Archive for the ‘पाती’ Category

देवताले जी को कुछ चिट्ठियाँ

23/12/2009

24.09.2005

हमारे बहुत प्यारे दादा जी,
                                             हमारा बहुत-बहुत प्यार,

जैसा कि तय था नए घर में आपकी चिट्ठी ही डाकिये को पहली बार मुझसे मिलाने लायी। आपके अक्षर अब भी मोती जैसे ही हैं। अब यह ज़रूरी तो नहीं कि मोती माला में व्यवस्थित ही रहें, वे बिखरे हुए भी सुन्दर लगते हैं।

यहाँ भी भारी बरसात है। जिसे उधर झड़ी लगना कहते हैं, उसे कुमाऊँनी में तौड़ा लगना कहते है। झड़ी से तौड़ा ज़्यादा शक्तिशाली होता है। नए घर में खूब जगह है। बाज़ार में होकर भी यह उससे बचा हुआ है। हिमालय उतना ही दिखता है। गौतम का प्रस्तावित स्कूल यहाँ से आधा कि0मी0 है। शायद 1 अक्टूबर से वह स्कूल जाएगा। मेरा कालेज अलबत्ता अब ढाई कि0मी0 हो गया है, पहले डेढ़ था।

अभी खूब झमाझम बरसात है। बाहर बंदरों का झुंड आसरा तलाशता हमारे बरामदे में आ धमका है। बंदरियों ने हाल में पैदा हुए बच्चों को कस के चिपटा रखा है। बड़े बंदर घुड़की दे रहे हैं। ख़ास कर एक जो मुखिया लगता है, मकानों के भीतर की ज़िन्दगी में ख़ासी दिलचस्पी रखता है। सीमा ने मेरी पसन्द का आटे का हलुआ बनाया है। उसकी गंध शायद बंदरों में भी कुछ खलबली मचा रही है। गौतम के लिए यह सारा कार्य-व्यापार जैसे उसके पसंदीदा ज्योग्राफिक चैनल का जीवन्त हिस्सा है। ऐसी बरसात और ऐसे माहौल में हमारा रानीखेत आपको मीठी नींद के लिए आमंत्रित करता है।

मैं कुछ देर पहले ही बाहर से आया हूँ। आज राष्ट्रीय सेवा योजना दिवस है और मेरी सलाह पर हमारी इकाई ने इसे स्थानीय अस्पताल में परिचर्या करते हुए मनाया है।

मेरा पिछला पत्र आपको अब मिल गया होगा….

दादी जी को हम सभी का प्रणाम।

 अनु जी से मेरे लिए उनकी कोई रिकार्डिंग माँगिएगा।

सादर आपका

शिरीष

***

27.10.2005

आदरणीय दादा जी तक हमारा प्यार पहुंचे,

आप आजकल व्यस्त होंगे। दिल्ली आवागमन जोरों पर होगा। आपको इस तरह कामकाजी देखना-सुनना अच्छा लगता है। मैं भी इधर शानी पर अपने शोध के अंतिम हिस्से पर हूँ। गो कि मुझे पी.एच-डी. करना रास नहीं आ रहा, फिर भी ……वेतनमान के चक्कर में पड़ गया हूँ। पी.एच-डी. धारियों से दो साल पिछड़ गया हूँ। वहाँ का तो पता नहीं पर हमारे इधर मैंने अपने सामने कम से कम दस स्त्री-पुरुषों को देखा है, जो पचास हज़ार के ठेके पर डॉक्टर कहलाने लगे – एकाध की नौकरी भी लग गई। फिर वीरेन दा ने समझाया कि बेटा ये नौकरी है, इसमें कवि होने भर से काम नहीं चलता, थोड़ी-बहुत घास भी छीलनी पड़ती है- इंक्रीमेंट और स्केल के घोड़े जो पालने हैं। बहरहाल मैं चिकित्सावकाश लेकर घास छील रहा हूँ। इस महीने के आख़िर तक `यह ले अपनी लकुटि-कमरिया` कहने की स्थिति में आ जाऊँगा।

