स्पष्ट राजनीतिक चेतना की कविताएँ

(यह समीक्षा दैनिक जागरण के पुनर्नवा के लिए लिखी गई थी और जाहिर है इसकी कई सीमाएं भी हैं. अख़बार आपको कम लिखने को कहता है. मैं सोचता हूँ कभी पंकज की कविता पर एक लम्बा लेख लिखूंगा.)

बहुत कम उम्र (सबसे कम?) में युवा-कविता का प्रतिष्ठित भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार प्राप्त करने वाले पंकज चतुर्वेदी ने पिछले कुछ समय में बहुत तेज़ी से एक युवा और सिद्धहस्त आलोचक के रूप में अपनी पहचान बनाई है। उन्हें `सिर्फ आलोचना` के लिए दिए जाने वाले देवीशंकर अवस्थी सम्मान से भी नवाज़ा गया है। पहल के पन्नों में हिन्दी के महत्वपूर्ण कवियों पर जमकर लिखते हुए उन्होंने अपनी प्रतिभा के साक्ष्य प्रस्तुत किए है। युवा पीढ़ी में उन्होंने वागर्थ की अपनी टिप्पणियों से एक अद्भुत आत्मीयता अर्जित है। `चुका हुआ कवि आलोचक बन जाता है` – यह बीती बात हो चुकी है। हमारे समय के राजेश जोशी, अरूण कमल, चन्द्रकांत देवताले, विष्णु नागर जैसे कवियों ने बहुत समर्थ आलोचना लिखी है, यह अलग बात है कि वे अपने लिखे को अत्यन्त विनम्रता से महज एक कवि का लेखा मानते हैं। पंकज ने इस परम्परा को समृद्ध करते हुए इस संकोच को भी तोड़ा है। वे अब खुलेआम आलोचक हैं। लेकिन इन सब बातों से परे मूल और मुख्य बात यह है कि पंकज प्रथमत: और शायद अन्तत: भी, एक कवि हैं। यही उनके भीतर की दुनिया है।

पंकज की कविता पर बात करने से पहले आलोचना पर इतना कुछ कहना दरअसल ज़रूरी है। यह देखना अत्यन्त रोचक है कि आलोचना में पंकज ने बहुत खुले तौर पर काव्यभाषा का इस्तेमाल किया है। चाहे वे पहल के पन्ने हों या वागर्थ के, पंकज की भाषा हर जगह आलोचक से अधिक एक भावुक हृदय और मानवीय संवेदना से संचालित कवि की भाषा है। और इसी बात को उनके नये कविता संकलन `एक ही चेहरा` के सन्दर्भ में देखें तो पायेंगे कि आलोचना लिखने का एक स्पष्ट लेकिन अत्यन्त काव्यात्मक प्रभाव उनकी काव्यदृष्टि पर पड़ा है। जैसा कि ब्लर्ब में असद जैदी ने उल्लेख भी किया है कि पंकज की कविताओं का गद्य बहुत सावधान और सतर्क गद्य है। काव्यभाषा में गद्य और पद्य की बहस अब पुरानी हो चुकी है। कविता में गद्य सिर्फ विचारशीलता या विवेक का औज़ार नहीं रह गया है, वह कविता का अपना औज़ार भी है। हिन्दी में इस बात पर कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है लेकिन हिन्दी से बाहर की कविता को पढ़ने-गुनने वाले शायद ही इससे इनकार कर पायें। पंकज की काव्यभाषा गद्य का बखूबी इस्तेमाल करते हुए भी खुद गद्यात्मक बनने से बची है, यह कौशल कम बड़ा नहीं है।

पंकज के पहले संकलन की कविताएँ मुख्यत: प्रेमकविताएँ थीं, जिन पर उनके नौउम्र होने की स्पष्ट छाप थी। देखना चाहिए कि उस दौर में भी उनकी ये कविताएँ देहधर्म के पार जाती थीं। उनके भीतर कोई तहख़ाना नहीं, बल्कि एक छुपा हुआ आलोक था जिसमें सतत् लेकिन निष्फल प्रेम की कई परतें दिखाई पड़ती थीं। इधर पंकज का भावलोक और भी समृद्ध हुआ है और वे प्रेम के साथ-साथ घर के बारे में भी सोचते हुए यह मानने लगे हैं कि

जो एक घेरा प्रदान करता हो
किसी आक्रामक अर्थ में नहीं
बल्कि बाँध लेने के
बहुत आत्मीय अर्थ में
वही घर है`

और यह भी कि

स्मारक उचित नहीं होते
और स्मारकों से अधिक महत्वपूर्ण है जीवन।

यह भावुकता से बाहर आना नहीं बल्कि उसके भीतर को बाहर लाना है। इसी भीतर को बाहर लाने की एक छोटी लेकिन बेहतरीन कविता है `इच्छा` –

