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डायरी के कुछ अटपटे पन्ने !

19/12/2009
                                            
यह डायरी हिमाचल प्रदेश से श्री गुरमीत बेदी के सम्पादन में छपने वाली पत्रिका “पर्वत राग” के जुलाई-सितम्बर 2008 अंक में छपी है.

  

14 जुलाई 2005
                                        

दिल्ली से लौटा। इस बार का अंकुर मिश्र पुरस्कार फैजाबाद के विशाल को मिला। बहुत अच्छा कवि है और कर्रा वक्ता भी। आत्मीय थोड़ा कम है। गले नहीं मिलता। शायद इसे ही सौम्यता कहते हैं। मैंने कभी ऐसा औपचारिक वातावरण नहीं पाया, सो इसके आदाब भी नहीं जानता। गले मिलता हूँ। दोस्तों के गले में हाथ डाल देता हूँ। पीठ पर धौल खाना और जड़ना, दोनों अच्छा लगता है।
                 

इस बार लौटते हुए अपने पुरस्कार की एक बात बार-बार याद आयी। 14 की रात मैं रेल में था। दो बजे वीरेन दा का फोन आया – `जो कुछ हुआ उसे भूल जा तुरंत! इसी में उलझा रहा तो काम ना पाएगा तेरे से। तूने बतेरा काम करना है अभी।` इस संवाद की याद ने एक बरस बाद भी उतनी ही ताकत दी और लौटने के बाद मुझे एक ही काम सूझा – सोना!
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16 जुलाई 2005

कल रातभर सपनों में झूलता रहा। बचपन से आए सपने। समय को पार करने में हमें भले ही समय लगता हो पर सपने पल भर में इधर से उधर हो जाते है। ताऊ जी (श्री जयदेव पाँथरी) को गुज़रे कई बरस बीत गए पर मेरे लिए उन तक पहुंचना बस एक सपने से गुज़रना भर है। सपने में अपने लोग थे और अपना गाँव भी। बहुत कुछ असली और कुछ सोये हुए दिमाग की दिपदिपाती कल्पना से निकला। बारिश के दिनों का नौगाँवखाल। पहाड़ों पर गिरती अनथक बरसात। जगह-जगह उग आयी काई रंग की मखमली वनस्पतियाँ। हाथों पर सफेद छाप छोड़ने वाली पत्तियाँ। मकानों और रास्तों में मरम्मत और सुधार का मौसम। धूप निकलते ही हम काम पर जुट जाते। छतों पर इधर-उधर खिसके सलेटी पत्थरों को सही जगह पर लगाते। रास्तों से मिट्टी हटाते। कोटद्वार से आती रसद लाती सड़क इन दिनों अक्सर बंद ही रहती। इन सब चीज़ों को पहले हक़ीक़त में जीना और फिर इनसे दूर होकर इन्हें सपने में देखना एक विचित्र किंतु आत्मीय अनुभव है। कभी-कभी लगता है कि मेरे पास यह हक़ीक़त और इसे बार-बार सपने में देख सकने की यह थोड़ी सी ताकत नहीं होती तो मैं क्या करता….. कहाँ होता….
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24 जुलाई 2005

आज फिर ताऊ जी याद आए। जब कभी कहीं से ठेस लगती है वे याद आते हैं। उनकी और नौगाँवखाल की याद एक आसरा-सी लगती है। मैं हारकर वहाँ छुप सकता हूँ। अतीत में ही सही पर हारने के बाद ताकत जुटाने और दोबारा मुकाबले में लौट सकने के लिए एक आसरा तो है मेरे पास।

कुलीन पाँथरी ब्राह्मण होने के बावजूद उन्होंने शायद ही कभी अपने घर में पुरोहित बुलाया हो। कट्टर आर्यसमाजी। मूर्ति और मंदिर को न मानने वाले ताऊ जी की साहसी छवि जैसे आज भी मेरे भीतर मंत्रोच्चार करती है। यज्ञ की वैदिक विधियों से गुज़रते कमरे का वह धूम्रसिक्त वातावरण और हवन सामग्री की अरघान मेरी आत्मा में सुरक्षित है। कोई कितना ही खुद को कम्युनिस्ट कहे पर इस पूँजी को छोड़ पाना उसके लिए नामुमकिन ही होगा।

याद आता है छोकरेपन में एक बार ठोड़ी फोड़कर घर आया था। माँ ने चोट देखकर पहली प्रतिक्रिया थप्पड़ मारकर दी। पिता ने कालेज से लौटने पर त्यौरियाँ चढाई। ताऊ जी थे जिन्होंने मुझे घास के गट्ठर की तरह झप्प से उठाया और अस्पताल की ओर दौड़ गए। मैं 15 बरस का था। किशोरावस्था में अपमान भी ज्यादा सालता है। ताऊ जी ने मेरा खून ही नहीं, आँसू भी पोंछे। रोना आने पर उनकी वह गरम हथेली आज भी अपने चेहरे पर महसूस करता हूँ।
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14 अगस्त 2005

