे
फिर से उन्हीं दो लड़कियों के बारे में
और सच कहें तो अब हमारे पास उतना भी वक़्त नहीं था
हम दाख़िल हो रहे थे एक के बाद एक
अपने जीवन की निजता में
छूट रहे थे हमारे गाँव
आगे की पढ़ाई-लिखाई के वास्ते हमें दूर-दूर तक जाना था
और कई तो टीका की ही तरह
फ़ौज में जाने को आतुर थे
यों हम दूर होते गए
आपस में खोज-ख़बर लेना भी धीरे-धीरे कम होता गया
अपने जीवन में पन्द्रह साल और जुड़ जाने के बाद
आज सोचता हूँ मैं
कि उस वसन्तकथा में हमने जो जाना वह तो हमारा पक्ष था
दरअसल वही तो हम जानना चाहते थे
उस समय और उस उमर में

हमने कभी नहीं जाना उस औरत का पक्ष जो हमारे लिए
एक नया संसार बनकर आयी थी

क्या टीकाराम पोखरियाल की वसन्तकथा का
कोई समानान्तर पक्ष भी था ?

उस औरत के वसन्त को किसने देखा ?
क्या वह कभी आया भी
उस परित्यक्ता के जीवन में
जो कुलटा कहलाती लौट आयी थी
अपने पुंसत्वहीन पति के घर से
देह की खोज में लगे बटमारों और घाघ कोतवालों से
किसी तरह बचते हुए उसने
खुद को
एक अनुभवहीन साफदिल किशोर के आगे
समर्पित किया

क्या टीका सचमुच उसके जीवन में पहला वसन्त था
जो टिक सका बस कुछ ही देर
पहाड़ी ढलानों पर लगातार फिसलते पाँवों-सा ?

पन्द्रह बरस बाद अभी गाँव जाने पर
जाना मैंने कि टीका ने बसाया हम सबकी ही तरह
अपना घरबार
बच्चे हुए चार
दो मर गए प्रसूति के दौरान
बचे हुए दो दस और बारह के हैं
कुछ ही समय में वह लौट आयेगा
पेंशन पर
फ़ौज में अपनी तयशुदा न्यूनतम सेवा के बाद
कहलायेगा
रिटायर्ड सूबेदार

वह स्त्री भी बाद तक रही टीका के गाँव में
कुछ साल उसने भी उसका बसता घरबार देखा
फिर चली गई दिल्ली
गाँव की किसी नवविवाहिता नौकरीपेशा वधू के साथ
चौका-बरतन-कपड़े निबटाने
उसका बसता घरबार निभाने

यह क्या कर रहा हूँ मैं ?
अपराध है भंग करना उस परम गोपनीयता को
जिसकी कसम टीका ने हम सबसे उस कथा को कहने से पहले ली थी
उससे भी ली थी उसकी प्रेयसी ने पर वह निभा नहीं पाया
और न मैं

इस नई सहस्त्राब्दी और नए समय के पतझड़ में करता हूँ याद
पन्द्रह बरस पुराना जीवन की पहली हरी कोंपलों वाला
वह छोटा-सा वसन्तकाल
जिसमें उतना ही छोटा वह सहजीवन टीका और उसकी दुस्साहसी प्रेयसी का
आपस में बाँटता कुछ दुर्लभ और आदिम पल
उसी प्रेम के
जिसके बारे में अभी पढ़ा अपने प्रिय कवि वीरेन डंगवाल का
यह कथन कि “वह तुझे खुश और तबाह करेगा! “

स्मृतियों के कोलाहल में घिरा लगभग बुदबुदाते हुए
मैं बस इतना ही कहूँगा
बड़े भाई !
जीवन अगर फला तो इसी तबाही के बीच ही कहीं फलेगा !
***

2006