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दादी की चिट्ठियाँ

25/02/2010

चौदह बरस पहले गुज़र गईं दादी
मैं तब बीस का भी नहीं था

दादी बहुत पढ़ी-लिखी थीं
और सब लोग उनका लोहा मानते थे
मोपांसा चेखव गोर्की तालस्ताय लू-शुन तक को
पढ़ रखा था उन्होंने
और हम तब तक बस ईदगाह और पंच-परमेश्वर ही
जानते थे

मैं और मां सुदूर उत्तर के पहाड़ों पर रहते थे
नौकरी करने गए पिता के साथ
दादी मध्य प्रदेश में पुश्तैनी घर सम्भालती थीं

आस-पड़ोस में काफी सम्मान था
उनका
वह शासकीय कन्या शाला की रौबदार प्रधानाध्यापिका थीं

वह जब भी अकेलापन महसूस करतीं
हमें चिट्ठी लिखतीं
यों महीने में तीन या चार तो आ ही जाती थीं उनकी चिट्ठियाँ

इनमें बातों का ख़जाना होता था
मैं बहुत छोटा था तो भी पिता के साथ-साथ
आख़िर में
मेरे नाम अलग से लिखी होती थीं कुछ पंक्तियां
बाद में इसका उल्टा होने लगा
मुझ अकेले के नाम आने लगीं
उनकी सारी चिट्ठियाँ
जिनके अन्त में बेटा-बहू को मेरी याद दिलाना लिखा होता था

तब फ़ोन का चलन इतना नहीं था
और पूरा भाव-संसार चिट्ठियों पर ही टिका था

चिट्ठियाँ अपने साथ
गंध और स्पर्श ही नहीं आवाज़ें भी लाती थीं
मैंने अकसर देखा था
कोना कटे पोस्टकार्ड में चुपचाप आने वाली चिट्ठी ही
सबसे ज़्यादा शोर मचाती थी

दादी हमेशा
अन्तर्देशीय इस्तेमाल करती थीं
जो खूब खुले नीले आसमान-सा लगता था
उसमें उड़ती चली आती थीं
दादी की इच्छाएं
दादी का प्यार

कभी-कभार इस आसमान में बादल भी घिरते थे
दूर दादी के मन में आशंका की
बिजलियाँ कड़कती थीं
उनका हृदय भय और हताशा से कांपता था
ऐसे में अकसर साफ़ नीले अन्तर्देशीय पर कहीं-कहीं
बूँद सरीखे कुछ धब्बे मिलते थे

एक वृद्ध होती स्त्री क्या सोचती है अपने बच्चों के बारे में
जो उससे अलग
अपना एक संसार बना लेते हैं?

दादी कहती थीं – सबसे भाग्यशाली और सफल होते हैं
वे वृक्ष
जो अपने बीजों को पनपने के लिए कहीं दूर उड़ा देते हैं

दादी भी सफल और भाग्यशाली कहलाना चाहती थीं
लेकिन वो पेड़ नहीं थी
उन्हें अपने से दूर हुए एक-एक बीज की परवाह थी

हम उनसे मिल नहीं पाते थे
कभी दो-तीन साल में घर जाते थे
वह हमारे हिस्से के कई सुख
संजोये रखती थीं
मनका-मनका फेरती अपने भीतर की टूटती माला को
किसी तरह पिरोये रखती थीं

हम छुट्टियाँ मनाने जाते थे वहां
शायद इसीलिए
पिता से वह कभी कोई जिम्मेदारी सम्भालने-निभाने की
बात नहीं करती थीं

मैं दादी को उनकी चिट्ठियों से जानता था
कभी साथ नहीं रहा था उनके
और
छुट्टियों में साथ रहने पर भी उनकी चिट्ठियों के न मिलने का
अहसास होता था
बहुत अजीब बात थी कि मैं साथ रहते हुए भी अकसर उनसे
चिट्ठी लिखने को कहता था

अच्छा तो मुझसे मेरी चिट्ठियाँ
अधिक प्यारी हैं तुझे – कह कर हमेशा वह मुझे
झिड़क देती थीं
तब मैं घरेलू हिसाब की कॉपियों में उनके लिखे
गोल-गोल अक्षर देखता था
वह कहतीं अब मैं तुम्हारे पास ही आ जाऊंगी रहने
बस तेरे चाचाओं का ब्याह कर दूँ !
तू भी पढ़-लिखकर दूर कहीं नौकरी पर चला जाएगा
फिर मैं तेरे पापा के घर से तुझे
चिट्ठियाँ लिक्खूंगी!

तब मैं इस बारे में सोचने के लिए बहुत छोटा था

चौदह बरस पहले अचानक वह गुज़र गईं
छाती पर पनप आयीं कैंसर की भयानक गांठों को छुपातीं
भीतर-भीतर छटपटातीं

लेकिन
उनके भीतर का वह संसार मानो अब भी नुमाया है
अकसर ही पूछता है पांच बरस का मेरा बेटा
उनके बारे में
अभी अक्षर-अक्षर जोड़ कर उसे पढ़ना आया है

आज एक सपने की तरह देखता हूँ मैं पुराने बस्ते में रखी उनकी चिट्ठियों को
वह गहरी उत्सुकता से साथ टटोलता है

यह भी उनके न रहने जितना ही सच है
कि बरसों बाद एक बच्चा
हमारे जीवन के विद्रूपों से घिरी उस नाजुक-सी दुनिया को
अपने उतने ही नाजुक हाथों में
फिर से
बरसों तक सम्भालने के लिए
खोलता है!
2006

रुलाई

02/02/2010

 

मुझे नहीं पता मैं पहली बार
कब रोया था
हालांकि मुझे बताया गया कि पैदा होने के बाद भी
मैं खुद नहीं रोया
बल्कि नर्स द्वारा च्यूंटी काटकर रुलाया गया था
ताकि भरपूर जा सके ऑक्सीजन पहली बार हवा का स्वाद चख रहे
मेरे फेफड़ों तक