उस्ताद सलामत अली खान का एक चंद्रकौंस मिला। सुनकर हैरान हूँ। बड़े गुलाम अली खाँ , अमीर खाँ साहब, राशिद खाँ वगैरह को सुनते हुए अकसर सोचता हूँ कि मुस्लिम गला इतना मीठा क्यों होता है…. लोग वादन गायकी अंग में करते हैं पर उस्ताद सलामत अली ने गायकी में वादन जैसा प्रभाव पैदा किया है। उनकी तान में वायलिन बजता हुआ महसूस होता है। अंत में तराना अमीर खुसरो का । इस सबको सुन पाना भी एक कविता ही है।

दादाजी* से भी बात हुई। आँख के आपरेशन के बाद अब उनका चश्मा बन रहा है। कुछ दिन से पढ़ना-लिखना बंद है। चार-पाँच रोज़ और बंद रहेगा। मैंने उन्हें नहीं बताया की वागर्थ में मेरी कविताएँ छपी हैं। हालाँकि उनकी प्रतिक्रिया का हमेशा इंतज़ार होता है। किसी चिट्ठी में लिखी उनकी यह बात हमेशा याद रहती है कि कविता अपनी ज़मीन और ज़मीर से आती है। दुनिया में हज़ारों तरह के लोग हैं। उनके बीच अपनी आवाज़ सुन पाना ही बड़ी बात है। पता नहीं हो पाता है या नहीं, लेकिन मैं अपनी आवाज़ सुनने की पूरी कोशिश कर रहा हूँ।
* दादा जी – कवि चंद्रकांत देवताले को आत्मीय संबोधन।
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15 अगस्त 2005

क्या आज़ादी सिर्फ तीन थके हुए रंगों का नाम है
जिन्हें एक पहिया ढोता है
या इसका कोई ख़ास मतलब होता है…
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लोहे का स्वाद लुहार से नहीं
उस घोड़े से पूछो
जिसके मुँह में लगाम है। (धूमिल)

आज़ादी का दिन। एक बार फिर। वही जलसा कालेज का। जन-गण-मन। शिक्षा निदेशक महोदय का वही सालाना संदेश। तबीयत भी ख़राब। आँतों में संक्रमण। डॉक्टर के अनुसार अब रात के खाने में माँस के बिना कौर न तोड़ने की आदत कम से कम बरसात भर के लिए त्यागनी पड़ेगी। खाने की आज़ादी की ख़त्म।
 

नागार्जुन याद आ रहे हैं। पर क्यों… कवि अरुण कमल को क्या सूझी `जिनके मुँह में कौर माँस का उनको मगही पान`´ लिखने की… रामनगर के घर में एक बार मुर्गे का भोग लगाते बाबा ने लटपटी जीभ से बताया था 36 तरह के माँस का स्वाद, जिसमें मुसहरों के साथ खाया चूहा भी शामिल था। वह पहली बार हमारे साथ इतने दिन गुज़ार रहे थे। मैं 18 बरस का था और उनके आगमन से लगभग पगलाया हुआ सा। आवभगत से ऊब कर बोले थे `सुनो शिरीष ! हमें छाती पर उठाने की कोशिश मत करो। यहीं दीवान पर रहने दो। हम भी आराम से रहेंगे और तुम भी।´ उनकी कई बातें हैं जो रह-रहकर याद आती हैं। कभी कहीं आते-जाते, यहाँ तक कि कक्षा में लेक्चर झाड़ते हुए भी वे याद आ जाते हैं। भाऊ पर कथ्यरूप ने विशेशांक निकाला तो मेरे पिता ने भी सहायता की। बाबा तब काशीपुर-रामनगर प्रवास पर थे। उन्होंने भाऊ के बारे में मुझे बहुत कुछ बताया। बाबा को एक बार भाऊ ने डपटा। बाबा ने बताया `मैं एक बार कह बैठा चलो भाऊ आज तो तुम्हारे घर ही रहेंगे। यह भन्ते बड़े-बड़े आदमियों से मिलाता है। इसके साथ और रहा तो मेरे सींग उग जायेंगे। भाऊ ने एक बार अनसुनी करी। फिर कहा तो गुस्से में लगभग रोते हुए बोले – मुँह उठाया और कह दिया तुम्हारे घर चलेंगे। पता नहीं मेरे पास बिस्तर है कि नहीं… और हो भी तो मैं अभी घर जाकर खुद क्या खाऊँगा क्या तुम्हें खिलाऊँगा…`´ ये घटना नागपुर में मेरे पिता के सामने घटी थी और वे भी कई बार इसका ज़िक्र करते रहते हैं।

