जनवरी 2010 के लिए पुरालेख

“नींद की गोली” और एक खुफ़िया “एकालाप”

18/01/2010

दो कविताएँ

नींद की गोली

न जाने किस पदार्थ
किस रसायन
और किस विश्वास के साथ बनी है ये
कि इसे खाने पर
कुछ ही देर बाद
सफ़ेद जलहीन बादलों की तरह झूटा दिलासा लिए
तैरती आती है नींद

लेकिन जारी रहता है दुनिया का सुनाई पड़ना
आसपास होती हरक़तों का महसूस होना जारी रहता है

वह शायद नींद नहीं
नींद का विचार होता है
जो आता है
बरसों-बरस पीछा करता हुआ जीवन के पहले
चलचित्र की तरह
गुज़रे वक़्तों के श्वेत-श्याम दृश्यों
चरित्रों
और ग़ुबार से भरा

मेरे नन्हे बेटे के हाथ मुझे टटोलते हैं
वह पुकारता है पूरी ताक़त से
मेरी इस उचाट नींद में अपना मुंह डाल
पर मैं उसे जवाब नहीं दे पाता
मेरे चेहरे पर जमने लगती है
उसके होने की
बेहद सुखद
गुनगुनी
और नमकीन भाप

राह चलते
मुझे बुलाता है कोई
बार-बार
वह मेरी पत्नी है शायद
खड़ी
शादी से पहले की बारह बरस पुरानी एक सड़क पर
और हमारे बीच से
गुज़रती जाती है गाड़ियां
बेशुमार

मैं उस ओर अपने क़दम उठाना चाहता हूँ
पर उठा नहीं पाता
मैं हाथ हिलाना और जताना चाहता हूँ
अपना वजूद
खड़ा
बारह बरस बाद की वैसी ही एक दूसरी सड़क पर
इस पार
पर जता नहीं पाता

ये कैसी दवा है कमबख़्त
नींद की
कि मैं जगाना चाहता हूँ मुझे
तो जगा नहीं पाता

सो भी नहीं पाता
मगर
बन्द पलकों के नीचे इतनी हलचलों से भरी
अपनी ईजाद की हुई ये
सबसे नई
जागती हुई नींद!
2007
***

एकालाप

तुम भूलने लगे हो
कि कितने लोगों चीज़ों और हलचलों से भरी है दुनिया
उम्र अभी चौंतीस ही है तुम्हारी
बावजूद इसके तुम व्यस्त रहने लगे हो अक्सर
किसी खुफ़िया एकालाप में

लगता है तुम दुनिया में नहीं
किसी रंगमंच पर हो
और कुछ ही देर में शुरू होने वाला है तुम्हारा अभिनय
जिसमें कोई दूसरा पात्र नहीं है
और न ही ज़्यादा संवाद

पता नहीं अपनी उस विशिष्ट अकुलाहट भरी भारी भरभराती आवाज़ में
त्रासदी अदा करोगे तुम या करोगे कोई प्रहसन

तुम्हारे भीतर एक जाल है
धमनियों और शिराओं का
और वे भी अब भूलने लगी हैं तुम्हारे दिमाग तक रक्त पहुंचाना
इसलिए तुम कभी बेहद उत्तेजित
तो कभी गहरे अवसाद में रहते हो

तुम भूल गए हो कि कितना वेतन मिलता है तुम्हें
और उसके बदले कितना किया जाना चाहिए काम

तुम्हें लगता है वापस लौट गए हो
बारह बरस पहले की अपनी उसी गर्म और उमस भरी उर्वर दुनिया में
जहाँ कभी इस छोर से उस छोर तक
नौकरी खोजते भटका करते थे तुम

सपने में दिखती छायाओं -से
अब तुम्हें दिखने लगे हैं अपने जन
किसी तरह रोटी कमाते
काम पर जाते
भीतर ही भीतर रोते- सुलगते
किसी बड़े समर की तैयारी में जीवन की कई छोटी-छोटी लड़ाईयां हार जाते
वे अपने जन जिनसे
तुम दूर होते जा रहे थे
लफ्ज़-दर-लफ्ज़

कहो कैसे हो शिरीष अब तो कहो ?
जबकि भूला हुआ है वह सभी कुछ जिसे तुम भूल जाना चाहते थे
अपने होशो -हवास में

अब अगर तुम अपने भीतर के द्वार खटखटाओ
तो तुम्हें सुनाई देगी
सबसे बुरे समय की मुसलसल पास आती पदचाप