वागर्थ वाली कविताएँ 23 से 29 जून के बीच लिखीं थीं फिर मामला ठप्प पड़ गया। कुछ भी लिखना नहीं हो पाया। आमीखाई वाली किताब के लिए छह पेज की सामग्री ज़रूर अनुवाद की, पर रचनात्मक कुछ भी नहीं। एक हफ्ते पहले परममित्र रमदा आए। दो दिन रहे। हमेशा की तरह दोनों ने मिलकर जंगलों की ख़ाक छानी। खोई ऊर्जा दुबारा लौटती लगी। जेब काटने वाली एक औरत पर कविता लिखी। इस हैरतअंगेज़ आपबीती को कई महीनों से भीतर छुपाए बैठा था। लिखकर अच्छा लगा। बाद में जिन बंदरों को लगातार निहार रहा था, उन पर एक लम्बी कविता हुई, जिसे मैंने तुलसी और निराला को समर्पित किया। हिमाचल से निकलने वाली एक पत्रिका `इरावती` में कुमार विकल पर मेरी एक कविता छपी है। आप तक न पहुँचे तो मैं छायाप्रति कर पहुँचाऊंगा।

सीमा ने हिमालय को खूब झाड़ा-पोंछा था। उसके श्रम का सम्मान करते हुए रोज़ कुछ देर अपलक उधर ही निहारता  हूँ। इधर बारिश नहीं होने के कारण घाटियों से उठती किंचित गर्म हवा ठंडी होकर पहाड़ों पर धुंध बना रही है। हिमालय अकसर अलक्षित हो जाता है। मैदानों में तो अब भी पंखे ही चल रहे होंगे। यहाँ दिन का तापमान 16 और रात का 8 से भी कम है। कुल मिलाकर मज़े हैं।

आपकी लिखा-पढ़ी कैसी चल रही है….

इधर तनाव के तीन अंक एक साथ आए हैं। सुरेश सलिल जी द्वारा किए गए आमीखाई के अनुवादों की घोषणा भी है- शायद अगला अंक यही होगा।

मैं इस बार शीतावकाश यहीं गुज़ारने के बारे में सोच रहा  हूँ। बेटा हिमपात देखना चाहता है। निकला भी तो 10 से 25 जनवरी के बीच निकलकर लौट भी आऊँगा। मैंने कई बार गिरती बर्फ का मंज़र देखा है। हिमपात के वक़्त बहुत शान्त और अपेक्षाकृत गर्म मौसम होता है। जाड़ा अगले रोज़ पड़ता है, जब बर्फ पिघलनी शुरू होती है। और उस पर पाला गिरता जाता है। रास्ते फिसलने लगते हैं – यातायात में तेज़ी आ जाती है। गिर पड़े तो हर गंगे भी नहीं कर सकते।

उम्मीद है जल्द ही आपका पत्र आएगा। दादी जी को मेरा और सीमा का प्रणाम देंगे। गौतम भी आपको याद करता है।

आपका

शिरीष

***

03.04.2006

प्रिय दादा जी,
                          बहुत-बहुत प्यार,

फोन पर अपनी बात हुई, पर जैसा कि आप कहते हैं आख़िरी बात हमेशा रह जाती है। इस आख़िरी बात को आप दुबारा, तिबारा…..जितनी बार भी कहना चाहें, यह रह ही जायेगी।

आपकी कविता पर हम बात कर रहे थे और आपने कहा कि मैं ओपेन हार्टेड नहीं बोल रहा हूँ। ऐसा कुछ नहीं था। मैं जिस ज़िद की बात कर रहा था, उसे शायद ठीक से कभी बता भी नहीं पाऊँगा। मेरे लिए यह कुछ इस तरह है। मंगलेश दा की कविता में एक कोमल काँपती हुई-सी ज़िद जगजाहिर है। वीरेन दा में यह खुराफ़ात की हद तक जा पहुँचती है और बाबा की याद दिलाती है। आपमें इस ज़िद के दो छोर हैं- एक छोर पर बाबा हैं और दूसरे पर मुक्तिबोध। मैं यहाँ प्रभाव की बात बिल्कुल नहीं कर रहा हूँ। जो मैं कह रहा हूँ पता नहीं कह भी पा रहा हूँ या नहीं… आपकी कविता मुझे तब बहुत अच्छी लगती है, जब इस ज़िद के दोनों छोर पकड़ में आ जाएँ। `सबसे ग़रीब आदमी` में दोनों छोर मेरी पकड़ में आते हैं, लेकिन `बुश` की कविता में सिर्फ एक छोर। हाँ, सबसे ग़रीब आदमी की भाषा में मेरे लिए कुछ दिक्कतें हैं, जैसे कि `गफ़लत में गाफ़िल` सरीखा प्रयोग! इन दिक्कतों को छोड़ हूँ तो पूरी कविता एक ऐसी आग और आवेग से भरी है, जो आपकी ही नहीं, युवतर पीढ़ी में भी दुर्लभ है। इस कविता के लिए आपको अलग से प्यार। पिपरियावाली कविता मेरे लिए वहाँ लौटने जैसी है- उस रेल्वे स्टेशन पर रात-बिरात तक बैठे रहना आज भी मेरा प्रिय शगल है।