क्या वाकई इतनी मुश्किल दुनिया थी वह…. एक बड़ा चित्रकार इस तरह खाने को मोहताज़ था। अपने सबसे प्यारे दोस्त को भी वह एक रात के लिए घर नहीं ले जा पाया। हम जो दावतें देते हैं अपने लेखक दोस्तों को, साथ मिलते-बैठते खूब खाते-पीते हैं, क्या इसमें गुज़र चुके उन लोगों का कोई हिस्सा नहीं है… मैं एक दावत का ख़्वाब देखता हूँ, जिसमें पीते-पिलाते हुए बाबा वीरेन दा, मंगलेश दा, रमदा, खरे जी, अशोक और देवताले जी को उन 36 जीवों का अलग-अलग स्वाद बताएँ और खूब पी चुकने के बाद कहीं से अचानक आकर भाऊ हम सबको खाने पर अपने घर ले जाएँ।

मैं अपनी ज़िन्दगी में मुक्तिबोध, परसाई जी और भाऊ – इन तीन लोगों से मिलना चूक गया। मुक्तिबोध से तो मिलना मुमकिन ही नहीं था पर बाक़ी दो लोग मेरी और मेरे समय की ज़द में थे। भाऊ को छोड़ भी दूँ, तब भी परसाई जी काफ़ी बाद तक दुनियानशीं रहे। मैं शायद इस दुनिया की सच्ची क़ीमत ही नहीं जानता था तब।
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17 अगस्त 2005

दो-तीन दिन व्यस्तता में बीते। कालेज में चल रही अंतर्महाविद्यालय शतरंज प्रतियोगिता समाप्त हुई तो कुछ राहत मिली। दूसरी चीज़ों के बारे में सोचने का वक्त मिला। इस बीच कक्षाएँ भी नहीं लगीं। न पढना हुआ न पढ़ाना। लड़के यहाँ हिंदी साहित्य नहीं लेते। इसे लड़कियों का विषय माना जाता है। वे सब बहुत भली होती हैं। अधिकांश ग्रामीण इलाक़े की। अभी सितम्बर के महीने से घास काटने चली जायेंगी। उन दिनों कक्षा की उपस्थिति आधी रह जाती है। पहाड़ों में जाड़ों के लिए तैयारी पहले ही शुरू करनी पड़ती है, जिसमें ईधन के लिए चीड़ की सूखी टहनियाँ तोड़ना और पशुओं के लिए पेड़ों पर लूटा लगाना शामिल है। बरसात के तुरन्त बाद ढलानों से लंबी हरी घास को काट कर उसे पेड़ों पर गट्ठरों में बाँधने को लूटा लगाना कहते हैं। यह घास सर्दियों भर पशुओं के आहार का मुख्य स्त्रोत होती है। इस काम में जुटी स्त्रियों की थकान का शायद ही कोई मोल हो। सीमा अकसर ऐसी औरतों चाय पिलाने बिठा लेती है। चार साल का गौतम श्रम के बारे में कुछ नहीं जानता। लेकिन वह खेल-खेल में उनकी साड़ी में चिपके कुम्मर (काँटे) निकाल देता है और वे उस पर अपनी ममता लुटाती हैं। घर से सास के हाथों पिटकर घास काटने आयी एक औरत उसकी इस कार्रवाई पर उसे चिपटा कर रोने लगी। एक बच्चा ही शायद इतनी आत्मीयता पैदा कर सकता है। इन औरतों के पति ग़रीब और कामचोर हैं। शराब उन्हें और बिगाड़ती है। विडम्बना यह कि घरों में बच्चों की सहानुभूति भी अकसर माँ के साथ नहीं होती। वे अपना दुख कहीं कह नहीं सकतीं। उन्हें काम पर जुटे देखकर लगता है कि ये ख़ुद को ख़त्म कर देने के लिए इतनी मेहनत कर रही हैं। किसी आत्मलीन घसियारी की दराँती कभी-कभार खुद के ही हाथों पर चल जाती है। एक बार मैंने देखा कि एक औरत की दराती से घास में छुपा साँप कट गया। मैं तब बहुत छोटा था। स्त्रियों के साहस का ज़िक्र छिड़ने पर मुझे कोई ऐतिहासिक चरित्र नहीं, हाथ में काले नाग के दो टुकड़े झुलाती वह महिला ही याद आती है। अपनी ज़िन्दगी के छुपे हुए साँपो के साथ वह वैसा सलूक नहीं कर पायी। जब मैं पंद्रह साल का था, वह इलाज के अभाव और घरवालों की लापरवाही के चलते घुट-घुटकर मर गई।