अब तुम्हारा बोलना
कहीं ज़्यादा अर्थपूर्ण और
मंतव्यों भरा होगा !
2007

***

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टामस ट्रांसट्रोमर (तोमास त्रांसत्रोमर)-शंघाई की सड़कें

10/01/2010

1950 के बाद से टामस ट्रांसट्रोमर (तोमास त्रांसत्रोमर) लगातार स्वीडिश कविता का सबसे महत्वपूर्ण चेहरा बने हुए हैं। आधुनिक स्वीडिश कविता का कोई भी जिक्र उनके बिना अधूरा होगा। नोबेल के इस देश में उनका नाम पिछले पांच दशकों से अधिक समय से न सिर्फ कवि-अनुवादक, बल्कि एक मनोविज्ञानी के रूप में भी एक स्थापित और चर्चित नाम है।

शंघाई की सड़कें

एक

पार्क में
कई लोग ध्यान से देख रहे हैं
सफेद तितलियों को
मुझे वह तितली बहुत पसन्द है
जो खुद ही जैसे सत्य का फड़फड़ाता हुआ
कोना है कोई

सूरज के उगते ही
दौड़ती-भागती भीड़ हमारे इस खामोश ग्रह को
गतिमान बना देती है
और तब पार्क भर जाता है
लोगों से

हर आदमी के पास आठ-आठ चेहरे होते हैं
नगों-से चमचमाते
गलतियों से बचने के वास्ते
हर आदमी पास एक अदृश्य चेहरा भी होता है
जो जताता है –
” कुछ है जिसके बारे में आप बात नहीं करते!”

कुछ जो थकान के क्षणों में प्रकट होता है
और इतना तीखा है
जैसे किसी जानदार शराब का एक घूंट
उसके बाद में महसूस होने वाले
स्वाद की तरह

तालाब में हमेशा हिलती-डुलती रहती हैं मछलियां
सोते में भी तैरती वे
आस्थावान होने के लिए एक मिसाल हैं -हमेशा गतिवान

***

दो

अब यह दोपहर है
सलेटी समुद्री हवा धुलते हुए कपड़ों-सी
फड़फड़ाती है
उन साइकिल सवारों के ऊपर
जो चले आते हैं
एक दूसरे से चिपके हुए
एक समूह में
किनारे की खाइयों से बेखबर

मैं घिरा हुआ हूं किताबी चरित्रों से
लेकिन
उन्हें अभिव्यक्त नहीं कर सकता
निरा अनपढ़ हूं मैं

और
जैसी कि उम्मीद की गई मुझसे
मैंने कीमतें चुकाई हैं
और मेरे पास हर चीज की रसीद है
जमा हो चुकी हैं
पढ़ी न जा सकने वाली ऐसी कई रसीदें
-अब मैं एक पुराना पेड़ हूं इन्हीं मुरझाई पत्तियों वाला
जो बस लटकती रहती हैं
मेरे शरीर से
धरती पर गिर नहीं पातीं

समुद्री हवाओं के तेज झोंके
इनमें सीटिया बजाते हैं।

***

तीन

सूरज के डूबते ही
दौड़ती-भागती भीड़ हमारे इस खामोश ग्रह को
गतिमान बना देती है

हम सब
सड़क के इस मंच पर खड़े हुए
कलाकार हैं जैसे

यह भरी हुई है लोगों से
किसी छोटी नाव के
डेक की तरह
हम कहां जा रहे हैं?
क्या वहां चाय के इतने कप हैं?
हम खुद को सौभाग्यशाली मान सकते हैं
कि हम समय पर पहुंच गए हैं
इस सड़क पर

क्लास्ट्रोफोबिया* की पैदाइश को तो अभी
हजार साल बाकी है !

यहां
हर चलते हुए आदमी के पीछे
एक सलीब मंडराती है
जो हमें पकड़ना चाहती है
हमारे बीच से गुज़रना
हमारे साथ आना चाहती है

कोई बदनीयत चीज़
जो हमारे पीछे से हम पर झपटना
और कहना चाहती है -बूझो तो कौन?

हम लोग
ज्यादातर खुश ही दिखाई देते हैं
बाहर की धूप में
जबकि हम अपने घावों से रिसते खून के कारण
मर जाने वाले हैं

हम इस बारे में
कुछ भी नहीं जानते!