मैंने तुम्हें देखा
और उसी क्षण
तुमसे बातें करने की बड़ी इच्छा हुई
फिर यह सम्भव नहीं हुआ
फिर याद आया
कि यह तो याद ही नहीं रहा था
कि हमारे समय में
इच्छाओं का बुरा हाल है।

यह देखना भी अत्यन्त सुखद है कि दुनियावी वास्तविकताओं की इस अच्छी और व्यावहारिक समझ को पंकज ने अपने ऊपर इतना भी हावी नहीं होने दिया है कि वे `तुम मुझे मिलीं` जैसी कविता लिखने से चूक जाते। पंकज के लिए प्रेम लगभग हर कहीं है। वे उसे कोलाहल और भीड़ में भी साकार होता पाते हैं। डबडबाए दृश्य में प्रेयसी के और भी सुन्दर दिखने का भावात्मक संकल्प हमें रोकता है। कई बार कही गई इस एक बात को पंकज अपने अन्दाज़ कुछ ऐसे कहते हैं कि वह अभी कही हुई-सी लगती है –

वह जो तुम्हारे लिए
सपने नहीं देखता
उसके पहलू में तुम
चैन से सो नहीं सकते।

हिन्दी में उसने कहा था को प्रेम और काल के सम्बन्ध का सर्वाधिक सम्मोहक आख्यान माना गया है। `उसने क्या कहा था` शीर्षक कविता में पंकज इस कहानी की उस छुपी हुई मार्मिकता को भी उद्घाटित करते हैं, जिसकी ओर किसी आलोचक या व्याख्याकार का कभी ध्यान नहीं गया –

मगर कहानी में न सही
कहानी के बाहर भी आज तक
तुमसे किसी ने नहीं जानना चाहा
न तुम्हारी प्रेयसी ने ही पूछा
तुम्हारी किससे हुई थी कुड़माई- तुम्हारे बेटे की माँ
वह जीवित थी या मृत…..कैसा था जीवन तुम्हारा
कैसा था उसमें प्यार का रंग …… तुम्हारे बलिदानों के नेपथ्य में
तुम्हारे जितना ही मरती है वह स्त्री-
हालाँकि उसे न कोई देखता है न सुनता है
न किसी को पता है
जो उसने कहा था।

पंकज पेशे से हिन्दी के प्राध्यापक हैं लेकिन उनकी इस प्राध्यापकतेर दृष्टि का भी लाभ उनके छात्रों को मिलता होगा….. या शायद नहीं क्योंकि –

…….. मैं उन छात्रों से मिलता हूँ
जो कुछ जानना नहीं चाहते
जिनमें कुछ जानने की ख़ुशी
या सिहरन नहीं है`।

पंकज के इस संकलन में हमारे समय के कई समर्थ कवियों/लेखकों से उनका संवाद दर्ज़ है। इस संवाद की सार्थकता पर बात करने से पहले इस सफलता को देख लेना भी ज़रूरी है कि पंकज संवाद तो करते हैं लेकिन किसी भी स्तर पर इन कवियों की कविताई के असर में नहीं दिखते। कहीं-कहीं लगता है कि `एक कवि`, `प्रख्यात कवि`, `मशहूर कवि` या `बड़े कवि` के स्थान पर कवियों के नाम दर्ज़ होते तो यह संवाद अधिक खुला और आत्मीय होता, लेकिन इतना संकोच शायद पंकज के व्यक्तिगत स्वभाव में है। यह संकोच `जबलपुर में क्या है` शीर्षक कविता में ज़रूर टूटा है, लेकिन यह कविता कुछ ब्यौरों की माँग करती दीखती है – इसे कुछ और लम्बा होना चाहिए था, अधिक विवरणपूर्ण।

पंकज के पहले और इस दूसरे संकलन के बीच एक सुखद बदलाव जो साफ दिखाई देता है, वह राजनीतिक पक्षधरता और पहचान के अधिक मुखर हो जाने का है। अत्यन्त ख़ुशी की बात है कि पंकज राजनीतिक मोर्चे पर लगभग अमूर्तता की स्थिति से गुज़र रही युवा कविता के एक ऐसे पार्टनर हैं, जिनकी पालिटिक्स बहुत मूर्त्त या स्पष्ट है। इस पालिटिक्स को आप `देश नहीं चिड़िया` शीर्षक कविता की इन लगभग सपाट लेकिन अर्थपूर्ण पंक्तियों में पायेंगे-

मैंने उनसे अनुरोध किया : फ़ैजाबाद से अयोध्या तक
एक जुलूस निकालना है
और माँग करनी है
कि विवादित रामजन्मभूमि परिसर में
अठारह सौ सत्तावन के शहीदों का
राष्ट्रीय स्मारक बनवाया जाय
आप भी इसमें हमारा साथ दीजिए
साम्प्रदायिकता और साम्राज्यवाद की
दुरभिसन्धि का
यही सच्चा प्रतिकार हो सकता है।

