यरूशलम से समुद्र तक और वापसी – येहूदा आमीखाई

मेरा किया हुआ यह अनुवाद अशोक पांडे और उससे दोस्ती के उन विरल दिनों के लिए, जब उसने मुझे येहूदा आमीखाई जैसे कवि से परिचित कराया और उसे अनुवाद करने के लिए उकसाया। ऐसे दिनों का संस्मरण हमेशा बाक़ी रहता है। आमीखाई की इन कविताओं के बीहड़ में भटकना मुझे आज भी बहुत अच्छा लगता है और हमेशा लगता रहेगा।

यरूशलम से समुद्र तक और वापसी

1. बंद यरूशलम से

मैं गया
बंद यरूशलम से खुले समुद्र की तरफ़
मानो किसी वसीयत के खुलने की तरफ़
मैं गया पुरानी सड़क पर
रामल्ला से कुछ पहले
सड़क के किनारे अभी तक खड़े हैं
ऊंचे-ऊंचे अजीब-से विमानघर
विश्वयुद्ध में आधे तबाह
वहां वे विमानों के इंजनों की जांच किया करते थे
जिनका शोर चुप करा देता था सारी दुनिया को

महज उड़ने भर को उड़ना कोई छुपा ख़ज़ाना हो गया था तब
मेरे पूरे जीवन के लिए!

 

2.आत्मा

मैं यात्रा करता हूं
यात्राएं दुनिया की आत्मा हैं
वे बची रहती हैं हमेशा

यह बहुत आसान है –
बढ़ते हुए पेड़ों और घास से भरा ण्क पहाड़ी ढलान
और दूसरी तरफ़
एक सूखा पहाड़ी ढलान ग़र्म हवाओं से झुलसा हुआ
– मैं इनके बीच यात्रा करता हूं

धूप और बरसात का आसान-सा तर्क
वरदान और अभिशाप
न्याय और अन्याय
– मैं इनके बीच यात्रा करता हूं

आकाश की हवा और धरती की हवा
मेरे खिलाफ़ की और मेरे साथ की हवा
ग़र्म और ठंडा प्रेम
पक्षियों के प्रवास की तरह

– करो,
यात्रा करो, मेरी कार !

 

3.मृत्यु से बहुत दूर नहीं

लाटरून में
पहाड़ पर की मृत्यु और इमारतों की ख़ामोशी से बहुत दूर नहीं –
एक औरत खड़ी होती है
सड़क के किनारे

उसके ठीक बाद
एक नई चमचमाती कार
किसी सुरक्षित स्थान तक खींच लिए जाने की प्रतीक्षा में

औरत बहुत सुंदर है
उसका चेहरा, उसका आत्मविश्वास और उन्माद
उसकी पोशाक एक प्रेम-पताका है

एक बहुत कामुक औरत
जिसके भीतर खड़े रहते हैं उसके मृत पिता
एक ख़ामोश आत्मा की तरह

मैं उन्हें जानता था जब वे जीवित थे
जब उनसे आगे निकला
मैंने उन्हें अपनी शुभकामनाएं दीं !

 

4.एक पुराना बस-स्टॉप

मैं गुज़रा एक पुराने बस-स्टॉप से
जहां मैं खड़ा होता था कई बरस पहले
किसी दूसरी जगह जाने के लिए
बस के इंतज़ार में

वहां मैं खड़ा होता था
संभलता हुआ नुक़सान से पहले
और ठीक होता हुआ दर्द से पहले
मृत्यु से पहले ही पुनर्जीवित
और
प्रेम से भरा अलगाव से पहले

यहां मैं खड़ा होता था
नारंगी के झुरमुटों में फूलों के खिलने की सुगंध
इस एक ही दिन
आने वाले तमाम दिनों के लिए मदहोश कर देती थी मुझे

बस-स्टॉप अब भी वहां है
ईश्वर को अब भी पुकारा जाता है `जगह´
और मैं कभी -कभी उसे कहता हूं `समय´

5.सूरजमुखी के खेत

सूरजमुखी के खेत
पकते और सूखते हुए भूरे और तरतीब वाले
अब सूरज को नहीं
मीठी छांव को तलाशते हैं
एक आंतरिक मृत्यु
एक दराज़ का भीतरी भाग
एक थैला गहरा जैसे आकाश
उनका आने वाला संसार
एक घर का अंधेरा
एक आदमी का अंतर्तम !

 

6.मैं समुद्र-तट पर

मैं समुद्र पर
कई-कई रंगों वाली पालदार नावें
तैरती हैं पानी पर
उनके ठीक बाद मैं –
एक छोटे डेक वाली भद्दी-बेढंगी
तेल ढोने वाली नाव !
मेरा शरीर भारी और सिर छोटा है
सोचता या न सोचता हुआ

रेत पर मैंने देखा एक लड़की को
एक बड़े तौलिए के नीचे लोगों के बीच कपड़े बदलना सीखते हुए
क्या ही अद्भुत उसके शरीर का वह नाच
कैसी वह छुपी हुई सर्पीली तत्परता
कैसा वह संघर्ष पहनने और उतारने के बीच
जैकब और उसके फ़रिश्ते के बीच
प्रेमी और प्रेमिका के बीच

किसी मूर्ति के अनावरण की तरह
उसके बदन से तौलिया गिर जाता है
लड़की जीत जाती है
वह हंसती है
वह इंतज़ार करती है
और शायद वे इंतज़ार करते हैं उसका
किसी आंसुओं भरी जगह पर
वह मुझसे ज़्यादा ख़ूबसूरत और जवान है
पर उससे अधिक भविष्य जानता हूं मैं !