मेरी डायरी में वर्तमान कम है, अतीत ज़्यादा। शायद इसलिए कि अतीत अधिक अनुभव सम्पन्न था। कवि के लिए उसका वर्तमान भी कविता में लिखे जाने तक अतीत में बदल चुका होता है। मेरी उम्र लगभग बत्तीस साल है और मेरे लिए दुनिया को अभी और प्रकट होना है। लेकिन कब…. पता नहीं। अभी तो वही दुनिया है जो पीछे छूट गई और बहुत याद आती है। मैं बार-बार वहाँ पहुँच कर खुद को पुकारता हूँ। यह नास्टेल्जिया से कुछ अधिक है। लगभग अपरिभाषित। इसमें मेरा पूरा परिवेश है। मैं आज की चीज़ों को पुराने वक़्त में और तब की चीज़ों को नए वक़्त में लाता ले जाता रहता हूँ। यह एलिस इन वंडरलैंड जैसा होता है। पर इससे ताकत मिलती है। मैं कविताओं में इसका अधिक जोखिम नहीं ले सकता। हालाँकि बहकता वहाँ भी हूँ। बिना अतीत की कविता का शायद ही कोई भविष्य होता हो।
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21 अगस्त 2005

कालेज में अभी प्रवेश हुए ही हैं कि परीक्षाफल सुधार परीक्षा आ गई। साथी और राजनीति विज्ञान के लेक्चरर पुष्पेश इसे `फिर वही दिल लाया हूँ ´ कहते हैं। इस परीक्षा के बाद छात्र राजनीति का महापर्व छात्र-संघ के गठन के रूप में मनाया जाता है, जिसके लिए बाकायदा निर्वाचन प्रक्रिया चलती है। पंद्रह दिन होम हो जाते हैं। फिर पाठ्येतर गतिविधियों के नाम पर राष्ट्रीय सेवा योजना के दो दस दिवसीय शिविर लगते हैं और दशहरा-दीवाली आदि होता रहता है। फिर ठंड बढ़ती है। मौसम ख़राब रहने लगता है। कालेज सिर्फ दिखावे के लिए खुलता है और फिर जनवरी के प्रथम सप्ताह से फरवरी के दूसरे सप्ताह तक के लिए शीतावकाश हो जाता है। मार्च से परीक्षा शुरू यानी `फिर वही दिल लाया हूँ´ !

तद्भव 12 पढ़ रहा था अभी। हरेप्रकाश उपाध्याय की कविताएँ अच्छी हैं। उनमें लय खोजने की वही चाह है, जो मुझे खुद में महसूस होती है। उन्हें अपने विषय खोजने होंगे। मुझे पता नहीं क्यों ऐसा लगता है पर जैसे हर सच्चे रचनाकार का स्वभाव अलग होता है, वैसे ही हर कविता का भी। जब मिलती-जुलती कविताएँ दिखाई देने लगें तो क्लोन बनाने जैसा लगने लगता है। मैं अकसर खुद को इस कटघरे में खड़ा करता हूँ और अपनी लिखी कुछ चीज़ें फाड़ देता हूँ। बेहतर होने के लिए निर्मम भी होना पड़ता है। अपने और अपने लिखे के प्रति शायद ही कोई वीरेन डंगवाल जितना निर्मम हो पाए। उनके दो संग्रह हैं और दोनों एक ही आत्मा के साथ बिल्कुल अलग ज़मीन पर खड़े दिखाई देते हैं। वे एक ही खेत में कई फसलें उगा पा रहे हैं। उनके जैसा हो पाना कठिन है, लेकिन उनसे प्रेरित तो हो ही सकते हैं।
आजकल कविता लिखना बंद है। कुछ चीज़ें हैं जो खदबदा रही हैं। शायद कुछ समय बाद हाँडी चढ़ानी पड़े। अभी तो सब कुछ स्थगित है।
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04 सितम्बर 2005