कविता के शिल्प से समझौता करके भी राजनीतिक पक्षधरता को सामने रखने का यह संकल्प मूल्यवान है। इसे राजनीति नहीं, कविता की बढ़ती ताकत का प्रमाण माना जायेगा। वरिष्ठ कवियों में कुछ नाम इस संकल्प का परिचय अकसर देते रहे हैं, लेकिन काव्य के खो जाने के भय से भ्रमित हमारी स्थापित युवाकविता में क्या यह दुर्लभ नहीं है… अखंड-मानसपाठ और मंगल-अमंगल भवन भी राजनीति की कविताएँ हैं और यह एक ठेठ राजनीतिक टिप्पणी कि

सबेरे यह बच रहा एहसास
किस विकट बेसुरेपन से
गाए गए तुलसीदास

यही राजनीति `हिन्दी विभागाध्यक्ष` जैसी कविता तक जाती है, जिसे एक विभागाध्यक्ष की तस्वीर भर मान लेना काफी नहीं है। इस समय इस कविता का सच्चा विस्तार और सबूत मध्य प्रदेश में मिलता है, जहाँ विभागाध्यक्ष ही नहीं, अधिकांश प्राचार्य और कुलपति तक इसी `एक ही चेहरे` में समाए दीखते हैं। लोगों का ऐसा होना और ऐसे पदों पर होना भी दरअसल एक राजनीतिक दुश्चक्र ही है। शिक्षा विभाग एक आसान लेकिन सबसे महत्वपूर्ण निशाना है, जहाँ से बहुत सारी चीज़ें बदली और संचालित की जा सकती हैं। हमें यह मानना पड़ेगा कि तुलसी को विकट बेसुरेपन से गाने वाले भी कोई चूके हुए चौहान नहीं हैं। विद्या और संस्कार की यह भारती भारत में बहुत गहरे तक घर बना चुकी है, जबकि देश की प्रगतिशील ताकतों ने अब तक शायद इसे महज बच्चों का ही खेल समझा है।

जिस निम्नमध्यवर्गीय जीवन का हम हिस्सा हैं, उसके पेचो-ख़म को पंकज खूब जानते हैं। पंकज की कविता इस जीवन के जिन ब्यौरों जाती है, वह अब तक कहानी-उपन्यास के अलावा उदयप्रकाश की कुछ शुरूआती कविताओं में ही दिखते थे। तूफान, ह.च.रा., हिन्दी, दिल्ली-प्रसंग, नमस्ते से बरजिए, एक महाविद्यालय से, लिफ्ट का संस्मरण, देवी चबूतरा, वजह आदि ऐसी कविताएँ हैं, जो कविता से अधिक कुछ कहती हैं। इन कविताओं में जीवन भी उसी भाषा की तरह है, जिसके बारे में उन्हीं की कविता का एक बुजुर्ग मुलाजिम अपने साहब से कहता है –

यह हिन्दी है हुजूर
इससे निहुरकर मिलना चाहिए।`

इस संकलन से गुज़रने के बाद पंकज से कुछ शिकायतें भी हैं। पहली और बड़ी शिकायत यह कि वे आलोचकों को अपनी कविता में ज़रूरत से ज़्यादा तूल देते हैं। पुरस्कार और आलोचक जैसी कविताएँ अपने व्यंग्यात्मक लहजे और उद्देश्य के बावजूद निरर्थक ही लगती हैं। इसी तरह `राष्ट्रपति जी` वैचारिक रूप से एक बेहद सपाट कविता है और कोरा राजनीतिक बयान-सी लगती है, हालाँकि कविता का शिल्प यहाँ ज़्यादा सुरक्षित है। पंकज की एक कविता `निरावरण वह` बहुत आश्चर्यजनक रूप से अशोक वाजपेयी की याद दिलाती है। बावजूद इन शिकायतों के पंकज की कविताओं में `कुछ` नहीं, बल्कि `कई चीज़ें अब भी अच्छी हैं` जो उनकी एक बहुत अच्छी कविता का शीर्षक भी है। अंत में उन्हीं के प्रिय कवि वीरेन डंगवाल के शब्दों में कहें तो

इच्छाएँ आती हैं तरह-तरह के बाने धरे
उनके पास मेरी हर ज़रूरत दर्ज़ है
एक फेहरिस्त में मेरी हर कमज़ोरी
उन्हें यह तक मालूम है
कि कब मैं चुप होकर गरदन लटका लूँगा
मगर फिर भी मैं जाता रहूँगा ही
हर बार भाषा को रस्से की तरह थामे
साथियों के रास्ते पर
…. एक कवि और कर ही क्या सकता है
सही बने रहने की कोशिश के सिवा।´

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