अनुवाद – शिरीष कुमार मौर्य

____________

*चिकित्सा विज्ञान के अनुसार किसी बंद या संकरी जगह में होने का एक असामान्य भय.

यरूशलम से समुद्र तक और वापसी – येहूदा आमीखाई

05/01/2010

मेरा किया हुआ यह अनुवाद अशोक पांडे और उससे दोस्ती के उन विरल दिनों के लिए, जब उसने मुझे येहूदा आमीखाई जैसे कवि से परिचित कराया और उसे अनुवाद करने के लिए उकसाया। ऐसे दिनों का संस्मरण हमेशा बाक़ी रहता है। आमीखाई की इन कविताओं के बीहड़ में भटकना मुझे आज भी बहुत अच्छा लगता है और हमेशा लगता रहेगा।

यरूशलम से समुद्र तक और वापसी

1. बंद यरूशलम से

मैं गया
बंद यरूशलम से खुले समुद्र की तरफ़
मानो किसी वसीयत के खुलने की तरफ़
मैं गया पुरानी सड़क पर
रामल्ला से कुछ पहले
सड़क के किनारे अभी तक खड़े हैं
ऊंचे-ऊंचे अजीब-से विमानघर
विश्वयुद्ध में आधे तबाह
वहां वे विमानों के इंजनों की जांच किया करते थे
जिनका शोर चुप करा देता था सारी दुनिया को

महज उड़ने भर को उड़ना कोई छुपा ख़ज़ाना हो गया था तब
मेरे पूरे जीवन के लिए!

 

2.आत्मा

मैं यात्रा करता हूं
यात्राएं दुनिया की आत्मा हैं
वे बची रहती हैं हमेशा

यह बहुत आसान है –
बढ़ते हुए पेड़ों और घास से भरा ण्क पहाड़ी ढलान
और दूसरी तरफ़
एक सूखा पहाड़ी ढलान ग़र्म हवाओं से झुलसा हुआ
– मैं इनके बीच यात्रा करता हूं

धूप और बरसात का आसान-सा तर्क
वरदान और अभिशाप
न्याय और अन्याय
– मैं इनके बीच यात्रा करता हूं

आकाश की हवा और धरती की हवा
मेरे खिलाफ़ की और मेरे साथ की हवा
ग़र्म और ठंडा प्रेम
पक्षियों के प्रवास की तरह

– करो,
यात्रा करो, मेरी कार !

 

3.मृत्यु से बहुत दूर नहीं

लाटरून में
पहाड़ पर की मृत्यु और इमारतों की ख़ामोशी से बहुत दूर नहीं –
एक औरत खड़ी होती है
सड़क के किनारे

उसके ठीक बाद
एक नई चमचमाती कार
किसी सुरक्षित स्थान तक खींच लिए जाने की प्रतीक्षा में

औरत बहुत सुंदर है
उसका चेहरा, उसका आत्मविश्वास और उन्माद
उसकी पोशाक एक प्रेम-पताका है

एक बहुत कामुक औरत
जिसके भीतर खड़े रहते हैं उसके मृत पिता
एक ख़ामोश आत्मा की तरह

मैं उन्हें जानता था जब वे जीवित थे
जब उनसे आगे निकला
मैंने उन्हें अपनी शुभकामनाएं दीं !

 

4.एक पुराना बस-स्टॉप

मैं गुज़रा एक पुराने बस-स्टॉप से
जहां मैं खड़ा होता था कई बरस पहले
किसी दूसरी जगह जाने के लिए
बस के इंतज़ार में

वहां मैं खड़ा होता था
संभलता हुआ नुक़सान से पहले
और ठीक होता हुआ दर्द से पहले
मृत्यु से पहले ही पुनर्जीवित
और
प्रेम से भरा अलगाव से पहले

यहां मैं खड़ा होता था
नारंगी के झुरमुटों में फूलों के खिलने की सुगंध
इस एक ही दिन
आने वाले तमाम दिनों के लिए मदहोश कर देती थी मुझे

बस-स्टॉप अब भी वहां है
ईश्वर को अब भी पुकारा जाता है `जगह´
और मैं कभी -कभी उसे कहता हूं `समय´

5.सूरजमुखी के खेत

सूरजमुखी के खेत
पकते और सूखते हुए भूरे और तरतीब वाले
अब सूरज को नहीं
मीठी छांव को तलाशते हैं
एक आंतरिक मृत्यु
एक दराज़ का भीतरी भाग
एक थैला गहरा जैसे आकाश
उनका आने वाला संसार
एक घर का अंधेरा
एक आदमी का अंतर्तम !