यहाँ गर्मी आने में देर है। रह-रहकर बरसात हो जाती है और लोग स्वेटर पहनकर घूमने लगते हैं। कालेज में परीक्षा ज़ोर पर है। रोज़ाना दो ड्यूटी करके थक जाता हूँ। यह सिलसिला अप्रैल के आख़िर तक जायेगा। तब तक मेरे भीतर से मगज़ निकलकर उसकी जगह भूसा भर जायेगा। होने को भूसा अब भी कम नहीं है – राह में मिलनेवाले गाय-बैल अकसर मेरे पीछे-पीछे आने लगते हैं! आपका क्या ख़याल है….

जैसी मंगलेश दा की ज़िद है वैसी दादी जी की स्नेहभरी आवाज़, उन्हें मेरा प्रणाम। उत्कृष्ट महाविद्यालय की मैडम को बाअदब सलाम। लूसी-टिग्रेस-ब्लैकी को प्यार…… लूसी को कम….. ब्लैकी को ज़्यादा।

शिरीष

***

17.07.2006
बहुत प्यारे दादा जी,

आप रंगून से लौट रहे होंगे। मैंने दादी जी को फोन पर पूछा था कि आपके रंगून जाने से उन्हें एक पुराना गीत याद आता है कि नहीं…. मैं तो रंगून ही कहूँगा – यांगून नहीं। मेरे भीतर की कोई छवि टूटती है। पूरा विश्वास है वहाँ सब बढ़िया रहा होगा। मज्जे किए होंगे। राशन 60 ही रक्खा होगा, ज़्यादा नहीं! एक अच्छी यात्रा थकाने की बजाए आदमी को आगे के लिए स्फूर्ति देती है। आप भी ऐसे ही लौटे होंगे। आज दो-एक चिट्ठियाँ मजबूरी में लिखनी पड़ीं तो दिल ने कहा जहाँ लिखना चाहता है वहाँ भी लिख। इसलिए ये चिट्ठी, बस यूँ ही……..

इधर पहाड़ों पर झमाझम बरसात उमड़ आयी है। गाड़-गधेरे उफन रहे हैं। बरसात में पहाड़ी ढलान से जो प्राकृतिक नाले नीचे की ओर बह चलते हैं, उन्हें गधेरा कहते हैं और जगह-जगह गधेरों के मिलने-जुड़ने से दो पहाड़ों बीच जो स्थायी जलधारा बन जाती है, उसे गाड़ कहते हैं। यहाँ बादल आकाश से ही नहीं बरसते, कभी-कभी घर में घुसकर भी सब चीज़ों को नम कर जाते हैं। पहाड़ों में ऐसी आत्मीय गतिविधियों से नम होने जाने वाली चीज़ों में मेरी आँखें तो हमेशा ही शामिल हैं। बरसात मेरे बचपन का मौसम है। पहाड़ों में सड़कें टूटने का मौसम। असली बरसात गाँवों में होती है। रानीखेत तो शहर है, यहाँ वो मज़ा नहीं। मुझे मेरा पहाड़ी गाँव याद आता है, जहाँ बरसात रुकते ही हमें घर तक आते कच्चे रास्ते सुधारने पड़ते थे। अकसर छत पर लगे सलेटी पत्थरों की मरम्मत भी करनी होती थी। रास्तों से फिसलने वाले पत्थर निकालकर हम नए खुरदुरे पत्थर लगाते और निकाले हुए चिकने पत्थरों को किनारे-किनारे गाड़ कर बाड़-सी बना देते थे। इस मेहनत के बाद ताई के हाथों की गर्मागर्म चाय गुड़ के टुकड़े के साथ। गायें जंगल न जा पाने के कारण रम्भाती रहतीं, हालाँकि घास उन्हें भरपूर मिलती थी। वे छोटी-छोटी पहाड़ी गायें ढलानों पर कुलाँचे मारने की आदी होती थीं, जिनके साथ दौड़ना हम बच्चों को बहुत भाता था।

………दुनिया अब भी सुन्दर है दादा जी, है ना….

आप अपनी यात्रा के अनुभव सुनाइएगा। मैं आठ बरस पहले एक बार बदहवास-सा ईटानगर तक गया हूँ – वहाँ के लोक सेवा आयोग में नौकरी का साक्षात्कार देने।

पूरब आपको ज़रूर भाया होगा…

दादी जी और मैडम को प्रणाम। लूसी-टिग्रेस-ब्लैकी को प्यार।

आपका……..

शिरीष

***

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