 

7.और मैं लौटता हूं

और मैं यरूशलम लौटता हूं
मैं बैठता हूं अपनी सीट पर
लेकिन मेरी आत्मा खड़ी रहती है मेरे भीतर
जैसे कि किसी सामूहिक प्रार्थना-सभा में
करो, यात्रा करो, मेरी कार !

एक छोटे पहाड़ पर सड़क के किनारे
जो टैंक खड़े रहते थे
वे अब नहीं हैं
अब वहां कारोब* के पेड़ हैं
सूरज ढलते वक़्त एक नर कारोब और एक मादा कारोब
उस दूसरे संसार में
जो और कुछ नहीं बस निरा प्यार है
हवा में उनकी पत्तियों की झंकार है
मानो पवित्र वाद्ययंत्रों की झंकार तोलती हुई अतुलता को

और वह छाया
जो अभी नमूदार होगी और कहलाएगी रात
और हम
जो पुकारे जायेंगे हमारे पूरे नामों से
जिनसे पुकारा जाता है सिर्फ़ मृत्यु के समय
`दोबारा कभी नहीं´ वाली रात फिर आयेगी

मैं लौटता हूं
यरूशलम में अपने घर की तरफ़

और हमारे नाम !
– वे तो खो जायेंगे इन्हीं पहाड़ों में
खोजियों के मुख से निकली
पुकारों की तरह !
***
* इज़रायल में पाया जाने वाला एक पेड़.
____________________________________________________
इस श्रृंखला के सभी अनुवाद विख्यात अनुवादक अशोक पांडे के सानिध्य में संवाद प्रकाशन से छपी पुस्तक “धरती जानती है” के रूप में प्रकाशित.

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11 Comments »

  1. 1
    malkhan Says:

    welcome to the world of blogs. we will stay in touch.

  2. 2

    बहुत अच्छा लगा।

  3. सुन्दर व सारपूर्ण कवितायें,

  4. 4

    हिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत है . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . अगर समुदायिक चिट्ठाकारी में रूचि हो तो यहाँ पधारें http://www.janokti.blogspot.com . और पसंद आये तो हमारे समुदायिक चिट्ठे से जुड़ने के लिए मेल करें janokti@gmail.com

  5. 5

    अनुनाद पर और अशोक सर कुछ अनुवादों के ज़रिये पढने के बाद इनकी कविताओं को बेहतर समझ से पढ़ रहा हूँ.शुक्रिया आपका.

  6. 6
    apoorv Says:

    उड़ने भर को उड़ने की जिंदगी भर लम्बी ख्वाहिश को बंद येरुशलम से ही कोई शब्द दे सकता है..
    और फिर यह

    उसकी पोशाक एक प्रेम-पताका है
    एक बहुत कामुक औरत

    मगर उसके तुरंत बाद

    जिसके भीतर खड़े रहते हैं उसके मृत पिता
    एक ख़ामोश आत्मा की तरह

    जैसे कितने बिम्ब बिखर जाते हैं कल्पना के चिकने फ़र्श पर..उदास करते हुए.
    येहुदा की कविताएं साझा करने के लिये शुक्रिया..
    आपका यह ब्लॉग एक वक्त की मोटी किताब मे वह खूबसूरत पन्ना जोड़ता है कि तारीख भी कभी शुक्रिया कहेगी उसके लिये..

  7. 7
    संगीता पुरी Says:

    इस नए वर्ष में नए ब्‍लॉग के साथ आपका हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत में स्‍वागत है .. आशा है आप यहां नियमित लिखते हुए इस दुनिया में अपनी पहचान बनाने में कामयाब होंगे .. आपके और आपके परिवार के लिए नया वर्ष मंगलमय हो !!

  8. 8
    kshama Says:

    Swagat hai..! Sab rachnayen nahee padh payi..lekin jo padheen wo sundar hain!

  9. 9
    kshama Says:

    5.सूरजमुखी के खेत

    सूरजमुखी के खेत
    पकते और सूखते हुए भूरे और तरतीब वाले
    अब सूरज को नहीं
    मीठी छांव को तलाशते हैं
    Ye rachnayen khaas achhee hain!

  10. 10
    alkagoel Says:

    bahut badia hai
    yaha bhi ruke
    http://alkagoel14.blogspot.com/

    ८ जनवरी २०१० १०:१७ PM

  11. 11

    अरे वाह क्या बात है.

    मैं अभी अभी अपने ब्लॉग पर येहूदा आमिखाई की कुछ कविताओं को प्रस्तुत कर फुर्सत हुआ. संवाद से किताब मेरे हाथों आई और आमिखाई की पहली कविता “बम का व्यास” मुझे इतनी पसंद आई कि मैंने इसे सामने रखने की ठानी. पहले मैंने अशोक पाण्डेय और आपका दोनों का नाम दिया. फिर गूगल में आमिखाई की कविता के मुताल्लिक धुंध तो तुम्हारे ब्लॉग के अलावा कुछ और नहीं मिला. फिर मैंने ब्लॉग से नाम हटा लिया. और मित्रों को मेल भेजे कि आपके ब्लॉग पर जाकर अनुवाद पढ़ें. आपका अनुवाद मुझे बहुत पसंद आया. और आमिखाई की कविता तो है ही बहुत खुबसूरत.

    निशांत कौशिक


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