मुझे अकसर लगता है कि मैं शायद पहली बार रोया होऊंगा
मां के गर्भ के भीतर ही
जैसे समुद्रों में मछलियां रोती हैं
चुपचाप
उनके अथाह पानी में अपने आंसुओं का
थोड़ा-सा नमक मिलाती हुई

हो सकता है
उनके और दूसरे तमाम जलचरों के रोने से ही
खारे हो गए हों समुद्र

मैं भी ज़रूर ऐसे ही रोया होऊंगा
क्षण भर को अपने अजन्मे हाथ-पांव हिलाकर
बाहर की दुनिया की तलाश में
और मेरे रोने से कुछ तो खारा हो ही गया होगा
मेरे चारों ओर का जीवन-द्रव

मुझे नहीं मालूम कि मां ने कैसा अनुभव किया होगा और इस अतिरिक्त खारेपन से
उसे क्या नुकसान हुआ होगा ?

उस वक्त
वह भी शायद रोयी हो नींद में अनायास ही
बिसूरती हुई
सपना देख रही है कोई दुख भरा – शायद सोचा हो पिता ने
सोते में उसका इस तरह रोना सुनकर

जहां तक मुझे याद है
मैं कभी नहीं रोता था खुद-ब-खुद फूटती
कोई अपनी
निहायत ही निजी रुलाई

मुझे तो रुलाया जाता था
हर बार
कचोट-कचोट कर

बचपन में मैं रोता था चोट लगने या किसी के पीटने पर
और चार साल की उम्र में एक बार तो मैं रोते-रोते बुखार का शिकार भी हुआ
जीवन में अपनी किसी आसन्न हार से घबराए
पिता द्वारा पीटे जाने पर
तब भी मां बहुत रोयी थी
रोती ही रही कई दिन मेरे सिरहाने बैठी
पीटने वाले पिता भी रोये होंगे ज़रूर
बाद में काम की मेज़ पर बैठ
पछताते
दिखाते खुद को
झूटमूट के
किसी काम में व्यस्त

मेरे बड़े होने साथ-साथ ही बदलते गए
मेरे रोने के कारण
महज शारीरिक से नितान्त मानसिक होते हुए

हाई स्कूल में रोया एक बार
जब किसी निजी खुन्नस के कारण
आन गांव के
चार लड़कों ने पकड़ा मुझे ज़बरदस्ती
और फिर उनमें से एक ने तो मूत ही दिया मेरे ऊपर धार बांधकर
गालियां बकते हुए

क्रोध और प्रतिहिंसा में जलता हुआ धरा गया मैं भी अगले ही दिन
लात मार कर उसके अंडकोष फोड़ देने के
जघन्यतम अपराध में
मुरगा बन दंडित हुआ स्कूल छूटते समय की प्रार्थना-सभा के दौरान
और फिर उसी हालत में
मेरे पिछवाड़े पर
जमाई हीरा सिंह मास्साब ने
अपनी कुख्यात छड़ी
गिनकर
दस बार

दिल्ली के किसी बड़े अस्पताल में
महीनों चलता रहा
उस लड़के का इलाज

इस घटना के एक अजीब-से एहसास में
आने वाली कितनी ही रातों तक रोया मैं एक नहीं कई-कई बार
घरवालों से अकारण ही छुपता हुआ
रजाई के भीतर घुट कर रह गई मेरी वह पहली बदली हुई रुलाई

जीवन में ये मेरे अपने आप रोने की
पहली घटना थी
जितनी अप्रत्याशित लगभग उतनी ही तय भी

मैंने देखा था अकसर ही विदा होते समय रोती थीं घरों की औरतें भी
लेकिन किसी बहुत खुली चीख या फिर किसी गूढ़ गीत जैसा होता था उनका यह रोना
और मैंने इसे हमेशा ही रुलाई मानने से
इनकार किया

कुछ और बड़ा हुआ मैं तो
आया एक और एहसास जीवन में लाया खुशियां अनदेखी कई-कई
जिनमें बहुत आगे कहीं एक अजन्मा शिशु भी था
और जिस दिन उस लड़की ने स्वीकार किया मेरा प्यार
तो मैंने देखा हंसते हुए चेहरे के साथ वह रो भी रही थी
धार-धार
उन आंसुओं को पोंछने के लिए बढ़ाया हाथ तो उसने भी मेरे गालों से
कुछ पोंछा
मैं थोड़ा शर्मिन्दा हुआ खुद भी इस तरह खुलेआम रो पड़ने पर
बाद में जाना कि दरअसल वह तो तरल था
मेरे हृदय का
इस दुनिया में मेरे होने का सबसे पुख्ता सबूत
जो निकल पड़ा बाहर
उसे भी एक सही राह की तलाश थी मुद्दत से
जब उसने मेरी आंखों का रुख लिया

फिर आए – फिर फिर आए दु:ख अपार
कई लोग विदा हो गए मेरे संसार से बहुत चुपचाप
कईयों ने छोड़ दिया साथ
कईयों ने किए षड़यंत्र भी
मेरे खिलाफ
मैं कई-कई बार हारा
तब जाकर जीता कभी-कभार
लेकिन बजाए हार के
अपनी जीत पर ही रोया मैं हर बार

बहुत समय नहीं गुज़रा है
अभी हाल तक मैं रो लेता था प्रेयसी से पत्नी बनी उस लड़की के आगे भी खुलकर
बिना शर्माए
पर अब निकलते नहीं आंसू
उन्हें झुलसा चुकी शायद समय की सैकड़ों डिग्री फारेनहाइट आग

होने को तो
विलाप ही विलाप है जीवन
पर वो तरल – हृदय का खो गया है कहीं
डरता हूं
कहीं हमेशा के लिए तो नहीं ?