 

6.मैं समुद्र-तट पर

मैं समुद्र पर
कई-कई रंगों वाली पालदार नावें
तैरती हैं पानी पर
उनके ठीक बाद मैं –
एक छोटे डेक वाली भद्दी-बेढंगी
तेल ढोने वाली नाव !
मेरा शरीर भारी और सिर छोटा है
सोचता या न सोचता हुआ

रेत पर मैंने देखा एक लड़की को
एक बड़े तौलिए के नीचे लोगों के बीच कपड़े बदलना सीखते हुए
क्या ही अद्भुत उसके शरीर का वह नाच
कैसी वह छुपी हुई सर्पीली तत्परता
कैसा वह संघर्ष पहनने और उतारने के बीच
जैकब और उसके फ़रिश्ते के बीच
प्रेमी और प्रेमिका के बीच

किसी मूर्ति के अनावरण की तरह
उसके बदन से तौलिया गिर जाता है
लड़की जीत जाती है
वह हंसती है
वह इंतज़ार करती है
और शायद वे इंतज़ार करते हैं उसका
किसी आंसुओं भरी जगह पर
वह मुझसे ज़्यादा ख़ूबसूरत और जवान है
पर उससे अधिक भविष्य जानता हूं मैं !

 

7.और मैं लौटता हूं

और मैं यरूशलम लौटता हूं
मैं बैठता हूं अपनी सीट पर
लेकिन मेरी आत्मा खड़ी रहती है मेरे भीतर
जैसे कि किसी सामूहिक प्रार्थना-सभा में
करो, यात्रा करो, मेरी कार !

एक छोटे पहाड़ पर सड़क के किनारे
जो टैंक खड़े रहते थे
वे अब नहीं हैं
अब वहां कारोब* के पेड़ हैं
सूरज ढलते वक़्त एक नर कारोब और एक मादा कारोब
उस दूसरे संसार में
जो और कुछ नहीं बस निरा प्यार है
हवा में उनकी पत्तियों की झंकार है
मानो पवित्र वाद्ययंत्रों की झंकार तोलती हुई अतुलता को

और वह छाया
जो अभी नमूदार होगी और कहलाएगी रात
और हम
जो पुकारे जायेंगे हमारे पूरे नामों से
जिनसे पुकारा जाता है सिर्फ़ मृत्यु के समय
`दोबारा कभी नहीं´ वाली रात फिर आयेगी

मैं लौटता हूं
यरूशलम में अपने घर की तरफ़

और हमारे नाम !
– वे तो खो जायेंगे इन्हीं पहाड़ों में
खोजियों के मुख से निकली
पुकारों की तरह !
***
* इज़रायल में पाया जाने वाला एक पेड़.
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इस श्रृंखला के सभी अनुवाद विख्यात अनुवादक अशोक पांडे के सानिध्य में संवाद प्रकाशन से छपी पुस्तक “धरती जानती है” के रूप में प्रकाशित.

पहाड़

01/01/2010

मैं जब भी
उनके बारे में सोचता हूँ
चले आते हैं
एक के बाद एक
छोटे-बड़े
कई सारे पहाड़
और खड़े हो जाते हैं
मेरी देह और आत्मा के
अँधेरे सूंसाट में

मेरे भीतर
देर तक वे खड़े रहते हैं
चुपचाप
मैं उन्हें देखता हूँ
और
मेरी चढ़ाई चढ़ती सांसों के
उत्तप्त वलय
उनसे मिलते हैं

वे थोड़ा सा हिलते हैं और हो जाते हैं
ख़ामोश
उन्हीं पर खड़े हो कर
कभी कभार
मैं अपने आसपास पुकार दिया करता हूँ
मेरी ज़िन्दगी में शामिल
कोई नाम

मैं चाहता हूँ
मेरे भीतर बढ़ता रहे
उनका क़द
उर्वर होते रहे
उनके ढलान
जंगल घने और ज़मीन
ठोस होती रहे

उनकी चट्टानें
पकती रहें मेरे रक्त की
आंच में

मैं सोचता हूँ
तो मेरे अतीत का
और मेरे भविष्य का
एक एक
दिन बोलता है

मैं बदल जाना चाहता हूँ
ख़ुद एक पहाड़ में.
***
रचनाकाल -1995