कल रात वीरेन दा का फोन ! बाद में फोन पर ही हाल की लिखी लम्बी नई कविता का अद्भुत पाठ। रात 11 बजे तक तो जिन चिराग से बाहर आ ही चुका होता है। कविता अब भी दिल में गूँजती है। बरेली से लगा हुआ रामगंगा के कछार पर बसा कटरी गाँव। वहाँ रहती रुक्मिणी और उसकी माँ की यह काव्य-कथा। नदी की पतली धार के साथ बसा हुआ साग-सब्जी उगाते नाव खेते मल्लाहों-केवटों के जीवन की छोटी-बड़ी लतरों से बना एक हरा कच्चा संसार। कलुआ गिरोह। 5-10 हज़ार की फिरौती के लिए मारे जाते लोग, गो अपहरण अब सिर्फ उच्च वर्ग की घटना नहीं रही। कच्ची खेंचने की भट्टियाँ। चौदह बरस की रुक्मिणी को ताकता नौजवान ग्राम प्रधान। पतेलों के बीच बरसों पहले हुई मौत से उठकर आता दीखता रुक्मिणी का किशोर भाई। पतवार चलाता 10 बरस पहले मर खप गया सबसे मजबूत बाँहों वाला उसका बाप नरेसा। एक पूरा उपन्यास भी नाकाफ़ी होता इतना कुछ कह पाने को। यह कविता हमारे समय की मनुष्यनिर्मित विडम्बनाओं और विसंगतियों के बीच कवि की अछोर करुणा का सघनतम आख्यान प्रस्तुत करती हुई सदी के आरम्भ की सबसे महत्वपूर्ण कविता मानी जाएगी। मैं सिर्फ आने वाले कुछ दिन नहीं, बल्कि पूरी उमर इसके असर में रहूँगा। वीरेन दा से कह नहीं सकता और भाग्य को भी नहीं मानता पर कहना ऐसे ही पड़ेगा कि हमारा सौभाग्य है कि हम उन्हें अपने बीच पा रहे हैं।
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06 सितम्बर.2005

आज की डाक में `एक कवि की नोटबुक` आयी। राजेश जोशी कई बार पत्रिकाओं में जो नोट्स लिखते रहे हैं, यह लगभग उन्हीं का संग्रह है। उन्होंने नागार्जुन के बारे में अद्भुत लिखा है। कितनी खुशी की बात है कि किसी स्वनामधन्य आलोचक ने नहीं, एक कवि ने नागार्जुन के केंद्रीय पद `देखा है` को पहचाना है। मुक्तिबोध, शमशेर, केदार और कुमार विकल पर राजेश जोशी का आकलन एक दस्तावेज़ सरीखा है। देवताले जी के बारे में उनके विचार जानने को उत्सुक था। पढ़कर हैरानी ही हाथ लगी। क्या देवताले जी ने सचमुच सिर्फ अकविता ही से शुरू किया था… वे कब और कैसे अकवि से कवि बन गए…. क्या वे कवि बन भी पाए…

हरम और हमाम औरतों के बनाए हुए नहीं हैं। यदि वे सड़क को ही हरम और हमाम की तरह वापर रही हैं तो पुरुषों की रची इस दुनिया में यह भी उनकी एक नियति है, जिसमें तीखा व्यंग्य और प्रतिकार भी है। राजनीति मार्क्स का खूँटा पकड़ कर बैठ जाने से ही नहीं होती। उन औरतों से बड़ा सर्वहारा कौन है, जिन से देवताले जी की कविता एक लगातार आत्मीयता के साथ बोलती-बतियाती दीखती है।

बिम्बों की लदान खुद राजेश जोशी में भी कम नहीं है। देवताले के बिम्ब तो बिम्ब जैसे भी नहीं हैं। उनमें रंग-गंध की कातरता भी उस स्तर पर नहीं है। वे राजेश जोशी की तरह नारे नहीं लगाते तो इसका अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि वे नए समाज का स्वप्न नहीं देखते। हर सपना पोस्टर में नहीं बदला जा सकता। देवताले समाज और जीवन की भर्त्सना करते हैं और विश्लेशण नहीं, इस बात को मान लेना एक अपराध होगा। जो किसी वाद में शामिल नहीं, वो कवि नहीं का ज़माना लदे कुछ बरस तो बीत ही गए हैं। देवताले जी का रेह्टारिक असली है और जीवन के बीहड़ में भटकने से पैदा होता है। यह सच है कि वे हमेशा ही सब कुछ ठीक नहीं लिखते। उनमें एक जिद है, जो कभी-कभी अखरती है। लेकिन इसे उनके व्यक्तित्व का हिस्सा मानना चाहिए, न कि उनके कवि की असफलता। मुक्तिबोध के बाद मध्य प्रदेश में चन्द्रकांत देवताले और विष्णु खरे से बड़ा कवि कोई नहीं हुआ। इस निष्कर्ष से सहमत होना सबके लिए मुमकिन नहीं होगा, लेकिन मेरे लिए यही हक़ीक़त है।
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10 सितम्बर 2005

कालेज में अनुवाद पर एक सेमीनार का प्रस्ताव जमा किया। हो पाया तो ठीक-ठाक काम हो जाएगा। रमदा ने `गिद्ध` माँगी। मेरे हस्तलेख में। फिलहाल छपी हुई भेजी। उनके दिमाग में भी कुछ अजीब-सा पकता रहता है।