रात-रात भर अंधेरे में आंखें गड़ाए खोजता हूं उसी को
भीतर ही भीतर भटकता दर-ब-दर
अपने हिस्से की पूरी दुनिया में
उन बहुत सारी चीज़ों के साथ
जो अब नहीं रही

चाहता हूं
वैसी ही हो मेरी अन्तिम रुलाई भी
जैसे रोया था मां के गर्भ में पहली बार

मुझे एक बार फिर ढेर सारे अंधेरे और एक गुमनाम तलघर से बाहर
किसी बहुत जीवन्त
और रोशन दुनिया की तलाश है

अब तो मेरे भीतर नमक भी है ढेर सारा
मेहनत-मशक्कत से कमाया
लेकिन कोई हिलता-डुलता जीवन-द्रव नहीं मेरे आसपास
कर सकूं जिसे खारा
रो-रोकर

और इस लम्बी और अटपटी एक कोशिश के बाद तो
स्वीकार करूंगा यह भी
कि मेरी रुलाई कोई कविता भी नहीं
आखिर तक
लिखता रह सकूं जिसे मैं महज
कवि होकर।
***


“नींद की गोली” और एक खुफ़िया “एकालाप”

18/01/2010

दो कविताएँ

नींद की गोली

न जाने किस पदार्थ
किस रसायन
और किस विश्वास के साथ बनी है ये
कि इसे खाने पर
कुछ ही देर बाद
सफ़ेद जलहीन बादलों की तरह झूटा दिलासा लिए
तैरती आती है नींद

लेकिन जारी रहता है दुनिया का सुनाई पड़ना
आसपास होती हरक़तों का महसूस होना जारी रहता है

वह शायद नींद नहीं
नींद का विचार होता है
जो आता है
बरसों-बरस पीछा करता हुआ जीवन के पहले
चलचित्र की तरह
गुज़रे वक़्तों के श्वेत-श्याम दृश्यों
चरित्रों
और ग़ुबार से भरा

मेरे नन्हे बेटे के हाथ मुझे टटोलते हैं
वह पुकारता है पूरी ताक़त से
मेरी इस उचाट नींद में अपना मुंह डाल
पर मैं उसे जवाब नहीं दे पाता
मेरे चेहरे पर जमने लगती है
उसके होने की
बेहद सुखद
गुनगुनी
और नमकीन भाप

राह चलते
मुझे बुलाता है कोई
बार-बार
वह मेरी पत्नी है शायद
खड़ी
शादी से पहले की बारह बरस पुरानी एक सड़क पर
और हमारे बीच से
गुज़रती जाती है गाड़ियां
बेशुमार

मैं उस ओर अपने क़दम उठाना चाहता हूँ
पर उठा नहीं पाता
मैं हाथ हिलाना और जताना चाहता हूँ
अपना वजूद
खड़ा
बारह बरस बाद की वैसी ही एक दूसरी सड़क पर
इस पार
पर जता नहीं पाता

ये कैसी दवा है कमबख़्त
नींद की
कि मैं जगाना चाहता हूँ मुझे
तो जगा नहीं पाता

सो भी नहीं पाता
मगर
बन्द पलकों के नीचे इतनी हलचलों से भरी
अपनी ईजाद की हुई ये
सबसे नई
जागती हुई नींद!
2007
***

एकालाप

तुम भूलने लगे हो
कि कितने लोगों चीज़ों और हलचलों से भरी है दुनिया
उम्र अभी चौंतीस ही है तुम्हारी
बावजूद इसके तुम व्यस्त रहने लगे हो अक्सर
किसी खुफ़िया एकालाप में

लगता है तुम दुनिया में नहीं
किसी रंगमंच पर हो
और कुछ ही देर में शुरू होने वाला है तुम्हारा अभिनय
जिसमें कोई दूसरा पात्र नहीं है
और न ही ज़्यादा संवाद

पता नहीं अपनी उस विशिष्ट अकुलाहट भरी भारी भरभराती आवाज़ में
त्रासदी अदा करोगे तुम या करोगे कोई प्रहसन

तुम्हारे भीतर एक जाल है
धमनियों और शिराओं का
और वे भी अब भूलने लगी हैं तुम्हारे दिमाग तक रक्त पहुंचाना
इसलिए तुम कभी बेहद उत्तेजित
तो कभी गहरे अवसाद में रहते हो

तुम भूल गए हो कि कितना वेतन मिलता है तुम्हें
और उसके बदले कितना किया जाना चाहिए काम

तुम्हें लगता है वापस लौट गए हो
बारह बरस पहले की अपनी उसी गर्म और उमस भरी उर्वर दुनिया में
जहाँ कभी इस छोर से उस छोर तक
नौकरी खोजते भटका करते थे तुम

सपने में दिखती छायाओं -से
अब तुम्हें दिखने लगे हैं अपने जन
किसी तरह रोटी कमाते
काम पर जाते
भीतर ही भीतर रोते- सुलगते
किसी बड़े समर की तैयारी में जीवन की कई छोटी-छोटी लड़ाईयां हार जाते
वे अपने जन जिनसे
तुम दूर होते जा रहे थे
लफ्ज़-दर-लफ्ज़

कहो कैसे हो शिरीष अब तो कहो ?
जबकि भूला हुआ है वह सभी कुछ जिसे तुम भूल जाना चाहते थे
अपने होशो -हवास में

अब अगर तुम अपने भीतर के द्वार खटखटाओ
तो तुम्हें सुनाई देगी
सबसे बुरे समय की मुसलसल पास आती पदचाप

अब तुम्हारा बोलना
कहीं ज़्यादा अर्थपूर्ण और
मंतव्यों भरा होगा !
2007

***

बनारस से निकला हुआ आदमी

25/12/2009

जनवरी की उफनती पूरबी धुंध
और गंगातट से अनवरत उठते उस थोड़े से धुँए के बीच
मैं आया इस शहर में
जहाँ आने का मुझे बरसों से
इन्तज़ार था

