Archive for the ‘शब्दों के झुरमुट में’ Category

पहाड़

01/01/2010

मैं जब भी
उनके बारे में सोचता हूँ
चले आते हैं
एक के बाद एक
छोटे-बड़े
कई सारे पहाड़
और खड़े हो जाते हैं
मेरी देह और आत्मा के
अँधेरे सूंसाट में

मेरे भीतर
देर तक वे खड़े रहते हैं
चुपचाप
मैं उन्हें देखता हूँ
और
मेरी चढ़ाई चढ़ती सांसों के
उत्तप्त वलय
उनसे मिलते हैं

वे थोड़ा सा हिलते हैं और हो जाते हैं
ख़ामोश
उन्हीं पर खड़े हो कर
कभी कभार
मैं अपने आसपास पुकार दिया करता हूँ
मेरी ज़िन्दगी में शामिल
कोई नाम

मैं चाहता हूँ
मेरे भीतर बढ़ता रहे
उनका क़द
उर्वर होते रहे
उनके ढलान
जंगल घने और ज़मीन
ठोस होती रहे

उनकी चट्टानें
पकती रहें मेरे रक्त की
आंच में

मैं सोचता हूँ
तो मेरे अतीत का
और मेरे भविष्य का
एक एक
दिन बोलता है

मैं बदल जाना चाहता हूँ
ख़ुद एक पहाड़ में.
***
रचनाकाल -1995

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नया साल

31/12/2009
 
मुझे कुछ
ग़लतियों की कथा
कहनी है
                                    
स्वीकार करना है
कुछ को
कुछ को
भूल जाना है
और नट जाना है कुछ से तो
साफ़ ही  
 
इस तरह करना है
प्रवेश
नए साल में
कहते हैं
परम्परा है कुछ ऐसी ही
***