इधर कई दिनों से लिखने की तमाम कोशिशें नाकामयाब हो रही हैं। कुछ समय के लिए मुझे ये कोशिशें भी स्थगित कर देनी चाहिए। मैंने कभी कोशिश करके नहीं लिखा। जो हुआ अपने आप अनायास हुआ। शायद यह खुद को जाँचने-परखने का अन्तराल है। ऐसे भी दिन आते हैं। लिखना सम्भव न हो पाए तो अनुवाद करने चाहिए। पढ़ना चाहिए। आने वाले दिनों में निराला, मुक्तिबोध और शमशेर को नए सिरे से पढ़ने की योजना बना रहा हूँ। कोशिश करूँगा कि उन्हें पढ़ते हुए अपने समझने के लिए कुछ बातें इस डायरी में नोट करता जाऊँ। यह एक अच्छी आदत है। इससे बाद में चीज़ें आसान हो जाती हैं। अपना सोचा-समझा हुआ लिखित रूप में रहे तो समझ में आए बदलाव को भी समझा जा सकता है।

पवनकरण की निरर्थक अनर्गल प्रलाप जैसी लम्बी कविताएँ पढ़ीं तो विमल कुमार की कविताएँ अचानक याद आयीं! संकलन मेरे पास है पर मकान बदलने की तैयारी में सारी किताबें बाँधी जा चुकी हैं। स्त्रियों पर उनकी कविताएँ बहुत अच्छी हैं। पिछली दिल्ली यात्रा में उन्हें देखा था। मिलना नहीं हो पाया।
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12.06.2006

यह डायरी इतनी अनियमित है कि अब इसका शायद कोई मतलब ही नहीं रह गया है। सितम्बर के बाद यह जून है। इस बीच बहुत कुछ बदल गया। 13 दिसम्बर को पल्लवी कपूर नहीं रही। मेरे जन्मदिन के दिन उसका जाना बहुत तकलीफदेह है। और भी बहुत कुछ बदल गया। दुनिया हमेशा क्या, कभी एक-सी नहीं रहती।

किताब राजकमल से लौट आयी। पहले माँगने फिर लौटाने का ये चलन मेरे लिए ख़ास रहा। सीखने के ऐसे मौके मिलते रहने चाहिए। मुझे खुद के कवि होने का आभास भले हो पर विश्वास बिल्कुल नहीं है। मैं किसी दौड़ या होड़ में भी शामिल नहीं। हो सकता है मैं उसके लायक ही नहीं। चुपचाप लिखता रहा और अपनी बनाई चीज़ें ही तोड़ पाया तो कवि होने का यह थोड़ा-सा आभास भी संतोष देगा। इधर एक उत्कृष्ट महाविद्यालय की मैडम को वचन दिया था कि अब और कविताई नहीं करूँगा, लेकिन बनारस पर एक कवितानुमा संस्मरण लिख बैठा। लताड़ भी पड़ी। भीतर की छटपटाहट निकलनी ही थी, निकल गई। ज्ञान जी कुछ दिन पहले आए अपने फोन के अनुसार उसे अगले अंक में छाप रहे हैं। छपने पर थोड़ा हल्ला मचेगा, ख़ासकर बनारस में। बहुत लोग ख़ुश भी होंगे, ख़ासकर बनारस के! मैं शायद ऐसा ही हूँ – समर्पित लेकिन शातिर भी। जगहें और लोग मुझमें कई-कई तरह की हलचलें पैदा कर देते हैं। मैं उनसे उदासीन नहीं रह सकता। अपने हिसाब से उसमें अच्छा-बुरा भी तय कर लेता हूँ। एक पागलपन है, जो बढ़ता ही जाता है। एक उलझन है, जो सुलझती जाती है। इधर अचानक ही मध्य प्रदेश से नाता जोड़ बैठा हूँ। पुरखों के रहवास के हिसाब से वहीं का हूँ पर अम्मा के गुज़रने के बाद उसके लिए कभी कोई सम्वेदना नहीं जागी। अब जाग रही है। जाग ही नहीं रही बल्कि मुझे जगा भी रही है। अभी पूरी तरह आश्वस्त नहीं हूँ। क्या अम्मा के बाद भी सचमुच मेरे लिए वहाँ से प्यार आएगा…

नौगाँवखाल फिर लौट रहा है। दरअसल वह कहीं गया ही नहीं- मेरे भीतर बसा रहा। आज गिरिराज किराडू की एक कविता पढ़ रहा था, भीतर के संसार के बारे में। नौगाँवखाल एक ऐसा ही संसार है। मैं वहाँ नहीं हूँ लेकिन वो यहाँ है। राह चलते अचानक किसी पहाड़ी वनस्पति की परिचित-सी गंध आते ही लगता है अरे यह तो मेरे बचपन की गंध है। कोई मुलायम-सा पत्थर, चीड़ और बाँज की टूटी टहनियाँ, एक झुर्रीदार चेहरा, कोई अकेला जाता बच्चा, अख़बार में किसी तेंदुए के नरभक्षी हो जाने की खबर, घासवालियों के हाथों में दराँती की छुमछुम – एक नहीं अनगिन चीज़ें हैं जो रोज़ कई बार मुझे टाइम मशीन की तरह विगत की यात्रा पर ले जाती रहती हैं। इसे अतीतजीविता नहीं कहूँगा। यह तो मेरे अतीत की समकालीनता है।
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23.07.2007