किसी भी दूसरे बड़े शहर की तरह
यहाँ भी
बहुत तेज़ भागती थी सड़कें
लेकिन रिक्शों, टैम्पू या मोटरसाइकिल-स्कूटरवालों में
बवाल हो जाने पर
रह-रहकर
रुकने-थमने भी लगती थी

मुझे जाना था लंका और उससे भी आगे
सामने घाट
महेशनगर पश्चिम तक

मैं पहली बार शहर आए
किसी गँवई किसान-सा निहारता था
चीज़ों को
अलबत्ता मैंने देखे थे कई शहर
किसान भी कभी नहीं था
और रहा गँवई होना –
तो उसके बारे में खुद ही बता पाना
कतई मुमकिन नहीं
किसी भी कवि के लिए

स्टेशन छोड़ते ही यह शुरू हो जाता था
जिसे हम बनारस कहते हैं
बहुत प्राचीन-सी दिखती कुछ इमारतों के बीच
अचानक ही
निकल आती थी
रिलायंस वेब वल्र्ड जैसी कोई अपरिचित परालौकिक दुनिया

मैंने नहीं पढ़े थे शास्त्र
लेकिन उनकी बहुश्रुत धारणा के मुताबिक
यह शहर पहले ही
परलोक की राह पर था
जिसे सुधारने न जाने कहाँ से भटकते आते थे साधू-सन्यासी
औरतें रोती-कलपती
अपना वैधव्य काटने
बाद में विदेशी भी आने लगे बेहिसाब
इस लोक के सीमान्त पर बसे
अपनी तरह के एक अकेले अलबेले शहर को जानने

लेकिन
मैं इसलिए नहीं आया था यहाँ
मुझे कुछ लोगों से मिलना था
देखनी थीं
कुछ जगहें भी
लेकिन मुक्ति के लिए नहीं
बँध जाने के लिए
खोजनी थीं कुछ राहें
बचपन की
बरसों की ओट में छुपी
भूली-बिसरी गलियों में कहीं
कोई दुनिया थी
जो अब तलक मेरी थी

नानूकानू बाबा की मढ़िया
और उसके तले
मंत्र से कोयल को मार गिराते एक तांत्रिक की
धुंधली-सी याद भी
रास्तों पर उठते कोलाहल से कम नहीं थी

पता नहीं क्या कहेंगे इसे
पर पहुँचते ही जाना था हरिश्चंद्र घाट
मेरे काँधों पर अपनी दादी के बाद
यह दूसरी देह
वाचस्पति जी की माँ की थी
बहुत हल्की
बहुत कोमल
वह शायद भीतर का संताप था
जो पड़ता था भारी
दिल में उठती कोई मसोस

घाट पर सर्वत्र मँडराते थे
डोम
शास्त्रों की दुहाई देते एक व्यक्ति से
पैसों के लिए झगड़ते हुए कहा उनमें से एक काले-मलंग ने –
`किसी हरिश्चंद्र के बाप का नहीं
कल्लू डोम का है ये घाट !´

उनके बालक लम्बे और रूखे बालों वाले
जैसे पुराणों से निकलकर उड़ाते पतंग
और लपकने को उन्हें
उलाँघते चले जाते
तुरन्त की बुझी चिताओं को भी
                     आसमान में धुँए और गंध के साथ
                     उनका यह
                     अलिखित उत्साह भी था

पानी बहुत मैला लगभग मरी हुई गंगा का
उसमें भी
गुड़प-गुड़प डुबकी लगाते कछुए
जिनके लिए फेंका जाता शव का कोई एक अधजला हिस्सा

शवयात्रा के अगुआ डॉ0 गया सिंह पर नहीं चलता था रौब
किसी भी डोम का
कीनाराम सम्प्रदाय के वे कुशल अध्येता
गालियों से नवाज़ते उन्हें लगभग समाधिष्ठ से थे

लगातार आते अंग्रेज़ तरह-तरह के कैमरे सम्भाले
देखते हिन्दुओं के इस आख़िरी सलाम को
उनकी औरतें भी
लगभग नंगी
जिन्हें इस अवस्था में अपने बीच पाकर
किशोर और युवतर डोमों की जाँघों में रह-रहकर
एक हर्षपूर्ण खुजली-सी उठती थी
खुजाते उसे वे
अचिम्भत से लुंगी में हाथ डाल टकटकी बाँधे
मानो आँखो ही आँखों में कहते
उनसे –
हमारी मजबूरी है यह कृपया इस कार्य-व्यापार का
कोई अनुचित या अश्लील अर्थ न लगाएँ
˜˜˜
गहराती शाम में आए काशीनाथ जी
शोकमग्न
घाट पर उन्हें पा घुटने छूने को लपके बी.एच.यू. के
दो नौजवान प्राध्यापक
जिन्हें अपने निकटतम भावबोध में अगल-बगल लिए
वे एक बैंच पर विराजे
`यह शिरीष आया है रानीखेत से´ – कहा वाचस्पति जी ने
पर शायद
दूर से आए किसी भी व्यक्ति से मिल पाने की
फ़ुर्सत ही नहीं थी उनके पास उस शाम
एक बार मेरी तरफ अपनी आँखें चमका
वे पुन: कर्म में लीन हुए
                        मैं निहारने लगा गंगा के उस पार
                        रेती पर कंडे सुलगाए खाना पकाता था कोई
                        इस तरफ लगातार जल रहे शवों से
                        बेपरवाह

रात हम लौटे अस्सी-भदैनी से गुज़रते
और हमने पोई के यहाँ चाय पीना तय किया
लेकिन कुछ देर पहले तक
वह भी हमारे साथ घाट पर ही था
और अभी खोल नहीं पाया था अपनी दुकान

पोई – उसी केदार का बेटा
बरसों रहा जिसका रिश्ता राजनीति और साहित्य के संसार से
सुना कई बरस पहले
गरबीली ग़रीबी के दौरान नामवर जी के कुर्ते की जेब में
अकसर ही कुछ पैसे डाल दिया करता था

रात चढ़ी चली आती थी
बहुत रोशन
लेकिन बेतरतीब-सा दीखता था लंका
सबसे ज़्यादा चहल-पहल शाकाहारी भोजनालयों में थी

चौराहे पर खड़ी मूर्ति मालवीय जी की
गुज़रे बरसों की गर्द से ढँकी
उसी के पास एक ठेला
तली हुई मछली-मुर्गे-अंडे इत्यादि के सुस्वादु भार से शोभित
जहाँ लड़खड़ाते कदम बढ़ते कुछ नौजवान
ठीक सामने – विराट द्वार `काशी हिन्दू विश्वविद्यालय´ का
˜˜˜
अजीब थी आधी रात की नीरवता
घर से कुछ दूर
गंगा में डुबकी लगातीं शिशुमार

मछलियाँ सोतीं एक सावधान डूबती-उतराती नींद
तल पर पाँव टिकाए पड़े हों शायद कछुए भी
शहर नदी की तलछट में भी
कहीं साफ़ चमकता था

तब भी हमारी पलकों के भीतर नींद से ज़्यादा धुँआ था
फेफड़ों में हवा से ज़्यादा एक गंध

बहुत ज़ोर से साँस भी नहीं ले सकते थे हम
अभी इस घर से कोई गया था
अभी इस घर में उसके जाने से अधिक
उसके होने का अहसास था
रसोई में पड़े बर्तनों के बीच शायद कुलबुला रहे थे चूहे
खाना नहीं पका था इस रात
और उनका उपवास था
˜˜˜
सुबह आयी तो जैसे सब कुछ धोते हुए
क्या इसी को कहते हैं
सुबहे-बनारस…
क्या रोज़ यह आती है ऐसे ही…
गंगा के पानी से उठती भाप
बदलती हुई घने कुहरे में
कहीं से भटकता आता आरती का स्वर

कुछ भैंसें बहुत गदराए काले शरीर वाली
धीरे से पैठ जातीं
सुबह 6 बजे के शीतल पानी में
हले! हले! करते पुकारते उन्हें उनके ग्वाले
कुछ सूअर भी गली के कीच में लोट लगाते
छोड़ते थूथन से अपनी
गजब उसाँसे
जो बिल्कुल हमारे मुँह से निकलती भाप सरीखी ही
दिखती थीं
साइकिल पर जाते बलराज पांडे रीडर हिन्दी बी.एच.यू.
सड़क के पास अचानक ही दिखता
किसी अचरज-सा एक पेड़ बादाम का

एक बच्चा लपकता जाता लेने
कुरकुरी जलेबी
एक लौटता चाशनी से तर पौलीथीन लटकाए
अभी पान का वक़्त नहीं पर
दुकान साफ़ कर अगरबत्ती जलाने में लीन
झबराई मूँछोंवाला दुकानदार भी

यह धरती पर भोर का उतरना है
इस तरह कि बहुत हल्के से हट जाए चादर रात की
उतारकर जिसे
रखते तहाए
चले जाते हैं पीढ़ी दर पीढ़ी
बनारस के आदमी

अभी धुंध हटेगी
और राह पर आते-जातों की भरमार होगी
अभी खुलेंगे स्कूल
चलते चले जायेंगे रिक्शे ढेर के ढेर बच्चों को लाद
अभी गुज़रेंगे माफियाओं के ट्रक रेता-रोड़ी गिराते
जिनके पहियों से उछलकर थाम ही लेगा
हर किसी का दामन
गड्ढों में भरा गंदला पानी
अभी एक मिस्त्री की साइकिल गुज़रेगी
जो जाता होगा कहीं कुछ बचाने – बनाने को
अभी गुज़रेगी ज़बरे की कार भी
हूटर और बत्ती से सजी
ललकारती सारे शहर को एक अजब-सी
मदभरी अश्लील आवाज़ में

इन राहों पर दुनिया चलती है
ज़रूर चलते होंगे कहीं इसे बचाने वाले भी
कुछ ही देर पहले वे उठे होंगे एक उचाट नींद से
कुछ ही देर पहले उन्होंने अपने कुनमुनाते हुए बच्चों के
मुँह देखे होंगे
अभी उनके जीवन में प्रेम उतरा होगा
अभी वे दिन भर के कामों का ब्यौरा तैयार करेंगे
और चल देंगे
कोई नहीं जानता कि उनके कदम किस तरफ़ बढ़ेंगे
लौटेंगे रोज़ ही की तरह पिटे हुए
या फिर चुपके से कहीं कोई एक हिसाब
बराबर कर देंगे

अभी तो उमड़ता ही जाता है यह मानुष-प्रवाह
जिसमें
अगर छुपा है हलाहल जीवन का
तो कहीं थोड़ा-सा अमृत भी है
जिसकी एक बूँद अभी उस बच्चे की आँखों में चमकी थी
जो अपना बस्ता उतार
रिक्शा चलाने की नाकाम कोशिश में था
दूसरी भी थी वहीं रिक्शेवाले की पनियाली आँखों में
जो स्नेह से झिड़कता कहता था उसे – `हटो बाबू साहेब
यह तुम्हारा काम नहीं!´
˜˜˜
बहुत शान्त दीखते थे बी.एच.यू. के रास्ते
टहलते निकलते लड़के-लड़कियाँ
`मैत्री´ के आगे खड़े
चंदन पांडे, मयंक चतुर्वेदी और श्रीकान्त
मेरे इन्तज़ार में
उनसे गले मिलते
अचानक लगा मुझे इसी गिरोह की तो तलाश थी
अजीब-सी भंगिमाओं से लैस हिन्दी के हमलावरों के बीच
कितना अच्छा था
कि इन छात्रों में से किसी की भी पढ़ाई में
हिन्दी शामिल नहीं थी