लगभग एक साल बाद आज इस डायरी के पन्ने खुल रहे हैं। मैं बहुत टूट चुका हूँ। मेरे दिल और दिमाग़ ने मेरा साथ देना छोड़ दिया है। जीवन तो किसी तरह निभता ही जाता है पर आग मन्द पड़ती जा रही है। अब तक पुल के नीचे से काफी रक्त बह चुका है। इधर काफ़ी कविता-कविता होता रहा। मैंने ख़ुद काफ़ी लिखा और इधर ज्ञानोदय में नयी पीढ़ी का चक्कर भी चलता रहा है। इस दौरान मैंने पाया कि विशाल की कविता अब भी बहुत सलीके से अपनी बात कहती है, लेकिन अलग नज़र नहीं आती। उसने जतिन मेहता लिखकर अपने लिए एक बड़ी चुनौती रख ली है, जिस पर हर बार उसे खरा उतरना है। व्योमेश शुक्ल काफी चमक के साथ सामने आया है – आगे चलकर उसे शायद अपनी ही चमक से चकाचौंध होना पड़े!
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24.07.2007 / आज डायरी में कुछ लेख जैसा लिखूंगा …………

जनवादी कविता की याद में………

हिन्दी में जनवादी कविता की एक प्रभावी धारा रही है। मुझ जैसे लोग तो यह भी मानते हैं कि यही बीसवीं सदी में हिन्दी कविता की असली ताक़त भी रही है। कबीर में इसके शुरूआती बीज हैं। भक्तिकाल में धर्म और दर्शन की भूलभुलैया से कतई परे भक्ति का एक अलग जनपक्षीय स्वरूप साफ पहचाना जा सकता है। रीति में भी कुछ मुक्त कवि मौजूद रहे। थोड़े बाद के समय में आगरे के नज़ीर को कौन भुला सकता है। आधुनिक युग में 1857 की विफलता के बाद भारतेन्दु ने किसी हद तक जनपक्षीय कविता का सूत्रपात कर दिया था, लेकिन उनका स्वर कई बार साम्प्रदायिक भी हुआ है। मैथिलीशरण गुप्त को भी हम सिरे नकार नहीं सकते। उनकी कविता अपने समय की जनता के स्वर को पहचानने में एक हद तक सफल रही है। ये और बात है उस समझ पर कवि के अपने सपाट और आदर्शवादी जीवन-दर्शन का आवरण सर्वत्र नज़र आ जाता है। छायावाद ने ज़रूर एक घना कुहासा उत्पन्न किया लेकिन उसे भेदने वाला सूर्य भी उसी के बीच से उगा और चमका। निराला को हम बीसवीं सदी का पहला प्रतिबद्ध जनकवि कहेंगे। उनकी कविता में इस देश की जनता अपने पूरे जीवट और संघर्ष के साथ मौजूद दिखती है। उसमें पराजय और अपमान है तो जूझने का अपार साहस भी – ठीक किसी ठेठ उत्तरभारतीय किसान की तरह। निराला के जीवन में विक्षिप्तता के बरसों को हम सीधे उस समय के उत्तर भारतीय जनमानस से जोड़कर देख सकते हैं। इसी दौर में उन्होंने अपने लोगों पर सबसे ज़्यादा कविताएँ लिखीं। उन भीषण जीवन स्थितियों में वे जैसे अपने ही जन का आईना हो जाते हैं। उनकी तैयार की हुई ज़मीन पर ही नागार्जुन, केदार, त्रिलोचन, मुक्तिबोध और शमशेर ने अपनी यात्राएँ कीं। यही बीसवीं सदी में हिन्दी की जनवादी कविता का आधारभूत ढाँचा है।