ज़िन्दगी की कहानियाँ लिखते
वे सपनों से भरे थे और हक़ीक़त से वाकिफ़
मैं अपनी ही दस बरस पुरानी शक्ल देखता था उनमें
हम लंका की सड़क पर घूमते थे
यूनीवर्सल में किताबें टटोलते
आनी वाली दुनिया में अपने वजूद की सम्भावनाओं से भरे
हम जैसे और भी कई होंगे
जो घूमते होंगे किन्हीं दूसरी राहों पर
मिलेंगे एक दिन वे भी यों ही अचानक
वक्त के परदे से निकलकर
ये
वो
और हम सब दोस्त बनेंगे
अपनी दुनिया अपने हिसाब से रचेंगे

फिलहाल तो धूल थी और धूप हमारे बीच
और हम बढ़ चले थे अपनी जुदा राहों पर
एक ही जगह जाने को
साथ थे पिता की उम्र के वाचस्पति जी
जिन्हें मैं चाचा कहता हूँ
बुरा वक़्त देख चुकने के बावजूद
उनकी आँखों में वही सपना बेहतर ज़िन्दगी का
और जोश हमसे भी ज़्यादा
साहित्य, सँस्कृति और विचार के स्वघोषित आकाओं के बरअक्स
उनके भीतर उमड़ता एक सच्चा संसार
                       जिसमें दीखते नागार्जुन, शमशेर, त्रिलोचन, धूमिल और केदार
                       और उनके साथ
                       कहीं-कहीं हमारे भी अक्स दुविधाओं में घिरे राह तलाशते
                       किसी बड़े का हाथ पकड़ घर से निकलते
                       और लौटते
˜˜˜
हम पैदल भटकते थे – वाचस्पति जी और मैं
जाना था लोहटिया
जहाँ मेरे बचपन का स्कूल था
याद आती थीं प्रधानाध्यापिका मैडम शकुन्तला शुक्ल
उनका छह महीने का बच्चा
रोता नींद से जागकर गुँजाता हुआ सारी कक्षाओं को
व्योमेश
जो अब युवा आलोचक, कवि और रंगकर्मी बना

एक छोटी सड़क से निकलते हुए वाचस्पति जी ने कहा –
यहाँ कभी प्रेमचन्द रहते थे
थोड़ा आगे बड़ा गणेश
गाड़ियों की आवाजाही से बजबजाती सड़क
धुँए और शोर से भरी
इसी सब के बीच से मिली राह
और एक गली के अखीर में वही – बिलकुल वही इमारत
स्कूल की
और यह जीवन में पहली बार था
जब छुट्टी की घंटी बज चुकने के बाद के सन्नाटे में
मैं जा रहा था वहाँ
वहाँ मेरे बचपन की सीट थी सत्ताइस साल बाद भी बची हुई
ज्यों की त्यों
अब उस पर कोई और बैठता था
मेरे लिए वह लकड़ी नहीं एक समूचा समय था
धड़कता हुआ मेरी हथेलियों के नीचे
जिसमें एक बच्चे का पूरा वजूद था
ब्लैकबोर्ड पर छूट गया था उस दिन का सबक
जिसके आगे इतने बरस बाद भी मैं लगभग बेबस था

बदल गयी मेरी ज़िन्दगी
लेकिन बनारस ने अब तलक कुछ भी नहीं बदला था
यह वहीं था सत्ताइस बरस पहले
खोलता हुआ दुनिया को बहुत सम्भालकर मेरे आगे
˜˜˜
गाड़ी खुलने को थी – बुन्देलखण्ड एक्सप्रेस जाती पूरब से
दूर ग्वालियर की तरफ
याद आते थे कल शाम इसी स्टेशन के पुल पर खड़े
कवि ज्ञानेन्द्रपति
देखते अपने में गुम न जाने क्या-क्या
गुज़रता जाता था एक सैलाब
बैग-अटैची बक्सा-पेटी
गठरी-गुदड़ी लिए कई-कई तरह के मुसाफ़िरों का
मेरी निगाह लौटने वालों पर थी
वे अलग ही दिखते थे जाने वालों से
उनके चेहरे पर थकान से अधिक चमक नज़र आती थी
वे दिल्ली और पंजाब से आते थे
महीनों की कमाई लिए
कुछ अभिजन भी अपनी सार्वभौमिक मुद्रा से लैस
जो एक निगाह देख भर लेने से शक करते थे
छोड़ने आए वाचस्पति जी की आँखों में अचानक पढ़ा मैंने – विदाई!
अब मुझे चले जाना था सीटी बजाती इसी गाड़ी में
जो मेरे सामने खड़ी थी
भारतीय रेल का सबसे प्रामाणिक संस्करण

प्लेटफार्म भरा हुआ आने-जाने और उनसे भी ज़्यादा
छोड़ने लेने आने वालों से
सीट दिला देने में कुशल कुली और टी.टी. भी
अपने-अपने सौदों में लीन
समय दोपहर का साढ़े तीन

कहीं पहुँचना भी दरअसल कहीं से छूट जाना है
लेकिन बनारस में पहुँचा फिर नहीं छूटता – कहते हैं लोग
इस बात को याद करने का
यही सबसे वाजिब समय था
अपनी तयशुदा मद्धम रफ़्तार से चल रही थी ट्रेन
और पीछे बगटुट भाग रहा था बनारस
मुझे मालूम था कुछ ही पलों में यह आगे निकल जाएगा
बार-बार मेरे सामने आएगा

इस दुनिया में
क्या किसी को मालूम है –
                       बनारस से निकला हुआ आदमी
                       आख़िर कहाँ जाएगा…
2006

एम. आर. आई.

17/12/2009

( अप्रैल 2006 में मुझ पर एक आफ़त आई और मैंने बदहवासी की हालत में ख़ुद को एम० आर० आई० मशीन में पाया। उस जलती – बुझती सुरंग में मेरे अचेतन जैसे मन में कई ख़याल आते रहे। उन्हें मैंने थोड़ा ठीक होने पर इस कविता में दर्ज़ किया और ये कविता हंस, जनवरी 2008  में प्रकाशित हुई। पता नहीं इसे पारम्परिक रूप में कविता कहा भी जाएगा या नहीं ? )

 
वहाँ कोई नहीं है
मैं भी नहीं
वह जो पड़ी है देह
हाथ बांधे
दांत भींचे
बाहर से निस्पन्द
भीतर से रह-रहकर सहमती
थूक निगलती
वह मेरी है
लेकिन वहाँ कोई नहीं है
 
तो फिर मैं कहाँ हूँ ?
क्या वहाँ, जहाँ से आ रही है
नलकूप खोदने वाली मशीन की आवाज़?
अफ़सोस
पानी भी दरअसल यहाँ नहीं है
रक्त है लेकिन बहुत सारा खुदबुदाता-खौलता

लाल रक्त कणिकाओं में सबसे ज़्यादा खलबली है
मेरे शरीर में सिर्फ वही हैं जो लोहे से बनी हैं

होते-होते बीच में अचानक थम जाती है खुदाई
शायद दम लेने और बीड़ी सुलगाने को रुकते हों मजदूर
ठक!
ठक!
ठक!
दरवाज़ा खटखटाता है कोई
मेरे भीतर

सबसे पहले एक खिड़की खुलती है
धीरे से झाँककर देखता हूँ
बाहर
कोई भी नहीं है

सृष्टि में मूलाधार से लेकर ब्रह्मचक्र तक
कोई हलचल नहीं है

मैं दूर ……….
बहुत दूर…
मालवा के मैदानों में भटक रहा हूँ कहीं
अपने हाथों में मेरा लुढ़कता सिर सम्भाले
दो बेहद कोमल
और कांपते हुए हाथ हैं
पुराने ज़माने के किसी घंटाघर से
पुकारती आती रात है

कच्चे धूल भरे रस्ते पर अब भी एक बैलगाड़ी है
तीसरी सहस्त्राब्दी की शुरूआत में भी
झाड़ियों से लटकते हैं
मेहनती
बुनकर
बयाओं के घोसले

तालों में धीरे-धीरे काँपता
सड़ता है
दुर्गन्धित जल

कोई घुग्घू रह-रहकर बोलता है
दूर तक फैले अन्धेरे में एक चिंगारी-सी फूटती है

वह हड़ीला चेहरा कौन है
इतने सन्नाटे में
जो अपनी कविताओं के पन्ने खोलता है

गूंजता है खेतों में
गेंहूँ की बालियों के पककर चटखने का
स्वरहीन
कोलाहल

तभी
न जाने कहाँ से चली आती है दोपहर
आंखों को चुंधियाती
अपार रोशनी में थ्रेशर से निकलते भूसे का
ग़ुबार-सा उमड़ता है

न जाने कैसे
पर
मेरे भीतर का भूगोल बदलता है

सुदूर उत्तर के पहाड़ों में कहीं
निर्जन में छुपे हुए धन-सा एक छलकता हुआ सोता है
पानी भर रही हैं कुछ औरतें
वहाँ
उनमें से एक का पति फ़ौज से छुट्टी पर आया है
नम्बर तोड़कर
सबसे पहले अपनी गागर लगाने को उद्धत
वही तो संसार की सुन्दरतम
स्वकीया
विकल हृदया है

मैं भी खड़ा हूँ वहीं
उसी दृश्य के आसपास आंखों से ओझल
मुझमें से आर-पार जाती हैं
तरंगे
मगर हवाओं का घुसना मना है

सोचता हूँ
अभी कुछ दिन पहले ही खिले थे बुरुंश यहाँ ढाढ़स बंधाते
सुर्ख़ रंगत वाले
सुगंध और रस से भरे
अब वो जगह कितनी ख़ाली है

इन ढेर सारी आख़िरी
अबूझ ध्वनियों
और बेहद अस्थिर ऋतुचक्रों के बीच
टूट गया है एक भ्रम

एक संशय
मगर अभी जारी है !
2007

टीकाराम पोखरियाल की वसन्तकथा

15/12/2009

उस दूरस्थ पहाड़ी इलाके में कँपकँपाती सर्दियों के बाद
आते वसन्त में खुलते थे स्कूल
जब धरती पर साफ सुनाई दे जाती थी
क़ुदरत के क़दमों की आवाज़
गाँव-गाँव से उमड़ते आते
संगी
साथी
यार
सुदीर्घ शीतावकाश से उकताए
अपनी उसी छोटी-सी व्यस्त दुनिया को तलाशते

9 किलोमीटर दूर से आता था टीकाराम पोखरियाल

आया जब इस बार तो हर बार से अलग उसकी आँखों में
जैसे पहली बार जागने का प्रकाश था

सत्रह की उमर में
अपनी असम्भव-सी तीस वर्षीया प्रेयसी के वैभव में डूबा-डूबा
वह किसी और ही लोक की कहानियाँ लेकर आया था
हमारे खेलकूद
और स्थानीय स्तर पर दादागिरी स्थापित करने के उन थोड़े से
अनमोल दिनों में

यह हमारे संसार में सपनों की आमद थी
हमारी दुबली-पतली देहों में उफनती दूसरी किसी ज़्यादा मजबूत और पकी हुई देह के
हमलावर सपनों की आमद
घेरकर सुनते उसे हम जैसे आपे में नहीं थे

उन्हीं दिनों हममें से ज़्यादातर ने पहली बार घुटवाई थी
अपनी वह पहली-पहली सुकोमल
भूरी रोयेंदार दाढ़ी

बारहवीं में पढ़ता
हमारा पूरा गिरोह अचानक ही कतराने लगा था
बड़े-बुज़ुर्गों के राह में मिल जाने से
जब एक बेलगाम छिछोरेपन
और ढेर सारी खिलखिलाहट के बीच
जबरदस्ती ओढ़नी पड़ जाती थी विद्यार्थीनुमा गम्भीरता