बाद के समय में धूमिल के आगमन ने जनवादी कविता में एक नया मुहावरा जोड़ा। जो विद्वान धूमिल के काव्य-मुहावरे को अकविता से जोड़ते हैं, वे सरासर गलत रास्ते पर हैं, फिर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वे कितने बड़े आलोचक या विचारक हैं। धूमिल का स्वर जन का स्वर है। उसमें यदि पुरुषवादी वर्चस्वता वगैरह दिखाई पड़ती है तो दरअसल उस जनमानस का हिस्सा है, जिसे धूमिल अपनी आवाज़ दे रहे थे। यहाँ बहुत कड़क अभिव्यक्ति मिलेगी। एक किसान ही जान सकता है कि ऊसर को जोतना कैसा होता है। धूमिल वही किसान थे। उनके साथ के लोगों में देखें तो कुमार विकल भाषा और अभिव्यक्ति में उनसे फ़र्क़ होते हुए भी उसी राह पर थे। नक्सलबाड़ी एक जनान्दोलन था और उसे आज के नक्सवादियों से जोड़कर देखना एक विचार को स्खलित होते हुए देखना है। इसमें हिंसा नहीं थी – प्रतिहिंसा थी, जिसके लिए नागार्जुन की यह घोषणा हमेशा प्रासंगिक रहेगी – `प्रतिहिंसा ही स्थायी भाव है अब मेरे कवि का!`

रघुवीर सहाय अपनी कविता में शहरी जन को लाए थे। उन्हें मैं जन के अर्थविस्तार का श्रेय देना चाहूँगा, चाहे वे एक अलहदा स्कूल के कवि रहे हों। यही बात सर्वेश्वर के लिए भी कही जायेगी। उसी दौर में केदारनाथ सिंह भी अभी बिल्कुल अभी के बाद ज़मीन पक रही है कि भावभूमि से दो-चार हो रहे थे। वे चुपचाप इसे रच रहे थे। लीलाधर जगूड़ी धूमिल के प्रभाव से निकलने की छटपटाहट में अपनी राह खोज रहे थे। चन्द्रकांत देवताले दरअसल आक्रोश के कवि थे और जनता के पक्ष में उसे सम्भालने और विवेकवान बनाने की कोशिश कर रहे थे, जिसका काफी सुघड़ और प्रभावशाली रूप उनकी बाद के सभी संग्रहों में दिखाई देता है।

70 के बाद प्रकाश में आयी समूची पीढ़ी ही मानो नक्सलबाड़ी की उपज थी। आलोक धन्वा का नाम इसमें सबसे पहले आयेगा। गोरख पाण्डेय भी साथ ही होंगे, लेकिन वे कविता में कुछ बड़ा और सार्थक करने से पहले ही नितान्त व्यक्तिगत और पतनशील कारणों से संसार छोड़ गए, जिसकी कोई जनपक्षीय व्याख्या सम्भव नहीं होगी। यह एक जनकवि और राजनैतिक कार्यकर्ता का पतनशील प्रस्थान था।

पाश पंजाबी में जितना थे, उससे कम हिन्दी में नहीं रहे होंगे। उन्हें हमने हमेशा हिन्दी का ही कवि माना है। पाश की कविताओं में पश्चिमी भारत की जद्दोजहद अपने पूरे तनाव के साथ थी। सबसे बड़ी बात यह कि यह सारे कवि सत्ता को चुनौती दे रहे थे। ये निडर थे और इसीलिए जनप्रिय भी। इस पूरे परिदृश्य में नागार्जुन सबसे पुराने होते हुए भी समान रूप से सक्रिय थे। नई पीढ़ी के जनवादी कवियों ने उनसे बहुत कुछ पाया और सहेजा भी, जिससे उनका स्नेह तो होना ही था। त्रिलोचन अपने साथ जन ही नहीं, पूरे जनपद को ले आए थे। शमशेर मजूरों पर कविता लिख रहे थे तो केदार बुन्देलखंड के श्रमशील और मुश्किल जीवन पर। दुख की बात थी मुक्तिबोध दुनिया छोड़ चुके थे लेकिन उनकी कविता अपना काम कर रही थी। उसमें भारतीय जन के जीवन की रोंगटे खड़े कर देने वाली तस्वीरें थीं, जो अपने विशिष्ट फंतासीपरक शिल्प के चलते दुगना प्रभाव उत्पन्न करती थीं।

यहाँ तक आते-आते ही एक बार मुड़कर देखें तो यह एक समृद्ध दुनिया थी। यह कविता जन का जितना सम्मान करती थी, उतना ही जन भी इसका सम्मान करत थे। बाद के समय में इसका क्षरण हुआ। कुछ समय के लिए दुष्यंत और अदम जनता की आवाज़ बने पर एक की वास्तविक और दूसरे की रचनात्मक मृत्यु हो जाने से ये उनकी आहटें आना बन्द हो गयीं। हालाँकि विष्णु खरे, वीरेन डंगवाल, मंगलेश डबराल, असद ज़ैदी, देवीप्रसाद मिश्र, राजेश जोशी, मनमोहन वगैरह कई बड़े कवि अब भी परिदृश्य पर मौजूद हैं। नई पीढ़ी में जनवाद की खोज फ़िलहाल मैं न ही करूँ तो बेहतर होगा, क्योंकि अब जन का अर्थ बदल रहा है और कवि का भी।
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