सबसे ज़्यादा उपेक्षित थीं तो हमारी कक्षा की वे दो अनमोल लड़कियाँ
जिनके हाथों से अचानक ही निकल गया था
हमारी लालसाओं का वह ककड़ी-सा कच्चा आलम्बन
जिसके सहारे वे आतीं थीं हर रोज़
अपनी नई-नई खूबसूरत दुनिया पर सान चढ़ातीं

अब हमें उनमें कोई दिलचस्पी नहीं थी
टीका हमें दूसरी ही राह दिखाता था जो ज़्यादा प्रशस्त
और रोमांच से भरी थी
हम आकुल थे जानने को उस स्त्री के बारे में जो दिव्य थी
दुनियावी तिलिस्म से भरी
बहुत खुली हुई लगभग नग्न भाषा में भी रह जाता था
जिसके बारे में कुछ न कुछ अनबूझा – अनजाना

टीका के जीवन में पहली बार आया था वसन्त इतने सारे फूलों के साथ
और हम सब भी सुन सकते थे उसके इस आगमन की
उन्मादित पदचाप

लेकिन
अपने पूरे उभार तक आकर भी आने वाले मौसमों के लिए
धरती की भीतरी परतों में कुछ न कुछ सहेजकर
एक दिन उतर ही जाता है वसन्त

उस बरस भी वह उतरा
हमारे आगे एक नया आकाश खोलते हुए
जिसमें तैरते रुई जैसे सम्मोहक बादलों के पार
हमारे जीवन का सूर्य अपनी पूरी आग के साथ तमतमाता था
अब हमें उन्हीं धूप भरी राहों पर जाना था

टीका भी गया एक दिन ऐसे ही
उस उतरते वसन्त में
लैंसडाउन छावनी की भरती में अपनी क़िस्मत आजमाने
कड़क पहाड़ी हाथ-पाँव वाला वह नौजवान
लौटा एक अजीब-सी अपरिचित प्रौढ़ मुस्कान के साथ
हम सबमें सबसे पहले उसी ने विदा ली

उसकी वह वसन्तकथा मँडरायी कुछ समय तक
बाद के मौसमों पर भी
किसी रहस्यमय साए -सी फिर धूमिल होती गई
हम सोचने लगे
फिर से उन्हीं दो लड़कियों के बारे में
और सच कहें तो अब हमारे पास उतना भी वक़्त नहीं था
हम दाख़िल हो रहे थे एक के बाद एक
अपने जीवन की निजता में
छूट रहे थे हमारे गाँव
आगे की पढ़ाई-लिखाई के वास्ते हमें दूर-दूर तक जाना था
और कई तो टीका की ही तरह
फ़ौज में जाने को आतुर थे
यों हम दूर होते गए
आपस में खोज-ख़बर लेना भी धीरे-धीरे कम होता गया
अपने जीवन में पन्द्रह साल और जुड़ जाने के बाद
आज सोचता हूँ मैं
कि उस वसन्तकथा में हमने जो जाना वह तो हमारा पक्ष था
दरअसल वही तो हम जानना चाहते थे
उस समय और उस उमर में

हमने कभी नहीं जाना उस औरत का पक्ष जो हमारे लिए
एक नया संसार बनकर आयी थी

क्या टीकाराम पोखरियाल की वसन्तकथा का
कोई समानान्तर पक्ष भी था ?

उस औरत के वसन्त को किसने देखा ?
क्या वह कभी आया भी
उस परित्यक्ता के जीवन में
जो कुलटा कहलाती लौट आयी थी
अपने पुंसत्वहीन पति के घर से
देह की खोज में लगे बटमारों और घाघ कोतवालों से
किसी तरह बचते हुए उसने
खुद को
एक अनुभवहीन साफदिल किशोर के आगे
समर्पित किया

क्या टीका सचमुच उसके जीवन में पहला वसन्त था
जो टिक सका बस कुछ ही देर
पहाड़ी ढलानों पर लगातार फिसलते पाँवों-सा ?

पन्द्रह बरस बाद अभी गाँव जाने पर
जाना मैंने कि टीका ने बसाया हम सबकी ही तरह
अपना घरबार
बच्चे हुए चार
दो मर गए प्रसूति के दौरान
बचे हुए दो दस और बारह के हैं
कुछ ही समय में वह लौट आयेगा
पेंशन पर
फ़ौज में अपनी तयशुदा न्यूनतम सेवा के बाद
कहलायेगा
रिटायर्ड सूबेदार

वह स्त्री भी बाद तक रही टीका के गाँव में
कुछ साल उसने भी उसका बसता घरबार देखा
फिर चली गई दिल्ली
गाँव की किसी नवविवाहिता नौकरीपेशा वधू के साथ
चौका-बरतन-कपड़े निबटाने
उसका बसता घरबार निभाने

यह क्या कर रहा हूँ मैं ?
अपराध है भंग करना उस परम गोपनीयता को
जिसकी कसम टीका ने हम सबसे उस कथा को कहने से पहले ली थी
उससे भी ली थी उसकी प्रेयसी ने पर वह निभा नहीं पाया
और न मैं

इस नई सहस्त्राब्दी और नए समय के पतझड़ में करता हूँ याद
पन्द्रह बरस पुराना जीवन की पहली हरी कोंपलों वाला
वह छोटा-सा वसन्तकाल
जिसमें उतना ही छोटा वह सहजीवन टीका और उसकी दुस्साहसी प्रेयसी का
आपस में बाँटता कुछ दुर्लभ और आदिम पल
उसी प्रेम के
जिसके बारे में अभी पढ़ा अपने प्रिय कवि वीरेन डंगवाल का
यह कथन कि “वह तुझे खुश और तबाह करेगा! “

स्मृतियों के कोलाहल में घिरा लगभग बुदबुदाते हुए
मैं बस इतना ही कहूँगा
बड़े भाई !
जीवन अगर फला तो इसी तबाही के बीच ही कहीं फलेगा !
***

2006